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शुक्रवार, मार्च 27

नेह घट सजाने हैं

नेह घट सजाने हैं

आशा के नहीं आस्था के दीप जलाने हैं
आकाश कुसुम नहीं श्रद्धा पुष्प खिलाने हैं,
हर लेंगे तम, जो भर देंगे सुवास मन में
प्रीत की अल्पना पर नेह घट सजाने हैं !

मोहपाश तोड़कर मुक्ति राग बज उठें
गगन में उड़ान भर मन मयूर गा उठें,
पाषणों से ढके स्रोत जो सिमटे थे
हुए प्रवाहित अबाधित वे बह निकलें !

छाए बहार चहुँ ओर मिटे तम घट का
झांकें क्या है पार खोल पट घूँघट का,
जो न गाए गीत कभी न राग जगे
परिचय कर लें आज नये उस स्वर का !  

सोमवार, दिसंबर 8

दुःख की ही गाथा बनती है

दुःख की ही गाथा बनती है



मौन हुए स्वर, सूना अंतर
फिर भी सब पाया लगता है,
अब जब लिखने की फुर्सत है
मन का घट खाली लगता है !

टूटी जब से दुःख की गागर
गीत विरह के भी छूटे,
चाह मिटी जब अंतर मन से
स्वप्न हृदय के सब रूठे !

दुःख की ही गाथा बनती है
सुख तो खाली हाथ खड़ा,
कलम थमी अब शब्द न मिलते
भीतर है आराम बड़ा !

नहीं शिकायत कोई जग से
अब क्या शायर गजल कहे,
मीत छिपा है अपने घर में
अब क्यों बिरहन पीर सहे !

अब तो चैन पड़ा है दिल को
कागज कोरा ही रह जाता,
तृप्त हुआ है पंछी मन का,
अब न कहीं दौड़ा जाता !

मंगलवार, नवंबर 18

हरियाली का गांव अनोखा

हरियाली का गांव अनोखा



खिले गुलाब, मालती, बेला, फुदक रहा खगों का मेला
रह-रह गूंजे कलरव मद्धम, कहीं भ्रमर का अविरत सरगम I

हरियाली का गांव अनोखा
अंतरिक्ष में नील झरोखा
गौरेया उड़ आती ऐसे
शीतल कोई हवा का झोंका

आड़े-तिरछे डाल वृक्ष के, झुरमुट कहीं दीर्घ बांस के
हल्की-हल्की तपन पवन में, छुपा सूर्य घन पीछे नभ में 

अनगिन फूल हजारों वर्ण
भांति-भांति के धारे पर्ण
अमलतास का पीतवर्ण लख
रक्तिम स्वाद गुलमोहर का चख

प्रकृति मोहक भरी दोपहरी, सुंदरता हर सूं है बिखरी
रह-रह मौन टूटता प्रहरी, गूंज उठे कोई स्वर लहरी 

नन्हा सा एक नील पुष्प भी
कह जाता सब मौन खड़ा सा
पोखर से उगती कुमुदिनी
या फिर कोई कमल बड़ा सा

गोल, नुकीले, सूक्ष्म, कंटीले, धानी, हरे, बैंगनी, पीले
जाने कितने आकारों में, पत्र वृक्ष के ह्ज्जारों में 

कोमल स्पर्श कभी तीक्ष्ण भी
शीतल मौसम कभी उष्ण भी
प्रकृति का भंडार अपरिमित
अनंत वहाँ सब, कुछ न सीमित

लुटा रहा दोनों हाथों से, दूर कहीं से कोषाध्यक्ष
नहीं खत्म होने को आता, पुरुष छुपा प्रकृति प्रत्यक्ष 

मंगलवार, नवंबर 4

देखो ! शाम ढलती है

देखो ! शाम ढलती है



देखो ! शाम ढलती है
लौटते हैं नीड़ को खग
हुए सूने गाँव के मग
आस मिलन की पलती है !

जो खिले थे प्रातः बेला
खो गये झर पुष्प सहसा,
जो बहे थे सुर सुरीले
खो गये स्वर पंछियों के !

जल उठे हैं दीप घर-घर
बज उठे हैं आरती स्वर,
रात्रि का स्वागत करें अब
रात-रानी खिलती है !

गगन का भी ढंग बदला
विटप का भी रंग बदला,
रोशनी की थी जो माया
किस तरह छलती है !

कूकती है इक अकेली
कोकिला बिछुड़ी तरु से
राह भटका ज्यों मुसाफिर
भटकन ही खलती है !


मंगलवार, जून 21

विश्व संगीत दिवस पर शुभकामनाएँ


संगीत

प्राणों में नव रस भर, मिठास संगीत भरे
स्वर लहरी गुंजित हो, प्रमुदित उर सबके करे !

रसवंती धार बहे, श्रवणों को सार मिले
सुर में जब गीत उगें, मन को बहार मिले

जीवन को सिंचित कर, रग-रग में अमिय भरे
स्वर लहरी गुंजित हो, विकसित उर कलिका करे !

चेतन कर सुप्त हृदय, नव भाव जगा देता  
व्याकुल मन सहला कर, नव आस जगा देता !

युग-युग से राग व सुर, मानस में ललक भरे
स्वर लहरी गुंजित हो, पुलकित अंतर कर दे !

अनिता निहालानी
२१ जून २०११