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सोमवार, अक्टूबर 11

हम डाकिये

हम डाकिये

जो भी जिसने जग में पाया
एक उसी स्रोत से आया
सदा मुक्त हो उसे लुटायें
क्यों न हम डाकिये बन जाएँ ?

झोली कभी न होगी खाली
छिपा वहाँ है अनंत खजाना
छोड़ कृपणता हों उदार तो
जानें, देना ही है पाना I

देने में ही राज छिपा है
लुटा रहा वह युगों युगों से
कुदरत में अनमोल रत्न हैं
देना चाहे हमें कभी से I

थोड़ा सा पाकर हम हर्षित
छुपा-छुपा कर सबसे रखते
प्रेम भाव भी मुस्कान भी
जाने क्यों देने से डरते I

क्या कुछ हमसे खो जायेगा
क्या अपना है पास हमारे
जो तुच्छ है वही कमाया
श्रेष्ठ सभी गुण उसके सारे I

उसका ही उसको लौटाएं
व्यर्थ भार क्यों ढोयें जग में
खाली हों बांसुरी जैसे
सुर उसके गूंजेगें हम में I

अनिता निहालानी
११ अक्तूबर २०१०