विप्लव आज अवश्यम्भावी
घंटनाद मंदिरों के अब बन जाने दो सिहंनाद,
आज वही युग आया जब युद्ध में हो संवाद !
जाग उठे अब जन जन ऐसी रणभेरी बजने दो,
क्रांति बिगुल बजाए ऐसा हर मस्तक सजने दो !
विप्लव आज अवश्यम्भावी युग बीते हम सोये
कैद हुए निज पीड़ा में पाया क्या बस रोये ?
भुला दिये मूल्यों का सम्मान पुनः करना है,
लेकिन पहले जाग के भीतर स्वयं अभय भरना है !
भीतर पाकर परम उजाला जग में उसे लुटाएं,
उसी शांति से उपजे कलरव क्रांति गीत बन जाएँ !
कोना कोना गूंज उठे फिर ऐसा रोर मचे,
उखड़ें सड़ी गली रीतियाँ जमके शोर मचे !
हाथ उठा आज धरा को अम्बर से मिलने दो
चिन्मय को मृण्मय का संदेसा पा खिलने दो !
अनिता निहालानी
१५ जनवरी २०११