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सोमवार, मार्च 23

वासंतिक नवरात्र आ गये

वासंतिक नवरात्र आ गये 


माँ के आने की बेला है 

घर में मंगल कलश बिठाओ,

धूप-दीप, फूलों से स्वागत  

 द्वारे बंदनवार सजाओ ! 


माँ जो भीतर कण-कण में हैं 

गहरी अंतर प्यास जगाओ, 

प्राणों का आधार वही हैं 

देवी माँ का ध्यान लगाओ ! 


क्षुधा रूप में, भक्ति रूप में 

शिव शक्ति और शांति रूप में, 

मन की बात कहे बिन सुनतीं 

माँ हैं दिल की गहराई में !


वही सप्त चक्रों में बैठी 

चिंतन, सृजन, प्रेम की देवी 

वही ज्ञान की देवी बनकर 

अंतर को सद्प्रेरित करतीं !


माँ के रूप हज़ारों चाहे 

मन में कोई रूप बसाओ, 

वह अनंत की राह दिखायें 

जीवन में समरसता लाओ !




 

बुधवार, जुलाई 16

ढाई आखर सभी पढ़ रहे

ढाई आखर सभी पढ़ रहे



 प्रेम अमी की एक बूँद ही

जीवन को रसमय कर देती, 

 दृष्टि एक आत्मीयता की 

अंतस को सुख से भर देती ! 


प्रेम जीतता आया तबसे 

जगती नजर नहीं आती थी, 

एक तत्व ही था निजता में 

किन्तु शून्यता ना भाती थी !


 स्वयं शिव से ही प्रकटी शक्ति  

प्रीति बही थी दोनों ओर,

वह दिन और आज का दिन है 

बाँधे कण-कण प्रेम की डोर !


हुए एक से दो थे जो तब 

 एक पुन: वे  होना चाहते,  

दूरी नहीं सुहाती पल भर 

प्रिय से कौन न मिलन माँगते ! 


खग, थलचर या कीट, पुष्प हों 

प्रेम से कोई उर न खाली, 

मानव के अंतर ने जाने 

कितनी प्रेम सुधा पी डाली ! 


करूणा प्रेम स्नेह वात्सल्य 

ढाई आखर सभी पढ़ रहे  

अहंकार की क्या हस्ती फिर, 

प्रेमिल दरिया जहाँ बह रहे !  


गुरुवार, मार्च 7

राह अब भी बहुत शेष है

विश्व महिला दिवस पर 


राह अब भी बहुत शेष है 


बनने लगे हैं कितने ही बिंब 

मन की आँखों के सम्मुख 

छा जाते बन प्रतिबिंब 

कौंध जाते कितने ही ख़्याल हैं 

आख़िर यह विश्व की 

आधी आबादी का सवाल है 

ऐसा लगता है दुनिया

एक पहिये पर ही 

आज तक चलती रही है  

तभी शायद इधर-उधर 

 लुढ़क सी रही है 

किंतु अब समाचार सुनें ताजे 

घुट-घुट कर जीने के दिन गये 

 उठने लगी हैं आवाजें  

उन्हें भी भागीदार बनाओ 

बराबरी का हक़ दिलाओ 

कम से कम जीने तो दो 

बुनियादी अधिकारों को 

अब बन रही है ऐसी दुनिया 

जहाँ पक्षपात नहीं होगा 

 मौक़ा मिलेगा हरेक को

 हुनर दिखाने का

सजग है आज की महिला 

कि वह शक्ति का पुंज  है 

और होकर रहेगी वह 

जो होना चाहती है 

उसे अनुसरण मात्र नहीं करना है 

अपने सपनों में स्वयं रंग भरना है 

इसलिए आज का दिन विशेष है 

पर  राह अब भी बहुत शेष है 

हाशिये पर खड़ी हैं अनगिनत महिलाएँ 

वे भी आगे आयें, ताकि  

 युद्ध में झोंकी जा रही है जो दुनिया

 फिर से हँसे और गुनगुनाए !


शनिवार, जनवरी 28

कहना - सुनना

कहना - सुनना 


वह जो मेरे भीतर बोलता है 

वही तुम्हारे भीतर सुनता है 

कहा था आँखों में आखें डाल के किसी ने 

फिर भी नहीं समझ पाते 

लोग एक-दूसरे की बात 

 खुद भी नहीं सुनते उसे 

न ही खुद बोलते उससे 

वरना आसान हो जाती चीजें 

लोग बिन कहे 

एक-दूसरे की बात समझ जाते 

अथवा तो सुनकर वही समझते 

जो कहा गया है 

जो एक छुपा है सारी कायनात के पीछे 

वही देखता है 

वही देख रहा है 

अपनी पूरी शक्ति से 

उसके होने में ही हमारा होना है 

वही जीवन की मुद्रिका में जड़ा सोना है 

उसकी स्मृति हमें  रख सकती है मुक्त

और अपने आप से युक्त  !


बुधवार, अक्टूबर 6

देवी का आगमन सुशोभन


देवी का आगमन  सुशोभन 


देवी दुर्गा जय महेश्वरी 

 राजेश्वरी, मात जगदम्बा,  

आश्विन शुक्ल नवरात्रि शारद

अद्भुत उत्सव कालरात्रि का ! 


देवी का आगमन  सुशोभन 

उतना ही है भव्य प्रतिगमन,

जगह-जगह पंडाल सजे हैं

करते बाल, युवा सब नर्तन !


गूंजे घंटनाद व निनाद

सजे मार्ग, मंदिर कंगूरे,

शक्ति बिन शिव हों नहीं पूरे 

सृष्टि कार्य सब रहें अधूरे ! 


इच्छा, क्रिया, ज्ञान शक्ति तुम्हीं 

अन्नपूर्णा, विशालाक्षी,

कोटिसूर्य सम काँति धारिणी

शांतिस्वरूप, आद्याशक्ति !


विनाश किये मुंड और चंड,

ज्योतिर्मयी, जगतव्यापिनी,

कुंडलिनी शक्ति स्वरूपा माँ 

महिषा असुरमर्दिनी प्रचंड  !




सोमवार, अगस्त 9

वही जानता एक हुआ जो

खो जाए जिसके दर पे, ‘मैं’ का यह सिलसिला ​​

उसके यहाँ ही जाकर, सिर को झुकाना होगा 


फ़िक्रों को छोड़ देना, रस्ते में जाते-जाते 

हर सुख वहीं मिलेगा, जहाँ नाम उसका होगा 


वही जानता एक हुआ जो 

सुख को चुन लेते फूलों सा 

दुःख के काँटे नहीं माँगते, 

मधुर याद से दामन भर लें 

हर कटुता को रहे भुलाते !


मन की ऐसी ही माया है 

अनुयायी है राग-द्वेष का,

भला-बुरा औ' प्रेम घृणा में 

बाँटा जग को पूर्ण न देखा !


दो में बाँटा जिस पल हमने 

भ्रम बढ़ता जाता जीवन में, 

पार हुआ जो देखे इसको 

वही टिका रहता है सच में !


रात छोड़कर दिन को पकड़े 

ऐसा कहाँ हुआ है संभव, 

मिले लक्ष्मी नारायण तजे  

शिव बिना मिले शक्ति असंभव !


डूबे दो में, पार हुए जब 

एक में अंतर को विश्राम, 

वही जानता एक हुआ जो 

टुकड़ों में नहीं मिलते राम !

 

सोमवार, फ़रवरी 15

उसे बहने दो

उसे बहने दो


वह बहना चाहता है 

निर्विरोध निर्विकल्प 

हमारे माध्यम से 

प्रेम और आनंद बन 

पाहन बन यदि रोका उसका मार्ग 

तो वही बहेगा रोष और विषाद बनकर !

वह हजार-हजार ढंग से प्रकट होता है 

यदि राम बनने की सम्भावना न दिखे 

तो रावण बन सकता है 

वह उस ऊर्जावान नदी की तरह है 

जिसे मार्ग न मिले तो बाढ़ बन जाती है 

अपने ही तटों को डुबोती !


वह बहना चाहता है 

शांति और सुख बन

यदि ओढ़ ली है दुःख की चादर

तो वही छा जायेगा 

अशांति बनकर रग-रग में 

 बाल्मीकि बनने की सम्भावना न जगायी

तो  बना रह सकता है रत्नाकर युगों तक

उसे तो पनपना ही है 

वह जीवन है !


वह बहना चाहता है 

ज्ञान और पवित्रता बन 

यदि अज्ञान ही रास आता है किसी को 

तो दूषित विचारधारा जन्म लेगी उसी कोख से 

जहां से गूँज सकते थे पावन मन्त्र 

नकारात्मकता भी तो अशुचि है न 

सूतक लगा ही रहेगा वतावरण में 

उसे तो जन्मना ही है !


यदि स्वयं को नहीं प्रकटाया

तो राग-द्वेष ही सम्भाल लेंगे अंतरात्मा 

उसे बहने दो, मार्ग दो 

वह ऊर्जा है 

जो ढूंढ ही लेती है अपना मार्ग 

लेकिन वही 

जो हम उसे देते हैं 

वह भाग्य है लेकिन उसका जन्म होता है 

हमारी ‘हाँ’ या ‘न’ से ! 

 

शुक्रवार, नवंबर 20

प्रेम से कोई उर न खाली

 


प्रेम से कोई उर न खाली
 

एक बूंद ही प्रेम अमी की

जीवन को रसमय कर देती,

एक दृष्टि  आत्मीयता की

अंतस को सुख से भर देती !

 

प्रेम जीतता आया तबसे

जगती नजर नहीं आती थी,

एक तत्व ही था निजता में

किन्तु शून्यता ना भाती थी !

 

 स्वयं शिव से ही प्रकटी  शक्ति 

प्रीति बही थी दोनों ओर,

वह दिन और आज का दिन है

बाँधे कण-कण प्रेम की डोर !

 

हुए एक से दो थे जो तब

 एक पुन: वे  होना चाहते, 

दूरी नहीं सुहाती पल भर

प्रिय से कौन न मिलन मांगते !

 

खग, थलचर या कीट, पुष्प हों

प्रेम से कोई उर न खाली,

मानव के अंतर ने जाने

कितनी प्रेम सुधा पी डाली !

 

करूणा प्रेम स्नेह वात्सल्य

ढाई आखर सभी पढ़ रहे,  

अहंकार की क्या हस्ती फिर

प्रेमिल दरिया जहाँ बह रहे !   

मंगलवार, अक्टूबर 27

हम और अस्तित्व

हम और अस्तित्व

 

हम वह वृक्ष बन सकें

जो हजारों का भला करता है

छाँव देता और उनकी क्षुधा हरता है

या बनें बाँसुरी जो खाली है भीतर से

पर अस्तित्व के अधरों से लगकर

मधुर संगीत जिससे उपजता है

हमारे भीतर से हम जब लुप्त हो जाते हैं

सारा संसार समा  जाता है

हवाएं बहने लगती हैं

शक्ति का प्रवाह ऊपर से गिरता है

जैसे शंकर की जटाओं में सिमट जाती है गंगा

बहती है वह जग की तृषा हरने

गौरी धरती है भीषण काली का रूप

सहना होगा जिसे असुरों का आक्रमण

हजार विरोध भी, पर वहाँ कोई नहीं होगा

जो अपमानित हो सके तिल भर

हमें भी बनना होगा मसीहा

छोटा या बड़ा  

क्योंकि अंतरिक्ष समेटे है हर कोई अपने भीतर !

  

गुरुवार, अक्टूबर 15

सिंधु से नाता जोड़ लें

 सिंधु से नाता जोड़ लें

नींद टूटे, स्मरण जागे 

फिर खिल उठे मन का कमल  

 जो बन्द है मधु कोष बन  

   हो प्रकट वह शुभता अमल !


हम बिंदु हैं तो क्या हुआ 

सिंधु से नाता जोड़ लें, 

इक लपट ही हों आग की 

रवि की तरफ मुख मोड़ लें !


अब शक्ति को पहचान निज 

खिल कर उसे बह लेने  दें, 

जो सुप्त है कई जन्म से 

हो व्यक्त सब कह लेने दें !