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रविवार, दिसंबर 8

हम और वह


हम और वह


दिये सबूत हजारों खुद के होने के 
लाख उपायों से हम नकारे जाते हैं


हजारों नेमतें लुटा रहा वह कब से 
फटे दामन यहाँ हम दिखाए जाते हैं 


युगों से कर रहा इशारों पर इशारे 
 बने अनजान अम्बर निहारे जाते हैं 


संग लिए जाता है बाँह पकड़ कोई 
हाथ बच्चे की तरह  छुड़ाए जाते हैं 


हर एक पल है नजरे इनायत हम पर 
 पीठ हम बेखुदी में दिखाए जाते हैं 


माना कि मद्धिम है उसकी आहट बहुत 
 सवारी विचारों की निकाले जाते हैं 


है हुकूमत उसी की जर्रे जर्रे पर 
 ‘मैं’ का परचम यूँही उड़ाए  जाते हैं 


  बता सकता था उससे मिलने का सबब 
उस फकीर से  किस्मत पढ़ाये जाते हैं 


सुना है खुद के पार जाकर मिलता है 
खड़े तट पे इसी हम बुलाये जाते हैं 


झीना पर्दा  था दरम्यां, गिरा  देते 
ऊँची दीवारें भी चुनाये जाते हैं 



मंगलवार, मार्च 12

बिखरा दूँ, फिर मुस्का लूँ



बिखरा दूँ, फिर मुस्का लूँ 


खाली कर दूँ अपना दामन
जग को सब कुछ दे डालूँ, 
प्रीत ह्रदय की, गीत प्रणय के
बिखरा दूँ, फिर मुस्का लूँ !

तन की दीवारों के पीछे
मन मंदिर की गहन गुफा,
जगमग दीप उजाला जग में
फैला दूँ, फिर मुस्का लूँ !

अंतर्मन की गहराई में
सुर अनुपम नाद गूंजता,
चुन-चुन कर मधु गुंजन जग में
गुंजा दूँ, फिर मुस्का लूँ !

भीतर बहते मधुमय नद जो 
प्याले भर-भर उर पाता,
अमियसरिस रस धार जगत में
लहरा दूँ, फिर मुस्का लूँ !

हुआ सुवासित तन-मन जिससे
 भरे खजाने हैं भीतर
सुरभि सुगन्धित पावन सुखमय
छितरा दूँ, फिर मुस्का लूँ !


सोमवार, अक्टूबर 10

क्या दमन ही आज की पहचान है


क्या दमन ही आज की पहचान है


मूल्य बदले ब्रांड में बिक रहा इंसान है
क्या दमन ही आज की पहचान है !

सर्वमान्य सच बनी है, मनुज की आधीनता
मुक्त होना दूर अब तो, सज रही है दासता

जल रहा जग, लोभियों का यह महाशमशान है
क्या दमन ही आज की पहचान है !

आधुनिक होना शरम को, ताक पर देना है रख
भागते रहना सुबह से शाम तक, फिर बेसबब

क्रूर हिंसा, वासना को पोषणा अब शान है
क्या दमन ही आज की पहचान है !

मौन हैं जिनके सहारे, सौंप डालीं कश्तियाँ
सिर झुकाए झेलतीं हैं, दर्द सारी बस्तियां

तोड़ता दम लोक का हर आखिरी निशान है
क्या दमन ही आज की पहचान है !

तोड़ डाले हौसले व हक सभी प्रतिरोध के
रौंधकर सपने, किये हैं मूक स्वर आक्रोश के

एक अनदेखी दिशा से बढ़ रहा तूफान है  
क्या दमन ही आज की पहचान है !

गुरुवार, जून 9

बीतेगा यह दौर भ्रमों का


बीतेगा यह दौर भ्रमों का


घोर तिमिर छाया है नभ में
तारा एक न चन्द्र चमकता,
काले असुरों से घन बादल  
मार्ग न कोई कहीं सूझता !

अंधकार में घूमा करती
दुर्दमन की दानवी छाया,  
मोह ग्रस्त है सोया जग यह
आवेशित कर हंसती माया !

एक किरण नन्ही सी कोई  
अदृश्य पर जले रात-दिन,
एक आँख कभी साथ न छोड़े
नजर टिकाये रहती पल-छिन !

वही किरण पथ दिखलाएगी
राह नजर फिर आ जायेगी,
भ्रम में डूबे जन मानस को
वही मार्ग पर ले आयेगी !

बीतेगा यह दौर भ्रमों का
विश्वासों की फिर जय होगी,  
आरोपों, प्रत्यारोपों की
दुखद श्रंखला खंडित होगी !  

सब मिल कर सहयोग करेंगे  
सत्यमेवजयते  बोलेंगे,
तज स्वार्थ संकीर्णताओं को
बनके प्रेम प्रपात बहेंगे !

ऋषियों, मुनियों का यह भारत
भ्रष्ट राष्ट्र न कहलायेगा,
भीतर से ही  तृप्त हुआ जो
लोभ उसे क्या छल पायेगा !

अनिता निहालानी
९ जून २०११