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गुरुवार, मार्च 30

एक आभा मय सवेरा



एक आभा मय सवेरा

नींद टूटे, जोश जागे 
हृदय से हर सोग भागे, 
याद में हो मन टिका जब 
टूटते हैं मोह धागे !

प्रेम का सूरज दमकता 
ज्योत्सना बन शांति छाए, 
एक आभा मय सवेरा 
तृप्ति की हर रात लाए !

मुक्त उर से गीत फूटे 
कर्म की ज़ंजीर बिखरे,
मिले जग को प्राप्य उसका 
रिक्त मन की गूंज उतरे !

आस का  दीपक न बुझता 
सहज सम्मुख मार्ग दिखता, 
नहीं मंज़िल दूर कोई 
हर घड़ी वह मीत मिलता !

हर कहीं मौजूद है वह
समय केवल एक भ्रम है, 
कल वही था आज भी है 
वहाँ था जो यहाँ भी है !

रविवार, जनवरी 16

जब जागो तभी सवेरा है

जब जागो तभी सवेरा है 


चढ़ आया हो सूरज नभ पर 

निद्रा में गहन अँधेरा है, 

सही कह गए परम सयाने 

जब जागो तभी सवेरा है !


सोए-सोए युग बीते हैं 

जाने कब आँख खुले अपनी, 

निज हाथों से छलते खुद को 

तज पाते नहीं जब आसक्ति !


कुदरत चेताती है हर पल 

हम आदतों के ग़ुलाम बने, 

गुरु के वचनों को सदा भुला 

मन्मुख होकर जीते रहते !


जब बारी आती तजने की 

हम झट प्रकाश को तज देते, 

वह अंतर्यामी जाग रहा 

दस्तक ना उसके दर देते !


वह हर अभाव को हर लेता 

उसकी छाया में सब पलते, 

कोई कमी नहीं शेष रहे 

यदि उसके जैसे हो पाते !


मंगलवार, जून 12

जीवन में भर दिया सवेरा



जीवन में भर दिया सवेरा

जब-जब तुझे पुकारा दिल ने
छुपा हुआ था वहीं कहीं तू,
उस पुकार में ही दब जाती
होगी, तेरी मंद गुफ्तगू !

जब-जब सुख के पीछे दौड़े
सुखस्वरूप तू वही कहीं था,
उसी दौड़ से दूर निकल गए
क्या तू तब धीरे से हँसा था !

जब-जब अहंकार जगाया
तूने ही तो चूर किया था,
तुझसे दूर चले हम जाएँ
यह तुझको मंजूर नहीं था !

जब-जब भय का दानव जागा
सम्बल से तू ने ही भरा था,
हद से बढ़ी कामना जब-जब
दुःख देकर अज्ञान हरा था !

पल-पल भीतर जाग रहा था
जब-जब अलस प्रमाद ने घेरा
 खींच-खींच कर रहा जगाता
जीवन में भर दिया सवेरा !


बुधवार, जून 15

रोज नया सूरज उगता है


रोज नया सूरज उगता है

प्रतिक्षण नूतन जल ले आती
नदिया रोज नयी होती है,
सदा प्रवाहित अंतर्मन भी  
नव पल्लव सा खिल उठता है !

रोज नया सूरज उगता है
रात्रि नया सवेरा लाए,
नयी सुरभि किसलय ले आते
 ताजा गीत कवि लिख लाए !

बासी मन क्यों लिये घूमते
ज्ञान नया होता है प्रतिदिन,
बासी हर विचार त्याग दें
बासी फूल न होते अर्पण !

छोड़ भूत की कल्मष कटुता
बढ़ आगे नव भाव जगाएं,
नई कल्पना के प्रेम में
पड़ कर नित नूतन हो जाएँ !

कथनी से करनी दुगनी हो
जिह्वा एक, दो कर दे डाले,
नया-नया निर्माण करें नित
फिर उसके चरणों में डालें !

पिटी-पिटाई बात न हो अब  
साहस का हम सँग करें
छोड़ लकीरों को पीछे फिर  
नित नयी मंजिलें तय करें !
अनिता निहालानी
१६ जून २०००