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गुरुवार, दिसंबर 31

सांझी धरती गगन एक है

सांझी धरती गगन एक है
है सृष्टि क्रम अनंत काल से 
चाँद-सितारे भी युग-युग से, 
किन्तु पुरातन कभी न होते 
पल-पल खुद को नूतन करते !

जंगल, वन, पर्वत, पठार भी 
मृत होकर नव जीवन धरते, 
सिन्धु पुन: पुन: हो आप्लावित 
बादल नित नव सर्जन करते !

पशु, पंछी, मानव के तन भी
जन्मते, गिरते, पुन: पनपते, 
किन्तु एक से सब दुनिया में 
मन को इक चौखट में रखते ! 

अपना-अपना खुदा लिए हर 
मन न स्वयं को कभी बदलता, 
धर्म-जातियों के नामों  पर 
अब भी भीतर नफरत रखता !

जाने क्या हासिल कर लेगें  
अब भी रक्त बहाया करते, 
नए वर्ष में यही सिखाने 
जगत घिरा सांझी पीड़ा से ! 

सांझे सुख-दुख हैं दुनिया के 
सांझी धरती, गगन एक है,
एक ही रब है एक चेतना 
नाम-रूप धारे अनेक है ! 
 

मंगलवार, मार्च 19

ठिठक गयी कोयल की कूक



ठिठक गयी कोयल की कूक


मुरझाई सी आम्र मंजरी
ठिठक गयी कोयल की कूक,
जाने कौन निगोड़ी आकर
गई कान में उसके फूँक !

कैसे घोलें रंग अनूठे
भीगा-भीगा सा मौसम है,
पिचकारी भी सहमी सी है
गुब्बारों पर बैन लगा है  !

नफरत के कुछ रंग डालते
कुछ दहशत आतंक बांटते,
कुछ को दौलत रंगी लगती
ताकत, सत्ता, रक्त मांगते !

ऐसे में क्या होगा फाग
लगी हुई है द्वेष की आग,
शायद होली उसे बुझाये
सोये हैं जो जाएँ जाग !

मंगलवार, जुलाई 12

उससे मिलन न क्योंकर होता

उससे मिलन न क्योंकर होता


पोर-पोर में श्वास-श्वास में
नस-नस में हर रक्त के कण में,
गहराई तक भीतर मन में
छाया जो पूरे जीवन में !

उससे ही हम अनजाने हैं
दूरी उससे बढ़ती जाती,
जो खुद से भी निकट है प्रियतम
उससे आँख नहीं मिल पाती !

जिसके होने से ही हम हैं
उससे मिलन न क्योंकर होता,
जिससे कण-कण व्याप रहा है
उससे न मन प्रीत जोड़ता !

मन अस्थिर, अस्थिर ही रहता
घबराया सा, रहे कांपता !
बन आकांक्षी यश मान का
या सुविधा के पीछे जाता !

बचा बचा कर रखता तन को
बचा बचा कर रखता धन को,
दोनों ही कुछ दिन के साथी
समझ न आता भोले मन को !