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शुक्रवार, जून 7

एक कतरा प्रेम

एक कतरा प्रेम 


बचपन में हम झगड़ते हैं 

यौवन में कुछ न कुछ पकड़ते हैं 

वह तो बाद में पता चलता है 

हक़ीक़त में जिसकी तलाश है 

वह न झगड़ने से मिलती है

 न पकड़ने से !


वह तो हवाओं में 

झूमने की कला है !


बारिश में भीगने 

आँखों से बतियाने 

हाथ में हाथ डाले 

हरी घास पर 

डोलने में हर बार 

भीतर कुछ पला है !


जो न था पास, जब

कई अपने पीछे छूट गये 

कुछ सपने बेवजह ही टूट गये !

 

सत्य है राम का नाम

 सुना न जाने कितनी ही बार 

 पर क्यों फुला लिया मुँह 

जब आये थे राम प्रेम बनकर

जीवन पथ पर  राह दिखाने !


जिस प्रेम का एक कतरा भी 

छू जाये मन को  

तो गूँजने लगते हैं मीठे तराने !


उस एक के लिए ही 

हर झगड़ना था शायद 

उसे ही पकड़ना था 

अब जाना है राज दिल ने 

यूँ ही ‘मैं’ का वह अकड़ना था  !




रविवार, अगस्त 30

शिशु और वृद्ध

  शिशु और वृद्ध 

शैशव नहीं जानता दुनियादारी 

वह बेबात ही मुस्कुराता है 

पालने में पड़े-पड़े.. 

और भूखा हो जब पेट तो 

जमीन आसमान एक कर देता है !

उसका रुदन बंटा नहीं है दिल और दिमाग में अभी 

बालक होते-होते बुद्धि सुझाने लगती है 

झूठ और सच का फर्क 

बढ़ती ही जाती हैं दूरियां दिल और दिमाग की 

सीख लेता अपमान या ताड़ना से बचने के लिए 

असत्य का आश्रय लेना 

जन्म होता है फिर पाखंड का 

पर कभी भी सम्भावनाएं मृत नहीं होतीं 

जिन्दा रहता है निर्दोष बचपन 

ताउम्र हरेक के भीतर 

दूरी जितनी बढ़ेगी जिससे 

दुःख उसी अनुपात में बढ़ेगा 

दुखी होने या रहने को 

जब एक हथियार की तरह इस्तेमाल करता है व्यक्ति 

तब गिरना काफी हो गया  

पर कभी न कभी मुक्ति की चाह

अपना सिर उठाती है 

दुःख से मुक्ति, अहंकार से मुक्ति का ही दूसरा नाम है 

और यात्रा यदि जारी रही तो 

लौट आता है बचपन 

एक बार फिर तृप्त जीवन में 

वृद्धावस्था के ! 


गुरुवार, नवंबर 15

बचपन लौटा था उस पल में



बचपन लौटा था उस पल में



बचपन को ढूँढा यादों में
बाल दिवस पर नगमे गाये,
मन के गलियारों में कितने
साथी-संगी खड़े दिखाए !

रोते हुए किसी बच्चे के
पोँछे आँसू और हँसाया,
नन्ही सी ऊँगली इक थामी
दूर गगन में चाँद दिखाया !

बचपन लौटा था उस पल में
भीतर कोई खेल रहा था,
बाहर मुस्काती थीं आँखें
जीवन लास्य उड़ेल रहा था !

फुटपाथों पर बीते बचपन
इससे बड़ी न पीड़ा होगी,
खिल सकती थी जो बगिया में
शैशव में ही कली तोड़ दी !

होनहार बिरवान सभी हैं
जरा उन्हें सिखलाना होगा,
बचपन खो जाये न अधखिला
मार्ग सही दिखलाना होगा !

तन उर्जित है जोश भरा मन
बन कुम्हार बस गढ़ना भर है,
शिशु के भीतर छुपा युवा है
दो चार कदम बढ़ना भर है !

शुक्रवार, अगस्त 31

उन सभी युवाओं को समर्पित जो विवाह बंधन में बंधने वाले हैं




 यह बंधन तो प्रेम का बंधन है 

बचपन से किशोर फिर युवा होते तन
फिर भी रहे वही बच्चों वाले प्यारे से मन
उन्हीं मासूम मनों के बंधन में बंधे हो तुम दोनों
एक-दूसरे का सम्बल बनकर
देखभाल और परख कर
खूबियाँ और कमियां
सहकर छोटी-बड़ी कमजोरियां
संग-संग चलने का निर्णय है तुम्हारा
बनना चाहते हो हर सुख-दुःख में
इकदूजे का सहारा
निष्ठा और समर्पण
 इन दो स्तम्भों पर टिका है यह बंधन
कुछ अधिकारों और कुछ कर्त्तव्यों का करना है निर्वाह
मैत्री और साझेदारी का नाम है विवाह
सुनहरे भविष्य की नींव है यह प्रथा
मिटाती है दिलों से अधूरेपन की व्यथा
दो नहीं अबसे एक हो तुम
दो ‘मैं’ से मिलकर बना है एक समर्थ ‘हम’
विवाह की पावनता को बरकरार रखना
सदा दूजे को दिया करार रखना
थोड़े में कहें तो अधरों पर मुस्कान
और दिल में ढेर सारा प्यार रखना !


शुक्रवार, अगस्त 28

राखी का उत्सव



राखी का उत्सव

सावन की पूनम जब आती है
साथ चला आता है
बचपन की यादों का एक हुजूम
नन्हे हाथों में बंधी
सुनहरी चमकदार राखियाँ
और मिठाई से भरे मुँह
उपहार पाकर सजल हुए नेत्र
और मध्य में बहती स्नेह की अविरत धारा
एक बार फिर आया है राखी का त्योहार
लेकर शुभभावनाओं का अम्बार
खुशियाँ भरें आपके जीवन में ये नेह भरे धागे
जीवन का हर क्षण सौभाग्य लिए जागे 

शुक्रवार, जनवरी 9

एक अनोखा बचपन

एक अनोखा बचपन

नन्हा पुनः आकाश को एकटक देखता पाया गया, माँ ने जब सारा घर छान लिया तो उसे ध्यान आया कि कहीं पिछली बार की तरह वह बगीचे में घास पर लेट कर आकाश की नीलिमा में तो नहीं खो गया I आहट पाते ही वह चौंक कर उठ बैठा, काले लम्बे व घने केशों से सजा उसका साँवला चेहरा व बड़ी-बड़ी आंखें सभी को मंत्र मुग्ध कर लेती थीं I
“बेटा, तू आकाश में क्या खोजता फिरता है?
“माँ, मैं आकाश के पार जाना चाहता हूँ, जाने क्या है उसके पार, तुम जानती हो क्या?”
माँ खिलखिला कर हँस पड़ी. “वहाँ कुछ भी नहीं है बेटा, यह नीला रंग भी तो आभास मात्र है I”
“नहीं, वहाँ कुछ है, जरूर कुछ है, एक दिन मैं उसको ढूँढ निकालूँगा I”
ठीक है, अभी तो तुझे स्कूल के लिये तैयार होना है I
स्कूल पहुंचा तो मित्रों ने घेर लिया, आज भी उसे दो छात्रों के बीच मध्यस्थता करानी थी I उसका निर्णय सब आँख मूंद कर मानते थे I अध्यापक भी उसकी निर्दोष आंखों और तीव्र बुद्धि से प्रभावित थे I एक वर्ष में दो कक्षाएं पास करता हुआ वह आठ साल की उम्र में छठी का विद्यार्थी था I बड़ी कक्षाओं के विद्यार्थी भी उससे बातें करते अक्सर देखे जा सकते थे I जब कोई उससे पूछता वह बड़ा होकर क्या करेगा तो सदा एक ही जवाब वह मुस्कुराते हुए देता था, मैं दूर देशों तक लोगों से मिलने जाऊँगा, वे मेरी प्रतीक्षा कर रहे हैं I पूछने वाला चकित हो जाता तो वह हँस पड़ता, बच्चे के मुँह से निकली बात को महत्वहीन समझ कर लोग भुला देते I
छोटी बहन उसकी सबसे बड़ी प्रशंसिका थी, जब तक वह घर में रहता आगे-पीछे घूमती रहती, फिर भी कभी-कभार उनमें झगड़ा हो जाता तो वह चुपचाप अपने काम में लग जाता जैसे कुछ हुआ ही न हो I बहन थोड़ी देर मुँह फुलाए रखती फिर खुद ही धीरे से आकर बात करने लगती क्योंकि वह तो तब तक झगड़े की बात भूल ही चुका होता था I दोनों मिल कर खेलों की नई-नई योजनाएँ बनाने लगते I वह जब ध्यान मग्न होता तो बहन उसका चेहरा देखती रह जाती, उसे छोटी उम्र से ही अहसास हो गया था कि उसका भाई अन्य सब बच्चों से अलग है I जब बच्चे बिना किसी जरूरत के फूल-पत्ती व टहनियाँ तोड़ते हुए निकल जाते वह पूजा के लिये फूल तोड़ने में भी झिझकता था, एक चींटी तक को मारना भी उसे मंजूर नहीं था, स्कूल में पैर की ठोकर से फुटबाल उछालते समय जब अन्य छात्रों को खुशी से भरे देखता तो उसका कोमल हृदय कांप जाता, वह अपने पैरों की ओर देख कर सोचता इनसे किसी को ठोकर मारना तो दूर हल्की सी चोट भी नहीं लगाई जा सकती I जब दूसरे बच्चे मैदान में धमा-चौकड़ी मचाते वह नयन मूंदे जाने क्या सोचा करता नहीं तो निकट के मंदिर के पुजारी की गतिविधियों को ध्यान से देखा करता I कभी-कभी मुहल्ले के बच्चे खेल खत्म कर उसके निकट आ बैठते और वह उन्हें काल्पनिक मूर्ति की पूजा करना सिखाता, ध्यान करना सिखाता I कई श्लोक उसे कंठस्थ थे अपनी मधुर आवाज में जब गाता सब मौन हो सुनने लगते I
पिता एक सरकारी दफ्तर में अधिकारी थे, उनका सामान बैठक में बड़ी मेज पर एक छोटी अटैची में रखा रहता था, कुछ फाईलें, जरूरी कागजात, पेन, चश्मा तथा चाबियाँ यही सब था उस सामान में I उसने देखा कि पिता जब दफ्तर के लिये तैयार होते हैं तो सारा घर उनके आगे पीछे घूमता है, माँ खाना बनाते-बनाते उनके कपड़े आदि रख जाती, नौकर जूते पॉलिश कर ले आता I पिता गम्भीर मुद्रा में सब पर हुकुम चलाते I एक दिन सोने से पहले उसने अटैची से सारा सामान निकाल कर अपने खिलौने उसमें रख दिए, पिता ने अगले दिन रोज की तरह अटैची उठाई व दफ्तर चले गए I वहाँ अपने सामान की जगह खिलौने देख पहले तो सकपका गए पर साथियों को हँसते देख खुद भी हँसने लगे I घर आने तक सोचते रहे कि उनके बेटे ने ऐसा क्यों किया, शायद वह उन्हें समझाना चाहता था कि जिन फाइलों को लेकर वह इतने गम्भीर हो जाते हैं, वे खिलौनों से बढकर कुछ नहीं I काम को अति महत्व देने से जीवन हाथ से छूट जाता है I घर आकर बालक को बुलाया तो वह चुपचाप आकर खड़ा हो गया, इशारे से उन्होंने पूछा, मेरा सामान कहाँ है? वह हाथ पकड़ कर अपने कमरे में ले गया, जहाँ सलीके से सारी फाइलें व अन्य चीजें रखीं थीं I पुत्र की मासूमियत देख वह मुस्कुरा दिए I जीवन का एक सूत्र आज इस नन्हे बालक ने उन्हें पकड़ा दिया था I
उसे दादी से बहुत लगाव था पर उनकी कुछ बातोँ का विरोध करने से वह नहीं चूकता था, चाहे इसके लिये उनके कोप का भाजन भी बनना पड़े I ग्वाले को घर में प्रवेश करने की आज्ञा नहीं थी क्योंकि वह एक हरिजन था I वह जानबूझ कर उसके साथ खेलता कभी उसके घर भी चला जाता I बाद में इसके लिये दादी की डाँट सहनी पड़ती I घर में काम करने वाली छोटी बालिका के साथ भी उसकी सहानुभूति थी, दिन भर उसको काम करते देख उसका मन करुणा से भर जाता I भगवदगीता के श्लोक उसे केवल याद ही नहीं थे वह जीवन में उनका पालन भी कर रहा था I दादी रोज संध्या बेला में एक आसन बिछा कर पूजा की थाली लिये भगवान की प्रतीक्षा करती थी, जाने किस रूप में वह आ जाएँ, इसलिए हर अतिथि को आदर सहित खिलाती व उपहार देती, उसे इस खेल में बहुत मजा आता I परमात्मा के प्रति उसका सहज प्रेम उसके जीवन की हर बात से जाहिर हो रहा था I
उस दिन वह जल्दी-जल्दी स्कूल से लौटा, सुबह उसकी पूजा व ध्यान अधूरा रह गया था क्योंकि घर में कुछ काम था I पर उसने कमरे में जाते ही देख लिया पूजा का स्थान खाली था, माँ ने फिर सब सामान हटा दिया था, माँ भोजन लाई तो उसने मुँह फेर लिया, थोड़ी देर बाद वह सारा सामान ताजे फूलों के साथ रख कर जाने लगी तो उसने कनखियों से उसकी नम आँखों को देखा और वह दौड़ कर उसके गले से लिपट गया I उसे याद आया पिछले हफ्ते ही उसने माँ को नाराज किया था जब स्कूल टूर से लौटने पर उसका खाली बैग देख कर माँ ने पूछा था “तेरे कपड़े कहाँ हैं, ओढ़ने व बिछाने की चादरें व शाल कहाँ हैं?”
कुछ और पूछने का मौका न देते हुए वह मुस्कुरा कर बोला, “मेरे मित्रों को तुम्हारी पसंद बहुत भाती है, मेरा सब कुछ तुम्हीं तो लाती हों माँ I”
पर माँ रोज-रोज की इस लुटाऊ वृत्ति से तंग आ चुकी थी सो खूब डाँट सुनायी I लेकिन दोनों जानते थे कि इस डाँट का असर ज्यादा दिन तक रहने वाला नहीं है I माँ को भय था कि इतना वैराग्य कहीं उसे घर से दूर न ले जाये I ध्यान में डूबे अपने पुत्र को देख कभी उसके शैशवकाल कि वह घटना याद आ जाती जब छत में लगी छड़ से लोहे की भारी जंजीरों सहित उसका लकड़ी का पालना नीचे आ गिरा था वह तो बेहोश ही हो गई थी पर नन्हा शिशु मुस्का रहा था I थोड़ा सा बड़ा होने पर जब वह भाषा का ज्ञान सीख गया उसकी कही हर बात मानता था, वही बालक अब सारा समय मंदिरों, मसजिदों, व चर्चों के चक्कर लगाता रहता था I
माँ पुत्र के इस व्यवहार से चिंतित हो जाती तो वह उसे आश्वस्त करता, माँ के कहने पर उसने पढ़ाई जारी रखी तथा भविष्य में नौकरी के लिये इंटरव्यू देने के लिये भी मान गया, पर उसके जीवन का उद्देश्य स्पष्ट था, वह सरे विश्व के लोगों के जीवन को खुशियों से भर देना चाहता था I

शनिवार, नवंबर 8

ठहर गया है यायावर मन

ठहर गया है यायावर मन


पलक झपकते ही तो जैसे
बचपन बीता बीता यौवन,
सांझ चली आई जीवन की
कंप-कंप जाती दिल की धड़कन !

जाने कब यह पलक मुंदेगी
किस द्वारे अब जाना होगा,
मिलन प्रभु से होगा अपना
या फिर लौट के आना होगा !

जो भी हो स्वीकार सभी है
आतुरता से करें प्रतीक्षा,
बोरा-बिस्तर बाँध लिया है
ली विदा दी परम शुभेच्छा !

मन में एक चैन पसरा है
कुछ पाने की आशा टूटी,
ठहर गया है यायावर मन
मंजिल वाली भाषा छूटी !

जीवन जैसा मिला था इक दिन
वैसा सौंप निकल जाना है,
एक स्वप्न था बीत गया जो
कह धीमे से मुस्काना है !

जिसको भी अपना माना था
यहीं मिला था यहीं रहेगा,
मन यह जान हुआ है हल्का
 क्या था अपना जो बिछड़ेगा !  

लीला ही थी इक नाटक था
जीवन का जो दौर चला है,
रोना-हँसना, गाना, तपना
एक स्वप्न सा आज ढला है !






गुरुवार, फ़रवरी 28

शुभ विवाह


हाल ही में एक विवाह में सम्मिलित होने का अवसर मिला, कुछ अलग सा अनुभव हुआ,  क्या था वह अनुभव, आप भी पढ़िये और शामिल हो जाइये इस विवाह में...


शुभ विवाह

साथी बचपन के बंधे
आज परिणय सूत्र में,
मुदित माँ करें स्वागत
द्वार पर अति प्रेम से !
एक अनोखे विवाह का
साक्षी बना संसार,
जहाँ दुल्हन ही निभाती
अन्य सभी व्यवहार !
बागडोर सम्भाले निज जीवन की
करती बड़ी कम्पनी में प्रतिष्ठित नौकरी
आत्मविश्वास भरा कदमों में
भरे स्वप्न सुंदर आँखों में... !
श्रम की आभा से दीप्त होती
माँ-पिता को आश्वस्त करती,
नए युग की नई दुल्हन
भारत का नया भविष्य गढ़ती !
न ही कोई झिझक न संकोच.
न डर कहीं नजर आता,
सधे कदमों में उसके
सुंदर भविष्य ही खबर लाता !
अंग्रेजी, हिंदी, असमिया फर्राटे से बोलती
आँखों ही आँखों में दिल के राज खोलती,
दुल्हन यह अनोखी न जरा भी शर्माती  
निज विवाह का निमंत्रण अकेले देने जाती ! 
भाई संग महाराष्ट्रीयन भाभी
आए असम पहली बार,
घूमें, छू लें असम की बयार
नहीं चाहती पड़े उन पर कोई भी भार !
दीदी भी आई गुवाहाटी से, करुणा
जितना हो सके है लुटाती
पिता आजमगढ़ी आनंद और
माँ असम की भारती !
असम और यूपी का अनोखा संगम
शाम को संगीत, सुबह हुआ जोरन
राष्ट्रीयता का प्रतीक यह शुभ विवाह
देख जिसे निकले, बस वाह ! वाह !
ले हाथों में हौराई, जहां सजे बन्दनवार
दुल्हन खड़ी लाल जोड़े में तैयार
आया दूल्हा बन राजकुमार
खुशियों से भर गया सारा परिवार !

शुक्रवार, जुलाई 27

कवि शेखर सुमन- 'खामोश खामोशी और हम' में


प्रिय ब्लोगर साथियों,
खामोश खामोशी और हम यह पुस्तक अभी हाल में ही में आदरणीया रश्मि प्रभा जी के संपादन में छपी है. इसमें अठारह कवियों व कवयित्रियों की रचनाएँ सम्मिलित हैं. मैं अपनी अगली सत्रह पोस्ट में इनमें से हरेक कवि के कविता संसार से आपका परिचय कराना चाहती हूं, आशा है सुधी पाठकों का सहयोग उनकी प्रतिक्रियाओं के रूप में मिलेगा, रश्मि जी, आपसे भी अनुरोध है कि इस श्रंखला को पढ़ें व आपने सुझाव दें.
पुस्तक के पहले कवि हैं- शेखर सुमन, पटना में जन्मे युवा कवि शौक के लिये लिखते हैं, इंजीनियर हैं व पोस्ट ग्रेजुएशन कर रहे हैं. उनकी छह कवितायें पुस्तक में हैं.
पहली कविता का शीर्षक है, “हाँ, मुसलमान हूँ मैं” कवि उन मुसलमान भाइयों को यह कविता समर्पित करता है जिनको उनकी कौम के चंद गुनहगारों के कारण शक की निगाह से देखा जाता है.
...   ...   ...
ये शक भरी निगाह मेरा इनाम नहीं
इस धरती को मैंने भी खून से सींचा है
मेरे भी घर के आगे एक आम का बगीचा है
.....
हरी भरी धरती से सोना उगता किसान हूं मैं
गर्व से कहता हूँ, हाँ मुसलमान हूँ मैं

शेखर सुमन की कविताओं में बचपन की याद रह रह कर आती है.
“वो लम्हे शायद याद न हों” नामक कविता में वह खिलौने, स्कूल में बिताया पहला दिन, दादी की प्यार भरी पप्पी याद करते नजर आते हैं तो “माँ” नामक कविता में भी बचपन को बुलाते हैं.

मेरी सारी दौलत, खोखले आदर्श
नकली मुस्कुराहट
सब छीनकर
दो पल के लिये ही सही
मेरा बचपन लौटा देती है माँ

....
परेशान वह भी है अपनी जिंदगी में बहुत
पर हँसी के पर्दे के पीछे
अपने सारे गम भुला देती है माँ

आज की भागदौड़ की जिंदगी में हमारे बुजुर्ग अकेलेपन का अभिशाप भोगने को विवश हैं, “तुम कहाँ हो” नामक कविता में एक वृद्ध पिता अपने बेटे को ढूँढता हुआ गुहार लगाता है-

तुम शायद भूल गए वो पल
जब उन नन्हें हाथों से
मेरी ऊँगली पकड़ कर तुमने चलना सीखा था
....
आज जब तुम बड़े हो गए हो
जिंदगी की दौड़ में कहीं खो गए हो
आज जब मैं अकेला हूँ वृद्ध हूँ लाचार हूँ
मेरे हाथ तुम्हारी उँगलियों को ढूँढते हैं
..
दिल आज भी घबराता है
कहीं तुम किसी उलझन में तो नहीं
तुम ठीक तो हो न  

कवि शेखर सुमन की पाँचवी कविता है, “थके  हुए बादल “

कुछ थके हरे बादल मैं भी लाया हूँ
यूँ ही चलते चलते हथेली पर गिर गए थे
...
तुन्हारी हर खिलखिलाहट के साथ बरसना
शायद इन्हें भी अच्छा लगता था अब तो जैसे ये यादें
टूटे पत्तों की तरह हो गयी हैं
जिन्हें बारिश की कोई चाह नहीं
...
तभी मैं सोचा करता हूँ
ये बारिश आखिर मेरे कमरे में क्यों नहीं होती

आज के खौफनाक मंजर को दिखाती है इनकी अंतिम कविता “नयी दुनिया”

ये कैसी दुनिया है
जहाँ मनुष्य ही मनुष्य का दुश्मन है
कैसा शोर है ये चारों तरफ
...
..
क्यूँ आज इंसान इंसान से डरता है
हृदय की कोमल धरा पर काँटे क्यों उग आये हैं
जीवन के मायने कुछ बदल से गए हैं
अब अपनी जीत शायद दूसरों की हार में है
...
यह वो दुनिया तो नहीं जो ईश्वर ने बनायी थी
यह तो कोई और ही दुनिया है
कवि शेखर सुमन की कविताये पढ़ते हुए बरबस ही भविष्य के लिये आशा की एक उम्मीद जगती है, कवि को इन सुंदर कविताओं के लिये बधाई व शुभकामनायें !