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शुक्रवार, अक्टूबर 16

प्रेम

प्रेम 


प्रेम - आत्मा के फूल की सुगंध !

जो कभी एक बीज था 

अपने आप में सिमटा 

ऊर्जा भीतर छिपाये 

 मिटकर बीज ही 

एक दिन फूल उगाये !


 प्रेम - जब तक ढका है

क्रोध, घृणा और अधिकार भावना से 

तब तक खिला ही नहीं 

मुक्त होकर सारे विष से 

बन जाता है सुवास अंतर की !


जब खो जाती है हर शिकायत 

घटता है पूर्ण स्वीकार 

तभी खिलता है 

आत्मा का फूल !


फैलाता सुवास 

 पराकाष्ठा है जो चेतना की 

तभी तो चढ़ाये जाते हैं 

फूल देवालय में 

देवता सुगंध है अस्तित्त्व की 

वैसे प्रेम सुगंध है मन की !


मंगलवार, सितंबर 22

एक गीत

एक गीत 

 झूठे-झूठे सपने, झूठे-झूठे वादे

मन ख़ुद से करता है 

सच्ची-सच्ची बातों, सच की राहों 

से शायद डरता है !


सच की ज्योति जली जो भीतर 

उससे आँखें फेरे, 

सपनों की इक नदी बह रही  

बरबस जिसमें तैरे 


झूठे-झूठे रस्तों पर ले जाता 

जन्मों से आदत है, 

सच का फूल खिला है भीतर 

करता न चाहत है !



सोमवार, मई 25

छूट गयी जब “मैं”

छूट गयी जब “मैं”



छूट गयीं सहज

 सारी व्यस्तताएँ

छूट गयी जब मैं,


सारे जहान का समय 

अब जैसे हाथों में आ गया

छूट गयी जब मैं !


कुछ भी करने को नहीं 

 अनंत वक्त अपनी मुट्ठी में

बेफिक्री मन ने कैसी पायी है

छूट गयी जब मैं !


 जैसे फूल होता है

अस्तित्त्व मन का ऐसा ही है

जग तय करता है

उपयोगिता उसकी...

वह  खिलता है 

बस अपनी मौज में

यह तन जहाँ भी रहे, 

काम आये जग के

वाणी हो उपयोगी

और ये हाथ उगायें फूल 

या लिखें कविता !

छूट गयी जब मैं !


मन का अब पता ही नहीं चलता

जैसे रवि  के आते ही 

अंधकार का

छूट गए सारे दुराग्रह 

सारी पकड़ भी छूट गयी....

अब भीतर मीलों तक

 चैन बिछा है

अनंत शांति !

छूट गयी जब मैं !


आज समय ही समय है....

जन्मों का यायावर 

घर लौट आया है

अब न उठानी चाह की गठरी

और न ही चलना पड़े 

किसी अगले पड़ाव को

जिस पार उतरने की आस 

लगाये था मन

दौड़ता फिर रहा था

 आ पहुँचा है

खत्म हो गयी सारी आपाधापी

और भीतर सब खाली है

वहाँ कोई भी नहीं रहता, 

यात्री लौट गया

पंछी उड़ गया

छूट गयी जब मैं !

 

सोमवार, दिसंबर 1

शांति सरवर मन बने

शांति सरवर मन बने



शांत मन ही ध्यान है 

ईश का वरदान है, 

सिंधु की गहराइयाँ 

अनंत की उड़ान है !


आत्मा के द्वार पर 

ध्यान का हीरा जड़ें,

ईश चरणों  में रखी  

भाग्य रेखा ख़ुद पढ़ें !


 जले भीतर ज्ञान अग्नि

 शांति सरवर मन बने,

अवधान उपज प्रेम से, 

कर्म को नव दिशा दे !


लौट आये उर सदन 

ऊर्ध्वगामी गति मिले,  

टूट जायें सब हदें 

फूल अनहद के खिलें !  


गुरुवार, मई 15

कृतज्ञता का फूल


कृतज्ञता का फूल 


समय से पूर्व

और आवश्यकता से अधिक 

जब मिलने लगे 

जो भी ज़रूरी है 

तो मानना चाहिए कि 

ऊपरवाला साथ है 

और कृपा बरस रही है !


कृतज्ञता का फूल 

जब खिलने लगे अंतर में 

तो जानना चाहिए कि 

मन पा रहा है विश्राम 

और आनंद-गुलाल बिखर रहा है !


सब मिला ही हुआ है 

यह अनुभव में आ जाये 

तो छूट जाती है हर चाह

राह के उजाले गवाह बन जाते 

कि विश्वास का दीपक ह्रदय में 

जलने लगा है !


रविवार, मई 5

प्रेम

प्रेम 


जिस पर फूल नहीं खिल रहे थे 

उसने उस वृक्ष को 

पास जाकर ऐसे छुआ 

जैसे कोई अपनों को छूता है 

और अचानक कोई हलचल हुई 

पेड़ सुन रहा था 

चेतना हर जगह है 

आकाश में तिरते गुलाबी बादलों  

और लहराती पवन में भी 

 प्रकट हो जाती है 

एक नई दुनिया ! 

जब विस्मय से भर जाता है मन

जैसे कदम-कदम पर कोई 

मंदिर बनता जा रहा हो 

और हर शै उसमें रखी मूरत 

कभी सुख-दुख बनकर 

जिसने हँसाया-रुलाया था 

  शाश्वत बन जाता है वही मन

इतना कठोर न बने यदि 

कि प्रेम भीतर ही भीतर 

घुमड़ता रह जाये 

बंद गलियों में उसकी 

और न इतना महान 

कि प्रेम मिले किसी का 

तो अस्वीकार कर दे 

प्रेम जीवंत है 

वही बदल रहा है 

सागर की लहरों की तरह 

वही यात्री है वही मंज़िल भी !


बुधवार, जनवरी 10

एक लपट मृदु ताप भरे जो

एक लपट मृदु ताप भरे जो 



बैंगनी फूलों की डाल से

फूल झर रहे झर-झर ऐसे, 

लहरा कर इक पवन झकोरा 

सहलाये ज्यों निज आँचल से !


याद घेर लेती है जिसकी 

बनकर अनंत शुभ नील गगन, 

कभी गूंजने लगता उर में 

अनहद गुंजन आलाप सघन ! 


एक लपट मृदु ताप भरे जो 

हर लेती हृदय का संताप, 

सुधियाँ किसी अरूप तत्व की 

बनी रहतीं फिर भी अनजान ! 


सागर-लहर, गगन-मेघा सा 

नाता उस असीम से उर का, 

कौन समाया किस पल क़िसमें  

ज्योति अगन या गंध सुमन में !



सोमवार, सितंबर 25

यह तू तो नहीं

यह तू तो नहीं


कहीं कुछ ऐसा नहीं 

जहाँ नज़र ठहर जाये 

दिल के मोतियों को लुटाता चल 

कि यह दामन भर जाये

हर सुकून भीतर ही मिला 

जब भी मिला 

बाहर फूलों के धोखे में 

काँटों से पाँव छिलवाये 

ख़ुद पे यक़ीन कर 

ख़ुदा में छिपा है ख़ुद 

वह यक़ीन ही छू सकता उसे 

 जर्रे-जर्रे में जो मुस्कुराए 

तू खुश है ही बेवजह 

जैसे दुनिया की वजह नहीं 

तलाश ख़ुशियों की 

बेमज़ा ज़िंदगी को बनाती जाये 

तेरे दामन में हज़ार 

ख्वाहिशें लिपटीं 

उतार फेंक इसे क्योंकि 

यह तू तो नहीं, बताती जाये ! 


बुधवार, जुलाई 19

आत्मा का फूल


आत्मा का फूल 

जहां प्रमाद है वहाँ अहंकार है 

जहां अहंकार है वहाँ प्यार नहीं 

जहां प्यार नहीं वहाँ राग-द्वेष है 

अर्थात वे दो असुर 

जिन्होंने देवों का धरा वेश है 

राग प्रिय से बाँधता है 

द्वेष अप्रिय से बचना चाहता है 

पर हर बंधन दुःखदायी है 

और बचने की कामना ही 

और जोरों से बाँधती आयी है

जिसे पकड़ा है 

वह छूट जाता है 

जिसे छोड़ना चाहा 

वह बना रहता है मन में 

इन असुरों का अंत किए बिना 

प्रेम का राज्य नहीं मिलता 

और प्रेम के बिना 

आत्मा का फूल नहीं खिलता !  



सोमवार, मार्च 20

राहों को रोशन करे जिनकी ख़ुशबू

राहों को रोशन करे जिनकी ख़ुशबू 


जान-जान कर भी जाना नहीं जाता 

जो किसी परिभाषा में नहीं समाता, 

इक राज है जो आज तक खुल न पाया 

है ख़ुद में ख़ुदा पर नज़र कहाँ आता है !


अपना अहसास भी दिलाए जाता है 

फिर भी स्वयं को छिपाए जाता है, 

कभी यह तो कभी वह बनकर जगत में 

दिल को सदियों से लुभाए जाता है !


तू है तो हम हैं सदा इतना यक़ीन 

सहज कृपा के दिए दिल में जलते हैं, 

राहों को रोशन करे जिनकी ख़ुशबू 

हर कदम अकीदत के फूल खिलते हैं !




शुक्रवार, फ़रवरी 10

चुनाव

चुनाव 


शब्दों का एक जखीरा है वहाँ

हाँ , देखा है मैंने 

 ध्वनि एक,  जिससे उपजे शब्द अनेक 

एक  शै के भिन्न-भिन्न नाम 

उनमें से कुछ चुन लिए मैंने 

प्रेम, विश्वास और हंसी 

करते हुए शब्द ब्रह्म को प्रणाम 

शायद अनजाने में ही 

तुमने चुने होंगे 

युद्ध, सन्देह और पीड़ा 

तभी पनपी हैं दुःख की बेलें 

तुम्हारे आंगन में 

और यहाँ सुरभित फूलों की लताएँ !

सुवास से भरा है प्रांगण  

आँगन ही नहीं 

गली तक फैली है ख़ुशबू 

ऐसे ही कुछ देश चुन लेते हैं 

अपने लिए विकास और विश्वास 

और कुछ जाने किस भय में 

जिए जाते हैं खोकर हर आस ! 


शुक्रवार, दिसंबर 23

अरूप

अरूप


वह जो अरूप है भीतर 

अकारण सुख है 

उसकी मुस्कान थिर है 

चिर बसंत छाया रहता है उसके इर्दगिर्द 

अनहद राग बजता है अहर्निश 

जगत से उपराम हुआ 

कोई उस राम से मिलता है 

किसी-किसी के हृदय में 

उसकी चाहत का फूल खिलता है 

प्रपंच से परे वह समाधि में लीन है 

जैसे हिमालय के शिखर पर शिव आसीन है 

आत्मा के अनन्त सागर में उठने वाली लहरों को ही 

निहारते हैं हम 

जो कहीं नहीं जातीं

व्यर्थ ही सिर टकराती हैं 

भँवर उठते हैं कहीं तूफान 

कहीं बहते चले आते हैं फूल 

कहीं बहाया गया उच्छिष्ट 

अनदेखा ही रह जाता है वह अनूप 

वह जो अरूप है भीतर !