एक आभा मय सवेरा
नींद टूटे, जोश जागे
हृदय से हर सोग भागे,
याद में हो मन टिका जब
टूटते हैं मोह धागे !
प्रेम का सूरज दमकता
ज्योत्सना बन शांति छाए,
एक आभा मय सवेरा
तृप्ति की हर रात लाए !
मुक्त उर से गीत फूटे
कर्म की ज़ंजीर बिखरे,
मिले जग को प्राप्य उसका
रिक्त मन की गूंज उतरे !
आस का दीपक न बुझता
सहज सम्मुख मार्ग दिखता,
नहीं मंज़िल दूर कोई
हर घड़ी वह मीत मिलता !
हर कहीं मौजूद है वह
समय केवल एक भ्रम है,
कल वही था आज भी है
वहाँ था जो यहाँ भी है !
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