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गुरुवार, मई 28

पहली मंज़िल पर बाढ़

पहली मंज़िल पर बाढ़ 



अचानक नहीं आयी थी वर्षा 

सुबह से बादल बने थे 

दे दी थी चेतावनी 

मौसम विभाग ने पिछले ही हफ़्ते 

भले-चंगे घर में बैठे थे हम 

बारिश से कोई परेशानी   

भला क्या होने वाली थी 

शाम होने से थोड़ा पहले 

एक पुरानी सखी पहली बार 

इस घर में मिलने आने वाली थी 

उसे बालकनी व पूरा घर दिखाया 

 छत पर रखे असबाब दिखाए 

तभी दो-चार बूँदे गिरीं तो 

 सीढ़ियों से नीचे कदम बढ़ाये 

डाइनिंग टेबल के इर्दगिर्द 

कॉफ़ी के कप लिए हाथ में 

सुंदर चर्चा में जब लीन थे 

तब तेज बूँदों की लग गई क़तार 

कानों में गूंजता था स्वर 

और सामने वाली बड़ी खिड़की से 

रहे थे निहार 

पत्तों पर गिरती हुई जल धार 

अचानक सीढ़ियों से आयी

पानी गिरने की आवाज़

सोचा नहीं था कि होने लगेगी 

घर के अंदर ही बरसात 

देखते ही देखते बहने लगी 

पानी की धार

 पहली मंज़िल की बालकनी में 

आ गयी थी बाढ़ 

रिस-रिस कर जल कमरों में भरने लगा 

क़ालीन को भिगोता हुआ 

लकड़ी के फ़र्श के भीतर घुसने लगा 

अब तो कोई चारा नहीं था 

मग और बालटियाँ फटाफट लाये गये 

भर-भर कर ऊपर से गिराये गये 

आधे घंटे की बरसात में 

सैकड़ों लीटर पानी हो गया जमा

प्रकृति के आगे फिर एक बार 

अपने मस्तक झुका 

नलसाज (प्लम्बर) को बुलाया 

तो समस्या समझ में आयी 

ज़मीन के नीचे से जा रहे पाइप में  

 अवरोध आ गया था

पानी बाहर जाने के बजाय  

वापस आ रहा था 

इस पूरे वक्त में 

 मेहमान भी साथ में खड़ी थी 

उसका धैर्य असीम और हिम्मत भी बड़ी थी 

पाइप को काटा गया कुछ ऊपर ज़मीन से

निकास होने लगा पानी का रफ़्तार से 

अब कमरों का पानी सुखाना था 

मॉपिंग मशीन बहुत काम आयी 

बारी-बारी से सभी ने हाथ आज़माया 

मेहमान को ठंडी हो गई काफ़ी को 

गर्म करके पिलाया 

इत्मीनान से बैठ उसने 

उबर से कार को बुलाया 

किया विदा उन्हें 

फिर जुट गये बाक़ी काम में 

कालीन को लपेट कर बाहर रखा 

फ़र्श से पानी की आख़िरी बूँद को पोछा 

अब पंखे सारी रात चलेंगे 

पूरी तरह से भीतर तक जल सोखेंगे 

पहली बार जोरदार बरसात ने

 ले ली हमारी परीक्षा 

सफल हुए हैं जिसमें 

मिली जो है गुरु से दीक्षा !


शुक्रवार, जून 7

एक कतरा प्रेम

एक कतरा प्रेम 


बचपन में हम झगड़ते हैं 

यौवन में कुछ न कुछ पकड़ते हैं 

वह तो बाद में पता चलता है 

हक़ीक़त में जिसकी तलाश है 

वह न झगड़ने से मिलती है

 न पकड़ने से !


वह तो हवाओं में 

झूमने की कला है !


बारिश में भीगने 

आँखों से बतियाने 

हाथ में हाथ डाले 

हरी घास पर 

डोलने में हर बार 

भीतर कुछ पला है !


जो न था पास, जब

कई अपने पीछे छूट गये 

कुछ सपने बेवजह ही टूट गये !

 

सत्य है राम का नाम

 सुना न जाने कितनी ही बार 

 पर क्यों फुला लिया मुँह 

जब आये थे राम प्रेम बनकर

जीवन पथ पर  राह दिखाने !


जिस प्रेम का एक कतरा भी 

छू जाये मन को  

तो गूँजने लगते हैं मीठे तराने !


उस एक के लिए ही 

हर झगड़ना था शायद 

उसे ही पकड़ना था 

अब जाना है राज दिल ने 

यूँ ही ‘मैं’ का वह अकड़ना था  !




शनिवार, सितंबर 10

मौसम में बदलाव



 सड़कों पर नावें चलीं बारिश ने कैसा कहर ढाया

घरों में कैद हुए लोग वक्त कैसा बेरहम आया 


तैरने लगे वाहन ज्यों तैरती किश्तियाँ कागज की 

ढहीं इमारतें सड़कें बहीं थमी नहीं ऋतु सावन की 


कैसा सैलाब आया कैसा आलम जहाँ पर बरपा 

हर तरफ अफरातफरी हर छोटा बड़ा नाला उफना  


मेड़ तोड़ खेतों में पानी बाढ़ का बेहिसाब भरा

कहीं सूखा पड़ा लोग राह तकते कहीं बादल फटा 


मौसमी बदलाव का असर धरा पर बहुत भारी पड़ा 

बेबस बड़ा आदमी कुदरत के आगे सबक फिर पढ़ा 


शनिवार, अगस्त 25

कैसी थी वह दूरी


कैसी थी वह दूरी

तुमसे दूरी क्या हुई
गाज़ हम पे गिर गयी
जाने किस बेसुध क्षण में
आग दिल में लग गयी
वह तो अच्छा हुआ जाना
घर तुम्हारा करीब था
दरवाजा भी खुला था
खुश अपना नसीब था
गर नहाये न होते
तुम्हारी याद की बारिश में
 सुलगते रहते तुम्हारे दर तक
यह भी क्या संयोग था
भूले थे छाता घर पर 

शनिवार, अप्रैल 23

बादल बरसा बरसा बादल

आज यहाँ फिर बारिश हो रही है... जोरदार बारिश...


दिल तो बादल है  



दिल है बादल, बादल दिल है
दोनों की इक ही मंजिल है,
खुद से दूर बसे जा दोनों
पीड़ा विरही की हासिल है !

सूरज सुलग रहा ज्यों नभ में
दिल में भी तो लगी आग थी,
नीर उड़ा ले गयी हवाएं
श्वासें नमी ले गयीं दिल की !

उमड़-घुमड़ नयनों से बरसी
वही अमल जलधार बनी है,  
भीतर छाया था तनाव सा  
नभ में ज्यों कैनात तनी है !  

नन्हा सा दिल बिछड़ा खुद से
सँग संसार के उड़ता-फिरता,
पुनः सताती विरह की पीड़ा
रह-रह कर कई बार बरसता !

गरज-गरज कर बरसे बादल
जैसे कोई दिल हो पागल,
प्रथम कालिमा छायी उदासी
धूमिल सी ज्यों प्यास रुआंसी !

फिर अश्रु से आँख भर आयी
अंतहीन तब फूटी रुलाई,
रुकने का क्यों नाम न लेती
ताल-तलैया सब भर देती !

सुबक-सुबक ज्यों रोता बच्चा
बादल भर जाता चहबच्चा
कभी डराता, कभी लुभाता
ओले, वृष्टि सब बरसाता !

बरस रहा अनवरत आज है
जाने इसमें क्या राज है,
सँग बूंदों का बजे साज है
घन बादल का बजे बाज है !

बिछड़ा था जो जल सागर से
बरस-बरस घर आया नभ से,
बादल सागर का था अपना
दूर हुआ ज्यों कोई सपना !


अनिता निहालानी
२३ अप्रैल २०११


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