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बुधवार, नवंबर 6

भोर के तारे सा छुप जाएगा जग


भोर के तारे सा छुप जाएगा जग 



बंद आँखों से जमाना देखते हैं हम कहाँ अक्सर हकीकत देखते हैं चाह की चादर ओढ़ायी थी किसी ने यूँही अपना हक समझ कर देखते हैं दोनों हाथों से जकड़ चलते रहे दिल को ही बढ़कर खुदा से देखते हैं जिस राह पर दुश्वारियां मंजिल नहीं ख़्वाब उस के ही दिलों में देखते हैं भोर के तारे सा छुप जाएगा जग पत्थरों में निशां उसके देखते हैं जो सुकूं का, है समंदर प्रीत का भी उसे सदियों दूर से ही देखते हैं आसमां है बदलियां, बारिशें, धूप जो जरूरी जुड़ उसी से देखते हैं

शनिवार, जनवरी 7

कोई सुन रहा है


कोई सुन रहा है 
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सुन सके न गर जमाना कोई सुन रहा है 
बिखरे हुए लफ्जों को वही चुन रहा है 

दीवाना दिल सजीले जो ख्वाब बुन रहा है 
पर्दानशीं वही तो दिनरात गुन रहा है 

बिसरी हुई यादों को यदि कोई धुन रहा है
अनजान दरम्यां वह दीवार चुन रहा है

चाहत नहीं है उसकी न कोई पुन रहा है
हसरत में मन वही तो दिनरात भुन रहा है


मंगलवार, फ़रवरी 11

कुछ बातें दिल से

कुछ बातें दिल से


शिकायतें कर लीं बहुत जमाने से
सिर कहीं अब तो झुकाया जाये

बोझ ढोयें अच्छाइयों का कब तक
चलो औरों को बेहतर बताया जाये

नेकियाँ कर के भी रोये बुराई कर के भी
आखिर इन्सान को किस तरह हंसाया जाये

उमगती ख्वाहिशें सताती दिलोजान को
  किसी के दर पे उनको चढ़ाया जाये

नेमतें सौंप दे तो बढ़ती ही जाएँगी
कर के अर्पण दुःख को भी घटाया जाये

मुगालता हो गया हासिल कुछ करने का
वरना क्या है जो रब को दिखाया जाये

न कुछ अपना न कुछ हस्ती है हमारी
जान इस सच को जरा मुस्कुराया जाये



शुक्रवार, अक्टूबर 18

उसका नाम

उसका नाम


जब कोरा हो मन का पन्ना
तभी लिख लो प्रियतम का नाम उस पर
नहीं तो जमाना लिख देगा
इधर-उधर की इबारतें
महत्वाकांक्षा की दौड़ ले जायेगी खुद से दूर
 फिर पुकार भी उसकी
 कानों तक नहीं आयेगी
इक झूठ को जीते चले जाने से
 नहीं हो जाता वह सच
 नकली पहचान बनाने की जिद में
असली पहचान भी खो जाएगी
जब पढ़ा जा सकता हो साफ-साफ
तभी उकेर दो उसका नाम
 मन के कोरे कागज पर.. 

शुक्रवार, जुलाई 22

कबीरा खड़ा बाजार में


कबीरा खड़ा बाजार में

तन्हा नहीं है कोई जग में
 जात खुदा की सदा सँग है
मौला-मस्त बना फिरता है
 जिस पर उसका चढ़ा रंग है !

तोड़े गम से नाता अपना
 दिल में छायी बस उमंग है
पहन फकीरी बाना देखो
 बिन ही पिए चढ़ी तरंग है !

सारा जग है उसका अपना
 देख जमाना उसे दंग है
सदा बहाता प्रेम की धारा
 दिल है जैसे नीर गंग है !

सुलह कराना आदत उसकी
 जब भी जिसमें छिड़ी जंग है
दौलत सभी लुटाता फिरता
 जब दुनिया का हाल तंग है


शुकराना हर श्वास में करता
 जीने का यह नया ढंग है
जंगल-बस्ती घूमे जोगी, 
बनजारा या वह मलंग है !