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बुधवार, जुलाई 15

अथ योगानुशासनम्

अथ योगानुशासनम् 



अनुशासन यदि नहीं सधा तो 

सब संकल्प हवा ही होंगे,  

संदेहों को दूर करे यह 

धैर्य और साहस पनपेंगे !


हर गति इक दर्पण बन जाती 

हर श्वास झलकती है उसमें, 

तन का आसन मन में ढलता 

मन ही भाग्य विधाता जग में !


बाहर का अनुशासन भीतर 

तालमेल बन कर मिलता है, 

खुले नयन से जग को देखें 

ध्यान ज्ञान बन कर खिलता है !


हर श्वास में भरा हो साहस

हर निःश्वास हरे संदेह, 

अग्नि जलेगी तीव्र तभी जब 

 होंगी विशुद्ध श्वासें व देह !


इड़ा, पिंगला में जब बहती

 हो अबाधित श्वास की धारा, 

 सुषुम्ना स्वत: जाग ही जाती 

  संग बढ़ती ज्ञान की धारा ! 


स्थिरता से ऊर्जा बढ़ जाये 

संघर्षों से कम हो जाती,

 झुकते नहीं युद्ध में योद्धा

संतुलन से शक्ति ही बढ़ती ! 


 देह जितनी लचीली होगी 

मन भी उतनी शीघ्र झुकेगा, 

किया समर्पण जब दोनों ने 

भीतर का सामर्थ्य बढ़ेगा !


देह, श्वास, मन तीनों मिलकर 

 देवालय ह्रदय में बनाते 

शुद्ध हुए वे निज प्रयत्न से 

आत्मा को उसमें बैठाते !


शुक्रवार, जून 12

भुला दिया है

भुला दिया है 


देह एक नाव है 

मुझ नदी में तैरती हुई 

जो अनंत काल से, अनंत देश के पार बह रही है 

मैं नाव नहीं हूँ,  

 नदी हूँ, पर यह भुला दिया है ! 


देह एक घर है 

मुझ विदेह के लिए 

जो अनंत काल से, अनंत देश के पार शून्य है 

मैं देह नहीं हूँ 

विदेह हूँ, पर यह भुला दिया है ! 


देह एक दीपक है 

प्राण स्नेह है जिसमें 

मन बाती और मैं ज्योति हूँ 

जो जो अनंत काल से, अनंत देश के पार दिप-दिप करती है 

मैं दीपक नहीं हूँ 

ज्योति हूँ, पर यह भुला दिया है ! 


गुरुवार, जनवरी 23

साधना

साधना 


वह, जो है 

वह, जो अनाम है 


पाया जा सकता है 

उसका पता, उससे

 वह, जो नहीं है 


जो नहीं है 

पर होने का भ्रम जगाता है 


स्वीकार कर लेता है जब 

न होने को अपने 

तब झलक जाता है वह, जो है 


और तब जो नहीं है 

बन जाता है वह जो है 


कुछ नहीं से 

सब कुछ बन जाना ही 

साधना है  


देह व मन को भी 

यही भेद जानना है 


कि वे नहीं हैं अपने आप में कुछ 

और तब वे जुड़ जाते हैं विराट से 


एक विशाल मन ही 

चलाता है सारे मनों को 


पंचभूत चलाते हैं 

सारी देहों को ! 


मंगलवार, नवंबर 19

कोई

कोई 


कोई निकट ही नहीं 

बहुत निकट है 

पल-पल देख रहा है

देह की हर शिरा का स्पंदन 

प्राणों का आलोड़न 

मन का सहज आनंद 

झट ‘तथास्तु’ कह कर मुस्का देता है 

और वही देख चुका है 

देह की जड़ता 

प्राणों की आतुरता 

मन का रुदन 

पर तब हामी नहीं भरी थी  

प्रकाश की आस जगायी थी 

सहलाया था अदृश्य हाथों से 

घोर अंधेरों में !



बुधवार, जुलाई 17

पीड़ा


पीड़ा 

पीड़ा अभिशाप नहीं

वरदान बन जाती है 

जब सह लेता है कोई 

धैर्य और दृढ़ता से

अपरिहार्य है पीड़ा

यदि देह को सताती है 

अधिक से अधिक मन तक

हो सकती है उसकी पहुँच

पर 'स्वयं' अछूता रह जाता है 

पीछे खड़ा 

वही असीम शक्ति देता है 

वह स्रोत है 

वही लक्ष्य भी 

हर संदेह से परे 

जहाँ मिलेगा परम आश्रय 

मिलता आया है जीवन भर 

शांति व आनंद के क्षणों में 

सुख-दुख के प्रसंगों में 

वह संबल भरता है भीतर 

पीड़ा तप है 

व्यर्थ नहीं है यह 

इसका प्रयोजन है

शायद यह आत्मशोधन है !

सोमवार, जुलाई 8

जीवन सा हो मरण भी सुंदर

जीवन सा हो मरण भी सुंदर

भरे न उर ऊँची उड़ान जब  

बरबस बहे न प्रेमिल सरिता, 

 पाँवों में थिरकन न समाये  

जीवन वन सूना सा रहता !


एक मोड़ आये जब ऐसा 

रुखसत पूर्ण ह्रदय से ले लें, 

जीवन को भरपूर जी लिया 

अब स्वयं ही मृत्यु पथ चुन लें !


गहन दुर्दम निद्रा है मृत्यु 

 जीवन सा हो मरण भी सुंदर,

अंतर  का अवसाद मिटाने  

मिला सभी को रहने का घर !


जान लिया हर लक्ष्य जगत का 

जो पाना था पाया हमने, 

पढ़ ही डाले जितने भी थे 

ख़ुशियों और गमों के किस्से !


बने कृतज्ञ इस अस्तित्त्व के 

धीमे से हम आँख मूँद लें, 

जीवन ने कितना कुछ सौंपा 

अब अंतिम ऊँचाई पा लें !


मृत्यु सभी भेदों  से ऊपर 

राजा-रंक सभी मरते हैं, 

खेल ख़त्म हो जाते इसमें 

व्यर्थ मनुज इससे डरते हैं !


जीने की जो कला सीख ले 

सहज मरण के पार हो गया, 

देह और मन के ऊपर जा 

ख़ुद का जब दीदार हो गया !


सोमवार, मार्च 25

​​जीवन बँटता ही जाता है

​​जीवन बँटता ही जाता है 


झोली भर-भर कर ले जाओ 

चुकता कब उसका भंडारा,

  चमत्कार यह देख न पाये

जग नूतन चाह जगाता है !


जीवन बँटता ही जाता है !


कण-कण में विश्वास भरा है 

अणु-अणु में गति भर दी किसने, 

सुमधुर, सुकोम, सरस स्वर में 

कोई भीतर से गाता है !


जीवन बँटता ही जाता है !


चट्टानों के भीतर जीवन 

अग्नि गुफाओं में भी सर्जन 

जल, अनिल, अनल, नभ को धारे 

यह धरती माँ सा भाता है !


जीवन बंटता ही जाता है !


स्थूल, सूक्ष्म, कारण इन तीनों 

देहों के पार वही सच है, 

मन उस समता में जागे नित

हर द्वन्द्व जहां गिर जाता है !


जीवन बंटता ही जाता है !


हर रूप वही आकार वही 

भावना, विचार, हर ध्वनि  वही, 

पादप, पशु, पंछी, बादल में 

वह पावन ही दिख जाता है !


जीवन बंटता ही जाता है !


है शिव से न शक्ति विलग कभी 

मन-प्राण समोहित से रहते, 

श्वासों का जो आधार बना 

वह गीतों में गुंजाता है !


मंगलवार, अक्टूबर 17

अबकी बार नवरात्रों में

अबकी बार नवरात्रों में 


तंद्रा, प्रमाद सताते हैं 

देह को अथवा मन को  

आत्मा सदा ही सचेतन है !

पर जैसे काली हो जाये चिमनी

 तो प्रकाश नहीं आता 

प्रमादी हो जाये देह या मन तो 

आनंद आत्मा का बाहर नहीं आता !

देह-दीपक जब साफ़ नहीं रहता 

तो मन-स्नेह कैसे भरा जाएगा उसमें 

देह दीपक में स्नेहिल मन हो 

तभी न आत्मा की ज्योति जगमगायेगी 

और देख वह जोत, अबकी बार 

नवरात्रों में माँ हमारे घर आएगी 

योग से देह-दीपक सजाना है 

ध्यान से मन-स्नेह जलाना है 

तब प्रकटेगी वह अखंड ज्योति 

जो अभी सोयी है 

अंधकार में भटक रोयी है !


मंगलवार, दिसंबर 27

उजियारा मन बाती कारण


उजियारा मन बाती  कारण


देह दीप माटी का जैसे

उजियारा मन बाती  कारण, 

स्नेह प्राण का, ज्योति आत्म की 

जग को किया  उसी ने धारण !


दीपक छोटे, बड़े क़ीमती 

मन भी भिन्न क्षमता की  बात, 

प्राणों में बल घटता-बढ़ता 

किंतु ज्योति है एक दिन-रात !


उसी ज्योति की ओर चले थे 

ऋषि ने जब तमसो गाया था, 

वही ज्योति शुभ मार्ग दिखाती 

महाजनों को जो भाया था !





शुक्रवार, नवंबर 25

हीरा मन

हीरा मन 


अँधेरे में टटोले कोई 

और हीरा हाथ लगे 

जो अभी तराशा नहीं  गया है 

पत्थर और उसमें  नहीं है कोई भेद

ऐसा ही है मानव का मन 

वही अनगढ़ हीरा लिए फिरता है आदमी 

अभी जड़ है देह 

और प्राणों में तीव्रता है उन्माद की 

जो  बहुत दूर नहीं ले जा पाती  

नकार की आदत 

हिंसा को जन्माती 

परिस्थितयां घिसेंगी पत्थर  को 

तो चमक उठेगा किसी  दिन  

पर अभी बहुत दूर जाना है 

कठोर राहों पर घिसाना है 

जब पारदर्शी होगा मन 

तो दुनिया भी आड़े नहीं आएगी 

भीतर कैद ज्योति 

पूरी शान से जगमगाएगी !