सांझी धरती गगन एक है
है सृष्टि क्रम अनंत काल से
चाँद-सितारे भी युग-युग से,
किन्तु पुरातन कभी न होते
पल-पल खुद को नूतन करते !
जंगल, वन, पर्वत, पठार भी
मृत होकर नव जीवन धरते,
सिन्धु पुन: पुन: हो आप्लावित
बादल नित नव सर्जन करते !
पशु, पंछी, मानव के तन भी
जन्मते, गिरते, पुन: पनपते,
किन्तु एक से सब दुनिया में
मन को इक चौखट में रखते !
अपना-अपना खुदा लिए हर
मन न स्वयं को कभी बदलता,
धर्म-जातियों के नामों पर
अब भी भीतर नफरत रखता !
जाने क्या हासिल कर लेगें
अब भी रक्त बहाया करते,
नए वर्ष में यही सिखाने
जगत घिरा सांझी पीड़ा से !
सांझे सुख-दुख हैं दुनिया के
सांझी धरती, गगन एक है,
एक ही रब है एक चेतना
नाम-रूप धारे अनेक है !
