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मंगलवार, अप्रैल 15

खो गये वे शब्द सारे

खो गये वे शब्द सारे 


खो गये वे शब्द सारे 


नाव हम जिनकी बनाकर 

पहुँच जाते थे किनारे !


अब यहाँ लहरें व हम हैं 

डूबने में कहाँ  ग़म है, 

छू लिया जिसने तली को 

संस्तर हो गये बेगाने !


खो गये वह शब्द सारे 


नीड़ जिनसे हम बनाकर 

श्रम मिटाकर शरण धारे !


अब यहाँ विस्तृत गगन है 

उड़ें जिसमें यह लगन है, 

पा लिया जिसने फ़लक को 

नीड़ हो गये बेगाने !


खो गये वे शब्द सारे 


ढाल जिनकी हम बनाकर 

झेलते थे दंश सारे ! 


अब यहाँ केवल ख़ुशी है 

महकती सी ज़िंदगी है, 

पा लिया है तोष जिसने 

युद्ध हो गये बेगाने !


गुरुवार, अप्रैल 28

नीड़ बनाना चाहे चिड़िया

नीड़ बनाना चाहे चिड़िया

जाने बनी है किस माटी की
बड़ी हठीली, जिद की पक्की,
नन्हीं जान बड़ी फुर्तीली
लगती है थोड़ी सी झक्की !

सूखे पत्ते, घास के तिनके
सूखी लकड़ी, कपड़े लत्ते
चोंच में भर-भर लाती चिड़िया
नीड़ बनाना चाहे चिड़िया !

बाहर पूरी कायनात है
चाहे जहाँ बनाये घर वो  
न जाने क्यों घर के भीतर
बसना उसको भाए अब तो !

पूजा वाली शेल्फ पे बैठी
कभी ठिकाना अलमारी पर
इधर भगाया उधर आ गयी
विरोध जताती चीं चीं कर !  

हार गए सभी किये उपाय
तोड़ दिया घर कितनी बार
लेकिन उसका धैर्य अनोखा
फिर-फिर लाती तिनके चार !

बंद हुआ जो एक मार्ग तो
झट दूजा उसने खोज लिया
खिडकी की जाली से आयी 
कैसे निज तन को दुबलाया !

शायद उसको जल्दी भी हो
अब नयी जगह ढूंढे कैसे
अप्रैल आधा बीत गया है
घर बस जाये जैसे तैसे !

अनिता निहालानी
२९ अप्रैल २०११