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सोमवार, मार्च 14

बन सकते मानव, महामानव

बन सकते मानव, मानव


प्रेमिल भू निज ओर खींचती
रवि किरणें भी अंक लगातीं,
पवन दौड़ती भरती भीतर   
बदली बन छाया छा जाती  !

खिले कुसुम हँसते ललचाते
कर कलरव खग गीत सुनाते,
लेकिन हम अपनी ही धुन में
देख उन्हें भी देख न पाते !

अपनी लघुता में ही जीते   
मानव भी न रह पाते,
कभी खुशी कभी गम पाकर  
यूँ ही आते यूँ ही जाते !

 बन सकते मानव, मानव
स्वर्ग धरा पर ला सकते,
पायी मेधा, प्रखर मति भी   
हो सजग विवेक वरत सकते !

भाव पूत, अंतर कर निर्मल
कर्म श्रेष्ठ निश्छल मृग छौने,
प्रेम भरे अंतर में अनुपम
जिसके आगे सब सुख बौने !

अनिता निहालानी
१३ मार्च २०११
 

गुरुवार, फ़रवरी 24

ऐसा है आदमी




ऐसा है आदमी


खुद के बनाये जाल में जकड़ा है आदमी
वरना तो चाँद छू के आया है आदमी !

मंजिल की खोज में तो निकला था कारवां
मुड़ के जो राह देखी तनहा था आदमी !

मकसद सभी का साझा जन्नत बने ये दुनिया
फिर क्यों दीवारें दिल में चुनता है आदमी !

सुबह से शाम तक जो कसमें खुदा की खाए
अनजान ही खुदा से रहता है आदमी !

अनिता निहालानी
२४ फरवरी २०११