याद तुम्हारी
हरी दूब, पंछी के पर सी
छूती मन को आहिस्ता से
कुछ गुनगुन कानों में करती
श्वासों के सँग गिरती-उठती
नीले आसमान सी निर्मल
याद तुम्हारी !
याद तुम्हारी फैली जल में
बिखरी फूल-फूल के दल में
प्रातः पवन में, सांध्य स्वप्न में
छत के हर सूने कोने में
सीढ़ी के खालीपन में भी
पुस्तक के इक इक पन्ने में
याद तुम्हारी !
चिडियों की चीं चीं में मिलती
मिट्टी की खुशबू में खिलती
दूर दूर तक नजर मिलाती
कभी निकट आकर सहलाती
अधरों के स्मित हास में गुपचुप
नयनों की मुस्कान में चुपचुप
मेरे पेन में, बुक शेल्फ में
लिखने वाली मेज पे सोयी
याद तुम्हारी !
अनिता निहालानी
२१ मई २००१