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सोमवार, अप्रैल 25

आँख मुंदी और मुक्त हो गए



आँख मुंदी और मुक्त हो गए

आँख मुंदी और मुक्त हो गए, ऐसा भला कहीं होता है
तोड़ सकें जीते जी पहरे, ऐसा यहाँ नहीं होता है I

मन के बंधन, तन आलम्बन, रगीं दुनियावी आकर्षण
छोड़ दे  सकें हँसते-हँसते, ऐसा भला कहीं होता है I

कतरा-कतरा कर जो जोड़ा, चाहे कितनों का दिल तोड़ा
उसे लुटा दें निज हाथों से, ऐसा यहाँ नहीं होता है I

दासों का सा बीता जीवन, सदा सहा निज मन का शासन
दें आज्ञा अपने स्वामी को, ऐसा भला कहीं होता है I

मुक्ति को आदर्श बनाया, पर जीवन भर उसे भुलाया
उड़ ही जाएँ खग पिंजरों के, ऐसा सदा नहीं होता है I

अनिता निहालानी
२५ अप्रैल २०११