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रविवार, मार्च 2

अब बहुत हुआ लुकना-छिपना


अब बहुत हुआ लुकना-छिपना

कब अपना घूंघट खोलेगा 
कब हमसे भी तू बोलेगा, 
राधा का तू मीरा का भी 
कब अपने सँग भी डोलेगा! 

अपना राज छिपा क्यों रखता 
क्यों रस तेरा मन ना चखता, 
जब तू ही तू है सभी जगह 
इन नयनों को क्यों ना दिखता! 

अब और नहीं धीरज बँधता
मुँह मोड़ भला क्यों तू हँसता, 
अब बहुत हुआ लुकना-छिपना  
तुझ बिन ना अब यह दिल रमता! 

जो तू है, सो मैं हूँ, सच है 
पर मुझको अपनी खबर कहाँ, 
अब तू ही तू दिखता हर सूं 
जाती है अपनी नजर जहाँ ! 

यह कैसा खेल चला आता 
तू झलक दिखा छुप जाता है, 
पलकों में बंद करूं कैसे 
रह-रह कर बस छल जाता है ! 

मंगलवार, अक्टूबर 1

मिट जाएँगे संशय उर से

मिट जाएँगे संशय उर से 


झाँकें कान्हा के नयनों में

प्रेम समंदर एक झलकता, 

डूब गई थी राधा जिसमें 

थाह न कोई जिसकी पाता !


अनगिन नाम दिये हैं जग ने

बाला-लाला कहा कन्हाई, 

प्रीत किंतु इतनी असीम है

जाती न शब्दों में बताई !


सुख-दुख दोनों रहे किनारे 

मध्य में आनंद की धारा, 

राधा बनकर जो बहती है 

यमुना तट पर जिसे पुकारा !


आनंद से उपजी है सृष्टि 

कृष्ण वही आनंद का स्रोत, 

हाथ थाम लें, उसे थमा दें  

 मिटेगा दोनों में हर क्षोभ !


कान्हा दिल की गहराई में 

बसा हुआ मीठी धुन टेरे 

कान लगा कर सुनना इसको 

खिल जाएँगे तन-मन तेरे !



बुधवार, सितंबर 18

प्रतीक्षा

प्रतीक्षा 

कान्हा गये गोकुल छोड़ 

उसके अगले दिन 

सुबह सूरज के जगने से पूर्व 

जग गई थीं आँखें 

तकतीं सूनी राह 

लकीरें खींचते स्वचालित हाथ 

फिर एक बार, बस एक बार 

तुम आओगे ? शायद तुम आओ 

कानों में मधुरिमा घोलती आवाज़ 

कागा की !

जैसे राधा का तन-मन 

बस उस एक आहट का प्यासा हो 

युगों से, युगों-युगों से 

उठे नयन उस ओर, हुए नम 

एकाएक प्रकट हुआ वह 

हाँ, वही था 

फिर हो गया लुप्त 

संभवतः दिया आश्वासन 

यहीं हूँ मैं !

यह यमुना, कदंब और बांसुरी 

अनोखे उपहार उसके 

हँस दीं आँखें राधा की 

विभोर मन, पागल होती वह 

संसार पाकर भी नहीं पाता 

और आँखें ढूँढ निकलती हैं 

स्वप्न ! सुनहरे-रूपहले स्वप्न 

जिन्हें सच होना ही है 

वे सच होंगे, प्रतीक्षा रंग लाएगी 

सूरज आएगा, धरती पीछे 

रचे जाएँगे गीत 

नये, अप्रतिम, अछूते 

हर युग में ! 


बुधवार, सितंबर 6

कृष्ण रंग में डूबा अंतर



कृष्ण रंग में डूबा अंतर 

श्याम रंग में भीगा अंतर
भीगी मन की धानी चूनर,
कोरा जिसको कर डाला था
विरह नीर में डुबो डुबोकर !

जन्मों से था जो सूखा सा
जैसे कोई मरुथल बंजर,
कैसे हरा-भरा खिलता है
कृष्ण रंग में डूबा अंतर !

एक डगर थी सूनी जिस पर
पनघट नजर नहीं आता था,
काँटों में उलझा था दामन
श्यामल रंग से न नाता था !

भर पिचकारी तन पे मारी
सप्त रंगी सी पड़ी फुहार,
 पोर-पोर शीतल हो झूमा
फगुनाई की बहती  बयार !

रंग दिया किस रंग में आज 
कान्हा रंग रसिया ह्रदय का,
राधा रंग गई, मीरा भी 
हुआ सुवासित कण-कण तन का !



सोमवार, फ़रवरी 13

मौन

मौन 


मौन को गुनो 

मौन से जो झरती है आभा 

उसे ही चुनो 

जैसे गिरते हैं चुपचाप हरसिंगार 

सुवास फैलाते 

मौन के उन क्षणों से भी 

किस अन्य लोक की सुगंध आती है 

जैसे कोई कहे कृष्ण 

तो राधा अपने आप चली आती है 

और इतना ही नहीं 

गौएँ और गवाले भी ! 

भीतर वृंदावन उभर आते हैं 

और महारास घटता है 

कृष्ण का नाम छुपाए है

 सारा ब्रह्मांड 

मौन में भी 

एक साम्राज्य से मिलन होता है 

जो नितांत अपना है 

नि:शब्द जहाँ कोई रस बहता है !


गुरुवार, अगस्त 18

प्रेम की भाषा बोले कृष्ण

प्रेम की भाषा बोले कृष्ण 

नन्द-यशोदा अपलक निरखें 
बाल कन्हैया का शुभ मुखड़ा, 
धन्य हुई ब्रज की धरती पा 
नीलमणि सम चाँद का टुकड़ा ! 

मोर मुकुट पीतांबर धारे 
घुंघराली लट ललित अलकें, 
ओज टपकता मुखमंडल से 
नयनों से ज्यों मधुघट छलकें ! 

प्रतिदिन ग्वालों सँग गोचारण
यमुनातट वंशीवट घूमें, 
वंशी धुन सुन थिरकें ग्वाले 
पशु, पक्षी, पादप मिल झूमें !

कृष्ण, कन्हैया, माधव, केशव
मोहन, गिरधारी, वनमाली, 
अनगिन नाम कई लीलाएं 
वृन्दावन में ही रच डालीं !

प्रेम की भाषा बोले कृष्ण 
प्रेम सुधा में भीगी राधा, 
प्रेमिल बंधन स्नेहिल धागा 
गोकुल में सभी से  बांधा !

रविवार, अगस्त 29

अद्भुत बड़ी कृष्ण की लीला


अद्भुत बड़ी कृष्ण की लीला

मथुरा रोयी होगी उस दिन 

कान्हा चले जब यमुना पार,

जिस धरती पर हुए अवतरित

 दे नहीं पायी उन्हें दुलार !


अभी तपस्या की बेला है 

बारह वर्षों की प्रतीक्षा,

लौट करेंगे कृष्ण किशोर

कंस के कृत्य की समीक्षा !


अभी तो गोकुल जाते कान्ह 

नन्द, यशोदा को हर्षाने,

ग्वालों, गैयों, साथ खेलने

संग गोपियों रास रचाने !


माखन चोरी, मटकी फोड़ी

असुर-वध किये  नित नव लीला,

मनहर नृत्य, बाँसुरी वादन

ब्रज वासी कान्हा रंगीला !


पलक झपकते बीता बचपन

 मथुरा जाने का दिन आया,

तड़पा हर ब्रज वासी का उर

नन्द यशोदा को तड़पाया !


राधा की आँखें बरसीं थीं 

विरहा की पीड़ा थी भारी,

अद्भुत बड़ी कृष्ण की लीला,

 अब तक सारी दुनिया वारी !




शनिवार, मार्च 27

अब समेटें धार मन की

अब समेटें धार मन की 


खेलता है रास कान्हा 

आज भी राधा के संग,  

प्रीत की पिचकारियों से 

डाल रहा रात-दिन रंग !


अब समेटें धार मन की 

जगत में जो बह रही है, 

कर समर्पित फिर उसी के 

चरण कमलों में बहा दे !


हृदय राधा बन थिरक ले  

 बने गोपी भावनाएं,  

उस कन्हैया के वचन ही 

  टेरते हों बंसी बने !


होली मिलन शुभ घटेगा 

तृप्त होगी आस उर की, 

नयन भर कर देख लें फिर 

अनुपम झलक साँवरे की !

 

सोमवार, अक्टूबर 5

बरसेगा वह बदली बनकर

 बरसेगा वह बदली बनकर 

उर में प्यास लिए राधा की 

कदमों में थिरकन मीरा की, 

अंतर्मन में निरा उत्साह 

उसकी बांह गहो !


जीवन की आकुलता से भर 

प्राणों की व्याकुलता से तर, 

लगन जगाए उर में गहरी 

नित नव गीत रचो !


बाँटो जो भी पास तुम्हारे 

कोई हँसी दबी जो भीतर, 

शैशव की वह तुतलाहट भी 

खिल कर राह भरो !


झर जाने दो पीले पत्ते 

सारे दुःख अपने अंतर से, 

तोड़ श्रृंखला जन्मों की हर 

दिल की बात कहो !


दीप जलाये प्रीत का सुंदर 

पग रखो फिर उसके पथ पर, 

गिर जाने दो हर भय, संशय 

उसकी चाह करो !


अब वह मन्दिर दूर नहीं है 

दूरी या देरी होने पर 

किन्तु न करना रोष जरा भी 

उसकी राह तको !


बरसेगा वह बदली बनकर 

कभी प्रीत की चादर तनकर,

ढक लेगा अस्तित्व् को सारे 

उसके संग रहो !


सोमवार, सितंबर 21

नीला अम्बर सदा वहीं था

 नीला अम्बर सदा वहीं था

संशय, भ्रम, भय, दुःख के बादल  

जग को हमने जैसा देखा, 

छिपा लिया था दृष्टि पथ ही 

मन पर पड़ी हुई थी रेखा !


कैसे दिखे विमल नभ अम्बर

आशाओं की ओट पड़ी हो,

कैसे कल-कल निर्मल सरिता 

भेदभाव की भीत गड़ी हो !


दुराग्रहों के मोटे पर्दे 

नयनों को करते हों धूमिल,

नीला अम्बर सदा वहीं था 

जहां छँटे ये काले बादल !


स्रोत खुले जो बंद पड़े थे 

जहाँ गिरी मन से हर बाधा,

बहते हुए प्रीत के दरिया

श्यामल जीवन में थी राधा !


अपनेपन की फसल उगी थी   

दृष्टि मिली यह राज बहा झर, 

जाना, आकर जाने कितने 

बन्द पड़े हैं मन के भीतर !


बुधवार, अगस्त 19

योग और प्रेम

योग और प्रेम 

 

जानने की इच्छा 

खुद को जानने की 

यदि जानने वाले की इच्छा बन जाये 

अर्थात ज्ञाता यदि स्वयं को जानने की इच्छा करे 

तो जो क्रिया करनी होगी उसे 

वही तो योग है !

 

जानने वाला यदि श्याम हो 

जानने की इच्छा राधा है 

जानने की क्रिया ही तो प्रेम है !

 

श्याम को इच्छा जगी स्वयं को देखे 

वह इच्छा ही राधा है 

वह देखना ही प्रेम है !

 

 शिव को इच्छा जगी सृष्टि करे 

वह इच्छा ही ‘शक्ति’ है 

राधा बने तो स्वयं को देखा 

शक्ति बने तो सृष्टि की 

सृष्टि की रचना भी प्रेम ही है !

 

शनिवार, जून 15

कुछ ऐसा है कि




कुछ ऐसा है कि


आँखें बाहर देखती हैं
मन संसार की सुनता है
कान शब्दों में डूबे हैं
और वह भीतर बैठा है !

फिर इसमें कैसा आश्चर्य ?
हम कभी उससे मिले नहीं...
अजनबियों के साथ ही जीवन बिताया
तभी संग रहकर सबके.. सबने खुद को
नितांत अकेला ही पाया !

इसको कभी उसको अपना भी बनाया
पर अपना सा जहाँ में.. एक ना आया
जिसकी तलाश है वह तो कहीं और है
दूर है वहाँ से..अपना जहाँ ठौर है !

फूलों को सराहा निर्झरों  को चाहा
कभी झलक मिली एक पलकें भी मुंदीं
एक किरण रोशनी.. जाने क्या कर गयी
उस ने ही शुभ घड़ी भेजा था पैगाम
सीता का राम वह या राधा का श्याम !


गुरुवार, अप्रैल 19

बहना भूल गया यमुना जल



बहना भूल गया यमुना जल


माधव, मुकुंद, मोहन, गिरधर
नाम-नाम में छुपे प्रीत स्वर,
प्रेम डोर में बाँध, विरह की
परिभाषा गढ़ डाली सुंदर !

युग बीते गूँजे वंशी धुन
ठहर गया है जैसे वह पल,
वन-उपवन भी चित्र लिखित से
बहना भूल गया यमुना जल !

अनुपम, अद्भुत एक अलोना
वैकुंठ से उतर विहंसता,
अंग-अंग से करुणा झरती
नयनों से जो जादू करता !

एक पुकार सुनी अंतर की
राधा ने निज मन दे डाला,
खग, मृग, गौएँ, तरु, तृण वन के  
झूमे, सँग डोले मतवाला !

पाँव धरे, पावन भयी भूमि
उस भूखंड झुकाते माथा,
शत सहस्त्र कंठों ने गायी
थके नहीं गा गाकर गाथा !