ऊर्जा लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
ऊर्जा लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

शनिवार, अगस्त 8

जीने की कला


जीने की कला 


क्या मिला है? क्या नहीं

इसको न देखें  

क्या घटा है मन के भीतर ? 

क्या बने हैं, इसे परखें  !


धन मिला, पर बुझ गया मन 

यश मिला, पर ढल गया तन 

घर बनाया एक सुंदर 

किंतु छायी ग़र थकन !


पूर्ण होकर भी, 

अधूरे ही रहेंगे 

वे सपन !


वे सपन, जो ऊर्जा से भर गये थे 

सृजन की क्षमता जगा कर 

राह का भी बोध जो, दे कर गये थे 


संग कोई है हमारे 

सुनें उसको !

काम न आयेंगे गैजेट्स 

उस घड़ी जब 

साथ न होगा कोई 

और हम अकेले ही

 खड़े हों राह पर ! 


बाँटने से ही मिलेगा 

तोष भीतर 

न कि ढेरों जोड़ने से 

क्या बही करुणा किसी के दर्द पर 

क्या मिला सुख साथ होने पर किसी के 

आज़मायें न कभी भी मित्रता 

सारे जग से ही निभायें प्रीत कर !!

 

मंगलवार, जुलाई 7

उसने अपनी याद जरा सी

उसने अपनी याद जरा सी 


जब नयनों में नींद नहीं थी 

उसका ही तो ख़्वाब बसा था, 

सुमधुर स्मृतियों के पत्तों से 

मन का आँगन पूर्ण भरा था !


अधरों पर मुस्कान सजीली 

ह्रदय की गहराई में तोष,

आश्वासन थपकी देता था 

लोरी गा रहा था संतोष !


फिर जाने कब निद्रा देवी 

पलकों पर आकर बैठी थी,   

उसने अपनी याद जरा सी 

शायद पीछे खिसका दी थी !


तन सोया ऊर्जा जगती थी 

कंपन सिहरन रह-रह होता, 

एक अखंड ज्योति जलती जब  

क्योंकर दर्श न उसका होता !


उसके पथ पर जो चलता है 

नित उपहार मिला करते हैं,

नींद, जागरण, स्वप्न सभी के 

जाकर पार मिला करते हैं !


गुरुवार, मई 14

सागर सी आत्मा

सागर सी आत्मा 


दिन-रात 

सागर में लहरें उठती हैं 

फेन, बुदबुदे, तरंगें 

सभी तो जल हैं !

आत्मसिन्धु में वृत्तियाँ 

भाव, विचार, कल्पनाएँ 

सभी तो ऊर्जा हैं !!


सागर अपनी गरिमा में रहता है 

जल भी तत्वतः वैसा का वैसा, 

आत्मा स्वयं में प्रतिष्ठित 

ऊर्जा अपरिवर्तित ।


लहरें बाहर से नहीं आयी 

सागर का ही विवर्त हैं !

आत्मा निरंजन है 

मन मात्र विवर्त है !!


शुक्रवार, जुलाई 4

ऊपर-नीचे जग है क्रीड़ा

ऊपर-नीचे जग है क्रीड़ा


गहराई में जाकर देखें 

एक धरा से उपजे हैं सब, 

ऊँचाई पर बैठ निहारें 

सूक्ष्म हुए से खो जाते तब !


रहे धरा पर उसको  पीड़ा 

ऊपर-नीचे जग है क्रीड़ा, 

ज्यों निद्रा में सब खो जाये 

स्वप्नों में भी मन बहलाये ! 


लेकिन एक अवस्था चौथी 

जिसमें तीनों एक हुए हैं, 

जगना, सोना, स्वप्न देखना 

तीनों जहां विलीन हुए हैं !


वहीं ठिकाना मिला जिसे गर 

सदा तृप्त, हर्षित हो गाए, 

जुड़ अनंत ऊर्जा से निशदिन 

तीनों में वह आये-जाये !


गुरुवार, जून 19

ऊर्जा

ऊर्जा 


ऊर्जा बहुत है, कर्म  कम 

ऊर्जा अहंकार बन जाएगी 

ऊर्जा कम है, कर्म अधिक 

ऊर्जा तनाव बन जाएगी 


ऊर्जा अति है कर्म भी अति 

ऊर्जा संतुष्टि बन जाएगी 

ऊर्जा अनंत है कर्म अति या अल्प

ऊर्जा आनंद बन जाएगी 


अधिक हो धन-दौलत तो 

अभिमानी हो जाता है आदमी 

कम हो धन तो तनाव से भर जाता है 

संपन्नता भी हो और श्रम भी जीवन में 

संतोष से भर जाता है 

किंतु धन बेहिसाब हो फिर भी 

 सदा खुश नहीं रह पाता 

इसलिए ऊर्जा क़ीमती है धन से 

ऊर्जा अर्थात आत्मा 

आत्मा अर्थात परमात्मा 

परमात्मा अर्थात सत्य, प्रेम और शांति ! 


मंगलवार, मार्च 25

जो है


जो है 

जो है 

उसे देख नहीं सकते 

वह देखने वाला है !


जो दिखता है 

वह है नहीं 

क्योंकि वह 

पल-पल बदल रहा है !


जो है 

वह सदा है 

पर अनजाना ही 

रह जाता है !


जो नहीं है 

उसी को पकड़ने में 

मन ऊर्जा गँवाता है !


जीवन इसी विरोधाभास 

का दूसरा नाम है !


जो है 

उसी को कहते राम हैं 

जिसमें ठहर कर 

मन पाता विश्राम है !


शुक्रवार, अक्टूबर 4

नारी भारत की


नवरात्रि के पावन अवसर पर नारी शक्ति को समर्पित


नारी भारत की

आँखों में निज ऊर्जा की पहचान लिए 

आगे बढ़ते जाने का अरमान लिए, 

अधरों पर नवल विजय की मुस्कान लिए 

नारी भारत की आशा की ख़ान लिए !


रोक सके ना कोई बाधा अब इसको 

वह सबला है जग कहता अबला जिसको, 

नहीं चाहिए अब गहनों का कारावास 

उसे चाहिए खुली धरा खुला आकाश !


न सुंदर वस्त्र न ही लुभाते राजमहल 

उतर पड़ी है करने हर कठिनाई हल, 

वह ख़ुद की ताक़त को पहचान चुकी है 

इस दुनिया की लघुता को जान चुकी है !


जो अब तक बस नीर बहाती है आयी 

बेवजह अपनी अस्मिता गँवाती आयी, 

जिसने सपनों को सदा बिलखते देखा 

वह अब उनको साकार बनाने आयी !


नहीं रुकेंगे इन कदमों को बढ़ने दो 

जग महकेगा, हाथों से  संवरने दो, 

उसे मान दो, उसे चाह सिर्फ़ स्नेह की 

हक़ है उसका समानता का अधिकार दो !





रविवार, अक्टूबर 15

माँ प्राण का आधार भी है


माँ प्राण का आधार भी है 

 

जो थामती है हर विपद में 

 दे ज्ञान दीपक पथ दिखाती,

माँ प्राण का आधार भी है 

  रात्रि बनकर  विश्राम देती !


सौंदर्य की देवी कहाए

इस जगत को आकार देती, 

शिव से मिलन की प्रेरणा दे 

ले कर स्वयं कैलाश जाती !


अपार ऊर्जा धारे देवी 

 दर्शन परम अनंत कराती, 

 जगत दात्री बनी सिद्धि रिद्धि

निःशंका जो सदा विचरती !


महातपस्विनी जगत माता  

पराम्बा, जया, महायोगिनी, 

शिव प्रिया,  अंबा, महागौरी 

जगत तोषिणी दिव्यतोषिणी !


शनिवार, अगस्त 26

जगत और तन

जगत और  तन 


कितना भी बड़ा हो 

जगत की सीमा है 

या कहें जगत ही सीमा है 

निस्सीम के आँगन में खिला एक फूल हो जैसे 

कोई चाहे तो बन सकता है 

उसकी सुवास 

और तब असीम में होता है उसका निवास 

घुल-मिल जाता है उसका वजूद 

अस्तित्त्व के साथ 

और बँटने लगता है 

जगत के कोने-कोने में !

जैसे तन स्थिर है 

मन के आकाश में 

बन जाये तन यदि चेतन 

तो एक हो जाता है मन से 

ओए शेष रह जाती है ऊर्जा अपार 

जो  बिखर  जाती है बन आनंद

जगत में ! 


शनिवार, जुलाई 8

जीवन जो गतिमान निरंतर



जीवन जो गतिमान निरंतर 


रोकें नहीं ऊर्जा भीतर

पल-पल बहती रहे जगत में,

त्वरा झलकती हो कृत्यों से

पाँव रुकें नहीं थक मार्ग में !


नित रिक्त हों हरसिंगार सम

पुनः-पुनः मंगल ज्योति झरे,

रुकी ऊर्जा बन पाहन सी  

सर्जन नहीं  विनाश ही करे !


धारा थम कर बनी ताल इक  

बहती रहती जुड़ी स्रोत से,

जीवन जो गतिमान निरंतर 

दूर कहाँ है वह मंजिल से!


कृत्यों की ऊर्जा बहायें

भीतर खले न कोई अभाव,

भरता ही जाता है आँचल 

जिस पल माँगा मुक्ति का भाव  !


लुटा रहा है सारा अम्बर 

हम भी दोनों हाथ उलीचें,

क्षण-क्षण में जी स्वर्ग बना लें 

बँधी हुई मुठ्ठी न भींचें !


शनिवार, अप्रैल 1

आनंदित है कण-कण जड़ का

आनंदित है कण-कण जड़ का 


निशदिन मेघ प्रीत का तेरी 

बरस रहा है झर-झर झर-झर, 

ऊपर-नीचे, दाएँ-बाएँ 

दसों दिशाओं  से नित आकर !


जिस पल बनी पदार्थ ऊर्जा 

नवल सृष्टि का जन्म हुआ था,

रूप अनंत धरे जाती है 

मानो कोई खेल चल रहा !


आनंदित है कण-कण जड़ का 

चेतन इसमें छिपा हुआ है, 

कुदरत का सौंदर्य अनूठा 

मधुरिम लय में बँधा हुआ है 


अंतर्मन में गुँथे हुए ज्यों 

श्रद्धा, प्रेम आस्था के स्वर, 

तू ही हमें राह दिखलाता 

खोज निकालें इनको भीतर !


सुख दे खुद  के निकट बुलाए 

दुःख दे उर में विरह जगाए, 

सहज बने कैसे यह जीवन 

पल-पल इसका मार्ग दिखाए !


कैसे करें शुक्रिया तेरा 

तुझसे ही अस्तित्त्व टिका है, 

शांति, प्रेम, सुख सागर बनता 

जो दिल तेरे लिए बिका है !



रविवार, अक्टूबर 9

अभी शेष है जीना

अभी शेष है जीना


जीने की तैयारी में ही 

लग जाती है सारी ऊर्जा 

घर को सजाते-सँवारते 

थक जाते हैं प्राण 

 मन को सहेजते-सहेजते  

चुक जाती है शक्ति 

फिर कब जियेगा कोई 

और बिखेरेगा प्रेम 

 संगीत सुनेगा 

पंछियों और हवाओं का 

साज बैठाते-बैठाते ही 

शाम ढल जाती है 

अभी सुर सध ही नहीं पाता 

और थम जाती है रफ्तार 

हिसाब-किताब करते 

 रह जाता है पीछे हर बार इजहार !