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सोमवार, जनवरी 13

पीली आग भली लगती है लोहड़ी की

लोहड़ी पर्व पर हार्दिक शुभकामनाएँ 


पीली आग भली लगती है लोहड़ी की 

दिल में कैसी धुन बजती है लोहड़ी की !


मकई के फुल्ले मूँगफली  

 गज्जक-रेवड़ियाँ तिल-गुड़ की,

अग्निदेव को करें समर्पित 

वैश्वानर भीतर आदीपित !


खेतों में जब झूमती फसलें सरसों की 

पीली आग भली लगती है लोहड़ी की !


गिद्धे और भांगड़े सजते 

तन पर सुंदर वस्त्र शोभते, 

पहली लोहड़ी नववधू की 

या घर आये कोमल शिशु की !


दिल में कितना रंग जगाती उमंग भरी 

पीली आग भली लगती है लोहड़ी की !


सोमवार, मार्च 18

होली है !


होली है !

लो फिर आ गया रंगों का त्योहार
उमंगों-तरंगों में डूबने का वार
पर न जाने किसने रोक रखी है भीनी फुहार
ललक नहीं दिखती गाल रंगाने की
कौन जहमत उठाये घंटों रंग छुड़ाने की
ऐसी होली तो पहले कभी आयी न थी
मुंहतोड़ कभी ऐसी महँगाई न थी
कैसे बनें गुझियाँ खोये में मिलावट नजर आती है
तेल के दाम चढ़े कड़ाही कहाँ अब चढ़ाई जाती है
माना कि रंगों में अब उतनी चमक नहीं है
रसायनों के कारण वह मीठी सी गमक नहीं है
पर फागुन क्या जाने दुनिया का व्यवहार
आ ही जाता है डोलते-डुलाते हर बार
मदमाती ऋतु पर किसी का बस नहीं चलता
होली मनवाये बिना फागुन नहीं ढलता...    

शुक्रवार, जुलाई 22

कबीरा खड़ा बाजार में


कबीरा खड़ा बाजार में

तन्हा नहीं है कोई जग में
 जात खुदा की सदा सँग है
मौला-मस्त बना फिरता है
 जिस पर उसका चढ़ा रंग है !

तोड़े गम से नाता अपना
 दिल में छायी बस उमंग है
पहन फकीरी बाना देखो
 बिन ही पिए चढ़ी तरंग है !

सारा जग है उसका अपना
 देख जमाना उसे दंग है
सदा बहाता प्रेम की धारा
 दिल है जैसे नीर गंग है !

सुलह कराना आदत उसकी
 जब भी जिसमें छिड़ी जंग है
दौलत सभी लुटाता फिरता
 जब दुनिया का हाल तंग है


शुकराना हर श्वास में करता
 जीने का यह नया ढंग है
जंगल-बस्ती घूमे जोगी, 
बनजारा या वह मलंग है !