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शनिवार, दिसंबर 21

अपने में

अपने में 


क्या है 

जिसे मानव खोज रहा है 

धरती क्या कम थी 

अब  ख़ाक  छानने लगा है 

अन्य ग्रहों की भी

बस्तियाँ तक बसाने की सोच रहा है 

क्या पाएगा 

सागर की अतल गहराई में 

या अंतरिक्ष की असीम ऊँचाई में 

क्या है जो उसे 

अपने में नहीं मिल सकता 

सुना है 

 तपस्या करते थे ऋषिगण

और सारा हाल जान लेते थे

 एक जगह बैठे-बैठे 

कहते हैं, 

सब कुछ तो मन में ही है 

मन की गहराई में 

पहले-पहले शोर सुनायी देता है 

फिर संगीत 

उसके बाद अंतहीन सन्नाटा 

फिर भी बढ़ते रहो आगे तो 

भेद खुल जाते हैं 

कोई न कोई देवगण 

राह में मिल जाते हैं 

तृप्त हो जाता होगा मन 

थम जाती होगी सारी खोज 

जो जब चाहा हाज़िर हो जाता होगा 

 भर जाता होगा

 एक मधुर संतोष भीतर 

नयन मुस्काते होंगे 

अधर गाते होंगे 

थिरकते होंगे कदम 

फूल बिखरते होंगे हर तरफ़ 

 नींद आती होगी चैन की

स्वर्ग के आते होंगे 

शायद स्वप्न भी !




रविवार, दिसंबर 8

तू

तू 


तू चाहता है 

मैं तुझे सुनूँ 

इसीलिए तूने मेरे कानों में संगीत भर दिया 

तू चाहता है 

मैं तुझे पढ़ूँ 

इसीलिए तूने 

मेरे हाथों में किताबें थमा दीं 

तू चाहता है 

मैं तुझे लिखूँ 

इसीलिए तूने 

मेरे जीवन में चाहत भर दी 

तू चाहता है 

मैं तुझे चाहूँ 

इसीलिए तूने मेरे मन में 

हँसी का बीज बो दिया 



शुक्रवार, सितंबर 20

कविता

कविता 

सुना आपने

अब कविता पढ़ना मुझे नहीं भाता 

अक्सर मैं कविता का पेज ही खोल कर नहीं देखती 

टिकने ही नहीं देती आँखों को शीर्षक पर

 एक क्षण के लिए भी 

शायद भय है अंतर्मन में 

पुराना प्रेम जाग न उठे 

न लगने लगें कविताएँ अपनी-अपनी 

सो दूर से ही नमन करती हूँ 

नहीं तौलती शब्दों को 

भावों को अनुभूति में नहीं लाती

विचारती हूँ, परखती हूँ 

पर नहीं देखती, न छूती  

वृक्षों, पत्तियों और फूलों को 

मैं बिगड़ गई हूँ 

एक कली ने कल राह चलते कहा था 

मैंने अनसुना कर दिया 

कान नहीं दिये 

क्योंकि अब मैं वह नहीं रही 

मुझे अभाव नहीं है कोई 

 सभी कुछ है 

अब फूलों को अपना दुख सुनाने को रहा ही नहीं 

हवा का संगीत सुनने का वक्त नहीं 

फिर क्यों कविता पढ़ूँ 

क्यों अफ़सोस करूँ 

भ्रष्टाचार पर, असमानता पर, बेरोज़गारी पर 

क्यों नाराज़ रहूँ भ्रष्ट सत्ता से 

अब मैं स्वतंत्र हूँ 

अपने पैरों पर हूँ 

अब सब ठीक चल रहा है 

पेड़ कहीं कटते होंगे 

मुझे आवाज़ सुनायी नहीं देती 

नारे लगते होंगे, जुलूस निकलते होंगे 

पर वे बेमतलब हैं 

पहाड़ों पर आग लगती होगी शायद 

पर मैंने खिड़की कहाँ खोली है 

बंद हैं आँखें मेरी 

सपनों में नहीं 

अब तो ज़िंदगी चलने लगी है 

मैंने इसकी सेहत का जाम पिया था 

नये वर्ष पर 

शुभकामना भी दी थी 

अब मुझे कविता ज़रूरी नहीं लगती 

कि अच्छे-भले शब्दों को 

साथ-साथ रख दिया जाये यूँही 

मन बहलाव के लिए 

सुना आपने कविता अब 

ऊपर की या नीचे की शै हो गई है 

दूसरी श्रेणी की !


बुधवार, दिसंबर 21

कान्हा बंसी किसे सुनाए

कान्हा  बंसी किसे सुनाए


वरदानों से झोली भर दी 

पर हमने क़ीमत कब जानी, 

कितनी बार मिला वह प्रियतम 

किंतु कहाँ सूरत पहचानी !


आस-पास ही डोल रहा है 

जैसे मंद पवन का झोंका, 

कैसे कोई परस जगाए 

बंद अगर है हृदय झरोखा !


रुनझुन का संगीत बज रहा 

पंचम  सुर में कोकिल गाए, 

कानों में है शोर जहाँ का 

कान्हा  बंसी किसे सुनाए !


एक नज़र करुणा से भर के 

दे देती प्रकृति पुण्य प्रतीति, 

राहों के पाहन चुन-चुन कर 

जीवन में मधुरिम रव भरती !


अमर  अनंत धैर्यशाली वह 

हुआ सवेरा जब जागे तब,

आनंद लोक निमंत्रण देता 

लगन लगे मीरा वाली जब !




रविवार, अक्टूबर 9

अभी शेष है जीना

अभी शेष है जीना


जीने की तैयारी में ही 

लग जाती है सारी ऊर्जा 

घर को सजाते-सँवारते 

थक जाते हैं प्राण 

 मन को सहेजते-सहेजते  

चुक जाती है शक्ति 

फिर कब जियेगा कोई 

और बिखेरेगा प्रेम 

 संगीत सुनेगा 

पंछियों और हवाओं का 

साज बैठाते-बैठाते ही 

शाम ढल जाती है 

अभी सुर सध ही नहीं पाता 

और थम जाती है रफ्तार 

हिसाब-किताब करते 

 रह जाता है पीछे हर बार इजहार !



 

बुधवार, जुलाई 13

सदगुरु दोनों हाथ लुटाता


सदगुरु दोनों हाथ लुटाता

खुद से बढ़कर कुछ भी जग में

पाने योग्य नहीं है, कहता,

उसी एक को पहले पालो

सदगुरु दोनों हाथ लुटाता !

 

जग में होकर नहीं जगत में

सोये जागे वह तो रब में,

उसके भीतर ज्योति जली है

देखे वह सबके अंतर में !

 

भीतर का संगीत जगाता

खोई सी निज याद दिलाता,

जन्मों का जो सफर चल रहा

उसकी मंजिल पर ले जाता !

लूट मची है राम नाम की

निशदिन उसकी हाट सजी है,

झोली भर-भर लायें हम घर

उसको कोई कमी नहीं  है !


ऐसा परम स्नेही न दूजा

अनुपम उसका द्वार खुला है,

बिगड़ी जन्मों की संवारें 

सुंदर अवसर आज मिला है ! 


गुरु पूर्णिमा पर हार्दिक शुभकामनाओं सहित


शुक्रवार, फ़रवरी 18

ऋतु मदमाती आई पावन

ऋतु मदमाती आई पावन


महुआ टपके रसधार बहे

गेंदा गमके प्रसून उगे,

महके सरसों गुंजार उठे

घट-घट में सोया प्यार जगे !


ऋतु मदमाती आई पावन

झंकृत हो तेरा-मेरा मन,

बिखराई रंगों ने  सरगम 

संगीत बहा उपवन-उपवन !


जागे पनघट जल भी चंचल

है पवन नशीली हँसा कमल,

भू लुटा रही अनमोल कोष

रवि ने पाया फिर खोया बल !


जीवन निखरा नव रूप धरा

किरणों ने नूतन रंग भरा,

सूने मन का हर ताप गया,

हो मिलन, उठा अवगुंठ जरा !


मंगलवार, दिसंबर 8

एकम् सत्य

एकम् सत्य 
चाहो किसी भी रूप में 
किसी आकार में 
अथवा अरूप या निराकार 
वह सबका है 
नहीं अधिकार किसी को भी 
करे आहत अन्य की भावना 
आक्रांता बन तोड़े आस्था के स्थल 
मुखरित होता है वह चैतन्य 
भक्ति, करुणा और प्रेम में 
फिर क्योंकर एक का समर्पण
दूसरे की आँख में खटकता है 
सत्य एक ही है पर अनेक मार्गों से मिलता है 
किसी पुष्प गुच्छ की मानिंद 
गुँथे हैं सभी पंथ और मत 
मानवता के मंदिर में 
हरेक अपनी महिमा में आप ही महकता है 
फिर भी पूरक है दूजे  का 
विरोधी नहीं 
जिस दिन स्वीकार होगा 
उसी प्रकार जैसे
 स्वीकारते हैं संगीत और शिल्प 
आनंद लेते हैं विविधताओं का 
हर पंथ अनूठा है 
सार सबका एक है 
प्रेम जगाना है अंतर में 
आनंद उसी की परिणति है !

 

शनिवार, अक्टूबर 31

अगम, अगोचर बहे सदा ही

अगम, अगोचर बहे सदा ही

सुर-संगीत की तरणि बहती

है अजस्र वह धार परम की,

निशदिन कोई यज्ञ चल रहा

अगम, अगोचर बहे सदा ही !

 

भीगे, डूबे, उतराए उर

पोर-पोर हो सिक्त देह का,

सुन सकते तो धरो कान अब

स्वाद चखो फिर मुक्त नेह का !

 

चुक जाती वह धार नहीं यह

इक अखंड. अनंत सलिला है,

युगों-युगों से तट पर जिसके

करुणा प्रीत बही अनिला है !

 

इसी घाट पर गोपी थिरकी

वंशी की भी तान छिड़ी थी,

स्वीकृत राम की शक्ति पूजा

समाधि अंतिम यहीं घटी थी !

 

गोदावरी, नर्मदा, यमुना

नाम भिन्न पर घाट वही है,

लक्ष्य एक एक ही स्रोत है

हर राही का बाट यही है !   

रविवार, जुलाई 5

गुरू प्राकट्य सूर्य समान

गुरू  प्राकट्य सूर्य समान

गुरु की गाथा कही न जाये
शब्दों में सामर्थ्य कहाँ है,
पावन ज्योति, विमल चांदनी 
बिखरी उसके चरण जहाँ हैं !

गुरू  प्राकट्य सूर्य समान
अंधकार अंतर का मिटाए,
मनहर चाँद पूर्णिमा का है 
सौम्य भाव हृदय में जगाए !

सिर पर हाथ धरे जिसके वह
जन्मों का फल पल में पाता,
एक वचन भी अपना ले जो
जीने का सम्बल पा जाता  !

महिमा उसकी अति अपार है
बिन पूछे ही उत्तर देता,
सारे प्रश्न कहीं खो जाते
अन्तर्यामी सद्गुरु होता !

दूर रहें या निकट गुरू के
काल-देश से है अतीत वह,
क्षण भर में ही मिलन घट गया
गूंज रहा जो पुण्य गीत वह !

पावन हिम शिखरों सा लगता
शक्ति अटल आनंद स्रोत है,
नाद गूंजता या कण-कण में
सदा प्रदीप्त अखंड ज्योत है !

वही शब्द है अर्थ भी वही
भाव जगाए दूसरा कौन,
अपनी महिमा खुद ही जाने
वाणी हो जाती स्वयं मौन !

निर्झर कल-कल बहता है ज्यों
गुरू से सहज झरे है प्रीत,
डाली से सुवास ज्यों फैले
उससे उगता मधुर संगीत !

धरती सम वह धारे भीतर
ज्ञान मोती प्रेम भंडारे,
बहे अनिल सा कोने-कोने
सारे जग को पल में तारे  !

शुक्रवार, जून 19

सच की तलाश


सच की तलाश 

सच है खाली आकाश सा... 
शून्य !
तभी उसे भरा जा सकता है झूठ अथवा मिथ्या से 
जैसे नींद में जब सब खो जाता है मन से 
तो स्वप्न उसे भर देते हैं 
जो मिथ्या होते हुए भी 
देते हैं सच का आभास !

सच कोरे कागज सा है 
जिस पर शब्दों को अंकित करें तो 
पढ़ना होता है खाली जगह में 
दो शब्दों के मध्य सच को !

संगीत के स्वरों में जो अंतराल है 
जिसका कोई उत्तर नहीं 
सच ऐसा सवाल है !

 बिखरा है चहुँ ओर
पर उसे महसूस करना हो तो 
मिथ्या का साधन चाहिए 
जहाँ से तीर चलाती है माया 
उस इच्छा का कारण भी !

 दीवारें उठ गयी हों 
कितनी ही ऊँची 
सच को बाँध नहीं पातीं 
झांकता रहता है हर दरार से सच 
बस उस ओर नजर नहीं जाती ! 


सोमवार, दिसंबर 31

नए साल की दुआ

बीता बरस जरूर है
बीत न जाये प्यार,
आने वाले साल में
खुशियाँ मिलें हजार ।

जंग लगे न सोच पर
बना रहे उल्लास,
हर पल यहाँ अमोल है
जो भी अपने पास ।

श्वासों में विश्वास हो
उर में सुर संगीत,
कदमों में थिरकन भरी
कहता जीवन गीत ।

सुख की चादर ओढ़ कर
दुख न आये द्वार ,
पलकों के अश्रु बनें
अधरों पर मुस्कान ।

गुरुवार, फ़रवरी 5

सुर में भरकर गा लेना है

सुर में भरकर गा लेना है


प्रस्तर में मूरत तो है ही
केवल व्यर्थ हटा देना है,
इस जीवन में अर्थ घटेगा
केवल व्यर्थ घटा देना है !

शब्दों में ही छुपा गीत है
केवल उन्हें बिठा देना है,
छंदों से संगीत बहेगा
सुर में भरकर गा लेना है !

माटी में ही गंध छिपी है
उपवन एक बना लेना है,
सुमनों से ही मधु टपकेगा
भ्रमरों को चुरा लेना है !

हर अंतर में प्रीत छिपी है
नयनों में बसा लेना है,
हाथों में सौभाग्य की रेखा
आगे बढ़कर पा लेना है !