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शुक्रवार, जुलाई 19

गुरु ने कहा


गुरु ने कहा


तुम्हारी मंजिल 

यदि श्मशान घाट ही है

चाहे वह आज हो या 

कुछ वर्षों बाद 

तो क्या हासिल किया 

एक रहस्य 

जो अनाम है 

 स्वयं को प्रकटाये

तुम्हारे माध्यम से

तभी जीवन को 

वास्तव में जिया !

वह जो सदा ही निकट है 

 प्रकृति के कण-कण में छुपा 

वह जो कृष्ण की मुस्कान की तरह 

अधरों पर टिकना 

और बुद्ध की करुणा की तरह 

आँखों से बहना चाहता है  

प्रियतम बनकर 

गीतों में गूँजना चाहता है 

संगीत बनकर आलम में 

बिखरना चाहता है 

वही कला, शिल्प, नृत्य है 

  पूजा, प्रज्ञा, मेधा है वही 

उर की गहराई में

 बसने वाली समाधि भी वही

उसे दिल में थोड़ी सी जगह दो

घेर ले वह अपने आप ही शेष

इतनी तो वजह दो ! 


बुधवार, अगस्त 16

जीवन - एक रहस्य

जीवन - एक रहस्य 



सब कुछ व्यवस्थित हो जीवन में 

नपा-तुला, मन के मुताबिक़ 

ऐसा कहाँ होता है ! 

अचानक घट जाता है कुछ 

भर जाता है जो अंतर में असंतोष 

परमात्मा हमें सुलाये रखना नहीं 

जगाये रखना चाहते हैं 

दो पैरों पर खड़े रहें सदा 

तकते आकाश को 

ऐसा उजकाये रखना चाहते हैं ! 

जीवन एक सीधी रेखा पर नहीं 

ऊबड़-खाबड़ रास्तों पर चलने का नाम है 

यहाँ रुक गया जो 

थक जाता है 

चलने वाले को ही विश्राम है !

अनंत है वह 

हम वही हैं यदि 

तो अनंत ही हमारी सीमा है 

सजग रहे अंतर, इसमें ही उसकी गरिमा है 

जो करणीय है 

वह करवा ही लेता है 

प्राप्य है जो दिला देता 

फिर कैसा द्वन्द्व और कैसा अभिमान 

जीवन एक रहस्य है 

लें ऐसा ही मान ! 


बुधवार, दिसंबर 16

जीवन एक रहस्य ही है


जीवन एक रहस्य ही है

जैसा चाहो वैसा गढ़ लो  
स्वप्नों को सच भी तुम कर लो,
हर पल है उपहार अनोखा
हर पल में ही खुशियाँ भर लो !

पल-पल देखो सृष्टि बनती
धूल का कण व तारागण भी,
नन्हा सा जो पादप कल था
वही बना विशाल बरगद भी !

जीवन एक रहस्य ही है
मन के द्वार खुले ही रखना,
कोई कब भीतर आ जाये
जाने किस पल सच हो सपना !

एक आस यदि टूट भी जाये
मुस्कानों का साथ न छोड़ो,
बरस रहा है अविरत बादल
बूंद-बूंद विश्वास समेटो !

जाने कितने मधुरिम लम्हे
छिपे हुए हैं अंतर्मन में,
बिखरा दो कुछ भी न रख के
साथी वही बनेंगे पथ में !


शुक्रवार, फ़रवरी 17

उसने कहा था



उसने कहा था

सारी कायनात भी छोटी पड़ती है
प्रेम लुटाने के लिये मुझे
और झगड़ने के लिये भी तुम्हें
मेरी जरूरत पड़ती है....

मैं तुम्हें प्रेम कर सका
क्योंकि मैंने चाहा सम्पूर्ण अस्तित्त्व को
तुम खफा हो मुझसे भी
सारी दुनिया नजर आती है शायद
दुश्मन तुम्हें...

अकारण चहकता है मेरा मन
क्योंकि जीवन एक रहस्यमय घटना है
तुम उदास हो
हर शै की तह तक जाकर भी....



शनिवार, नवंबर 27

बिन बाती इक दीप जला लें

बिन बाती इक दीप जला लें

मुट्ठी भर पल पास हमारे

अंजलि भर क्षण पाए सारे,

चाहे खो दें या फिर बो दें

वृक्ष उगा दें मन के द्वारे !


 एक फूल अमृत का खिला दें

अमरबेल पादप लहरा दें,

खो जाएँ फिर नभ अनंत में

दिग दिगंत में सुरभि उड़ा दें !


मदहोशी जो होश जगा दे

परम शांति के फूल उगा दे,

रग-रग में फिर नृत्य समाये

कण-कण मन के ज्योति समा दे !


ऐसा एक रहस्य जान लें

जीते जी इक स्वर्ग बना दें,

अंधियारा मिट मिले उजास 

बिन बाती इक दीप जला लें !


गीत चुके, पर वह असीम है

शब्द पुराने वह नवीन है,

पल-पल वह संवर्धित होता

परम प्रेम में वह प्रवीण है !


कह-कह कर भी कहा न जाये

सदा और, और हुआ जाये,

जितना हमने  चाहा उसको

लाख गुना वह प्रेम जताए !


अनिता निहलानी
२७ नवम्बर २०१०



गुरुवार, अक्टूबर 21

जितना दौड़ो कम पड़ता है

यह कविता मेरी छोटी बहन के लिये है और यह उन सब कामकाजी महिलाओं के लिये भी है जो वर्षों से अपने प्रोफेशन के साथ साथ घर की जिम्मेदारी बिना शिकायत के निभाती आ रही हैं, किन्तु अब उम्र के उस पडाव पर आ पहुंची हैं, जहाँ खुद से खुद की मुलाकात होती है, प्रौढावस्था तक आते आते तन व मन तनाव से ग्रस्त हो चुके होते हैं जीवन में सभी उपलब्धियां हासिल कर चुकने के बाद भी एक खालीपन सा लगता है... एक नयी तलाश शुरू होती है खुद की तलाश....  
जितना दौड़ो कम पड़ता है
सुंदर मुखड़ा, गोरी रंगत
नन्हीं-मुन्नी एक परी थी,
घुंघराले थे काले कुंतल
घर भर में सबसे छोटी थी I

पढ़ने में भी थी होशियार
नृत्य कला सौंदर्य विचार,
हँसती तो गालों में गढ्ढे
आँखों में थे स्वप्न हजार !

कब वह इतनी बड़ी हो गयी
निज पैरों पर खड़ी हो गयी,   
मेहनत कर वह बनी डॉक्टर
ड्यूटी की संभाला भी घर I

जो चाहा पाया जीवन में
बच्चों को संस्कार दिया,
सँग मरीजों के अपनों सा
सदा प्रेम व्यवहार किया I

आज उम्र के दोराहे पर
जग में कुछ कर के दिखलाए
 थक कर बैठी रही सोचती
या फिर मानव धर्म निभाए ?

मानव होने का अर्थ क्या
निज के भीतर खुद को पाना,
तोड़ के मन, बुद्धि के घेरे
आत्म शक्ति से प्रीत लगाना I

जितना दौड़ो कम पड़ता है
यह जग अंधा एक कुआँ है,
कभी तृप्त ना हो सकता यह
सदैव अधूरा ही हुआ है I

युगों युगों से यही कहानी
दोहराती स्वयं को आयी है,
जग यह माया जाल घना है
भीतर ही खुशियाँ पायीं हैं I

दो पल थम कर खुद सँग हो ले
जिसने पाया, भीतर पाया,
नहीं छोड़ना कुछ भी बाहर
जिसको तृष्णा तजना आया I

कर कर के भी जो न मिलता
शांत हुए से सहज मिलेगा,
कुछ भी नहीं शांति के आगे
भाव सधे तो प्रेम खिलेगा I

जीवन का है यही रहस्य
जिसने छोड़ा उसने पाया,
सहज रहा जो जैसा भी है
उसने साथ स्वयं का पाया I

अनिता निहालानी
२१ अक्तूबर २०१०