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शुक्रवार, जून 3

तुमने उसका घर देखा है


तुमने उसका घर देखा है

है विस्तीर्ण, अनंत, असीम
कोई द्वार नजर न आता,
स्वर्णिम सी ज्योति बिखरी है
मद्धिम स्वर में कोई गाता !

नहीं क्षितिज की भी रेखा है
तुमने उसका घर देखा है !

मौन गूंजता प्रेम विहंसता
शांति पुष्प आनंद लुटाते,
सुख छौना अबाध विहरता
पावन अमृत के नद बहते !

उसी प्रिय का सब लेखा है
तुमने उसका घर देखा है !

खो जाते सब भाव इतर तब
ऊपर उठ जाता मन जग से
झलक यदि मिल जाये पल भर,
जल जाते संशय सब उर के !

दुःख केवल एक भुलेखा है
तुमने उसका घर देखा है !

अनिता निहालानी
३ जून २०११



सोमवार, मई 16

सब संगीत बहा जाता है


सब संगीत बहा जाता है

स्रोत शांति का यदि भीतर है 
सारा जग अपना लगता है,
जो है जिसके पास, जगत !
वह, वही तुम्हें दे सकता है I

भीतर यदि मुस्कान भरी है
हँस सकता है संग सहर के,
फूलों के सँग बढा दोस्ती
चिड़ियों के सँग गा सकता है !

सभी सुखी हों और स्वस्थ भी
आनन्दित हो जाएँ सब ही,
सहज लुटाता ममता सारी
सेवा भाव जगा करता है !

लेकिन भीतर हो सन्नाटा
कुछ भी नजर कहाँ आता है,
जीवन की आपाधापी में
सब संगीत बहा जाता है !

तन पीड़ित हो, इंद्रधनुष भी
मन को भला नहीं लगता,
मन आकुल हो चाँद पूर्णिमा
का भी सुख न दे पाता है !

लोभ भरा हो अंतर में तो
दुखी नजर कहाँ आते हैं,
भूखे-प्यासे बच्चे भी तब  
नजर अंदाज किये जाते हैं !

भरी तिजोरी रहे सलामत
दुआ यही निकलती दिल से,
अपनों से भी खींचातानी
दान कहाँ दिया जाता है !

चुक गयी संवेदनायें जिसकी
 वह दिल कब खिल पाता है,
जीवन की आपाधापी में
सब संगीत बहा जाता है !

 अनिता निहालानी
१६ मई २०११


गुरुवार, अप्रैल 7

अद्वैत की महक

अद्वैत की महक

चलो, उठ खड़े हों, झाडें सिलवटों को
मन के कैनवास को फैला लें क्षितिज तक
प्यार के रंगो से फिर कोई खूबसूरत सोच रंग डालें !

चलो ऑंखें बंद करें, जाने अंतर्मन को
आत्मशक्तियां जागृत होकर एक हों,
और अपना छोटे से छोटा सुख भी साझा हो जाये !

चलो कह दें, सुना दें मन की हर उलझन
समझ लें, गिन लें दिल की हर धड़कन
अपना सब कुछ सौंप कर निश्चिंत हो जाएँ !

चलो करीब आयें जश्न मनाएं  
विश्वास का अमृत पियें, बांटें
मै और तुम से मुक्त होने की याद में कोई गीत गाएँ
अद्वैत की महक से दुनिया महकाएँ !

अनिता निहालानी
७ अप्रैल २०११  

मंगलवार, अप्रैल 5

या रब

या रब

या रब हो मेरे दिल का इतना बड़ा मकां
दुनिया के सब गमों को उसमें पनाह मिले !

बरसें मेरे आंगन में चाहे न बदलियाँ
सरहद के उस पार पर पानी सदा मिले !

चलता रहे इस दिल में दुआओं का सिलसिला
खुशबू सी जाके छूलें ऐसी शिफा मिले !

अंतर से फूटतीं हों नेह की हजार किरणें
पहरों में कैद गम का उनको पता मिले !

जन्मों से ढूंढते हैं तेरा ठिकाना जो रब
उनको मेरी नजरों से तेरा पता मिले !

अनिता निहालानी
५ अप्रैल २०११  

मंगलवार, मार्च 29

अमृत का एक द्वार छिपा


 
रात और दिन दो मित्रों से
मिलते रहते हैं अविराम,
जीवन के कोरे कागज पर
रंग बिखेरें सुबहोशाम !

पलक झपकते में मिल जाता
अमृत का एक द्वार छिपा,
लेकिन वह पल ठहर न पाता
यह सूरज कितनी बार उगा !

जब आयेगी, तब देखेंगे
बार-बार विस्मित हो भूले,
मृत्यु तो जीवन का द्वार
कह कर सुख झूले में झूले !

बढ़ती ही जा रही ऊर्जा
जब से सच का साथ रहा है,
कंकड़-पत्थर दूर हुए सब
हीरे सा मन याद रहा है !

गूंगी पीड़ा हूक उठी जो
मांग रही है कीमत अपनी,
रातों को जो जाग रही थी
नींद पूछती किस्मत अपनी !

क्या केवल दुःख के पल बोये
सुख की बेल सूखती जाती,
जैसे जैसे दिन बीते हैं
दुनिया और अकड़ती जाती !

२९ मार्च २०११


बुधवार, मार्च 16

नन्हा सा यह दिल बेचारा

नन्हा सा यह दिल बेचारा

एकाकी पर नहीं अकेला
अंतर में सबके इक मेला,
इक आवाज सदा गूंजती
जो करती है ठेलमठेला !

रुकते-रुकते फिर चल पड़ता
गिरते-गिरते फिर उठ जाता,
नन्हा सा यह दिल बेचारा
डगमग करता फिर थम जाता !

कभी-कभी ही खुद से मिलता
ज्यादातर दौरे पर रहता,
अपने घर आने से डरता
यहाँ वहाँ ही डोला करता !

कुछ भी नहीं है जो खो जाये
व्यर्थ ही घेराबंदी करता,
इधर-उधर का ज्ञान अधूरा
 मोहर लगा चकबंदी करता !

इक दिन तो थक कर बैठेगा
निज के ताने बाने खोले,
खुलवायेगा अपने घर के
डरते-डरते भेद अबोले !

फिर खाली हो मुस्काएगा
विश्रांति की फसल उगाने,
भर-भर कर झोली उमंग से
गायेगा फिर गीत, तराने !

अनिता निहालानी
१६ मार्च २०११

सोमवार, मार्च 14

बन सकते मानव, महामानव

बन सकते मानव, मानव


प्रेमिल भू निज ओर खींचती
रवि किरणें भी अंक लगातीं,
पवन दौड़ती भरती भीतर   
बदली बन छाया छा जाती  !

खिले कुसुम हँसते ललचाते
कर कलरव खग गीत सुनाते,
लेकिन हम अपनी ही धुन में
देख उन्हें भी देख न पाते !

अपनी लघुता में ही जीते   
मानव भी न रह पाते,
कभी खुशी कभी गम पाकर  
यूँ ही आते यूँ ही जाते !

 बन सकते मानव, मानव
स्वर्ग धरा पर ला सकते,
पायी मेधा, प्रखर मति भी   
हो सजग विवेक वरत सकते !

भाव पूत, अंतर कर निर्मल
कर्म श्रेष्ठ निश्छल मृग छौने,
प्रेम भरे अंतर में अनुपम
जिसके आगे सब सुख बौने !

अनिता निहालानी
१३ मार्च २०११
 

गुरुवार, मार्च 10

पल-पल मधु का सोता भीतर

पल-पल मधु का सोता भीतर

चमचम चमक रहा है दिनकर
वर्तमान का मन अम्बर पर,
ढक लेते अतीत के बादल
भावी का कभी छाता अंधड़ !

झर-झर झरता ही रहता है
 पल-पल मधु का सोता भीतर ,
कभी मूर्च्छा पाहन बनती
मोह कभी बन जाता पत्थर !

सुख की तो इक खान छिपी है
दुःख की इस चट्टान के पीछे,
द्वार बंद कर कर्णों के हम
बस बैठे हैं ऑंखें मींचे !

मन सरवर पर फैली काई
उग नहीं पाते शांति कमल,
गतिमय कर्मशील अंतर में
बहता जाता है जल निर्मल !

खिले हुए हैं पुष्प हजारों
उर उपवन पर छाया पाला,
शिशु सम था जो अंतर पावन
चाह जगी मैला कर डाला !

मुक्त हाथ से बांटे प्रकृति
जीवन में जो भी है सुंदर,
पर जाने क्यों हम जो चुनते
बन जाता है वही असुंदर !

अनिता निहालानी
१० मार्च २०११     

सोमवार, मार्च 7

हर कोई चाहे कुछ होना

हर कोई चाहे कुछ होना

मैं भी ‘कुछ’ हूँ, तुम भी ‘कुछ’ हो
यह भी ‘कुछ’ है, वह भी ‘कुछ’ है,
हर कोई चाहे ‘कुछ’ होना
यही तो है दुनिया का रोना !

‘कुछ कुछ’ जोड़ दिलों को तोड़ा
भानमती ने कुनबा जोड़ा,
तज मूल्यों को माया चाही
 हर्षद, राजा या मधु कोड़ा !

लेकिन ‘कुछ’ भी न हो पाए
व्यर्थ ही सारा श्रम बह जाये,
माया मिले न राम किसी को
मिलने का बस भ्रम रह जाये !

‘कुछ’ होने का जब भ्रम छूटे
शून्य रूप जब अपना जाने,
‘कुछ कुछ’ से ‘सब कुछ’ हो सकता
स्वयं की असलियत पहचाने !

अनिता निहालानी
७ मार्च २०११


  

मंगलवार, मार्च 1

महाशिवरात्रि के अवसर पर शुभकामनायें



महाशिवरात्रि

ब्रह्मा रचते, विष्णु पालक, हे शिव ! तुम हो संहारक
तीनों देव बसें मानव में तीनों जन-जन उद्धारक !

किन्तु आज शक्ति के मद में, भुला दिये मूल्य मानव ने
स्व-विनाश की करे व्यवस्था, जगह देव की ली दानव ने !

दुरूपयोग सृजन शक्ति का, व्यर्थ आणविक अस्त्र बनाये
पंचतत्व को करता दूषित, अपनी बुद्धि पर इतराए !

पालन करना भूल गया वह, विष्णु को है दिया सुला
असुरों का ही खेल चल रहा, देवत्व को दिया भुला !

हे शिव ! प्रकटो, मृत हो कण-कण नव जीवन पा जाये
सड़ा गला जो भी है बासी, हो पुनर्गठित खिल जाये !

हे काल पुरुष ! हे महाकाल ! हे प्रलयंकर ! हे अभयंकर !
कर दो लीला, जड़ हो चेतन व्यापे विप्लव, हे अग्निधर !

सदियों से जो लगी समाधि, तोड़ नेत्र खोलो अपना   
कल्याणमय हे शिव शम्भु ! परिवर्तन न रहे सपना !  

तुम महादेव ! हे देव देव ! कर तांडव सृष्टि को बदलो
जल जाये लोभ का असुर आज, चेतना अंतर की बदलो !

हे पशुपति ! पशुत्व मिटाओ मानव की गरिमा लौटे
अज्ञान मिटे, अमृत बरसे गुमी हुई महिमा लौटे !

सर्प धर ! हे सोमेश्वर ! प्रकटो हे सौम्य चन्द्रशेखर !
मुंडमाल, जटा धारी, हे त्र्यम्बकम ! हे विश्वेश्वर !

तुम शमशान की राख लपेटे वैरागी भोले बाबा !
हे नीलकंठ ! गंगाधारी ! स्थिर मना, हे सुखदाता !

तुम करो गर्जना आज पुनः, हो जाये महा प्रलय भीषण  
हे बाघम्बर ! डमरू बोले, हो जाये विलय हर एक दूषण !  

शुभ शक्ति जगे यह देश बढ़े सन्मार्ग चलें हर नर-नारी
हे अर्धनारीश्वर ! हे महेश ! हे निराकार ! हे त्रिपुरारी !

धर्म तुम्हारा सुंदर वाहन, नंदी वाहक ! हे रसराज !  
हे अनादि ! अगम ! अगोचर ! काल भैरव ! हे नटराज !

अनिता निहालानी
१ मार्च २०११

गुरुवार, फ़रवरी 24

ऐसा है आदमी




ऐसा है आदमी


खुद के बनाये जाल में जकड़ा है आदमी
वरना तो चाँद छू के आया है आदमी !

मंजिल की खोज में तो निकला था कारवां
मुड़ के जो राह देखी तनहा था आदमी !

मकसद सभी का साझा जन्नत बने ये दुनिया
फिर क्यों दीवारें दिल में चुनता है आदमी !

सुबह से शाम तक जो कसमें खुदा की खाए
अनजान ही खुदा से रहता है आदमी !

अनिता निहालानी
२४ फरवरी २०११

मंगलवार, फ़रवरी 22

स्वयं को ही जग माना हमने


स्वयं को ही जग माना हमने


स्वयं की सत्ता मान ली हमने
स्वयं को इतना मान दिया,
स्वयं की प्रभुता के आगे
न ईश को भी स्थान दिया !

झट कुम्हलाये, झट झुंझलाए
लघु ठेस भी सह न पाए,
पीड़ित अहं ने पीड़ा बांटी
कल्पित दुःख भी हमें सताए !

स्वयं के आगे नजर न जाती
स्वयं से शुरू स्वयं पर आती,
स्वयं को ही जग माना हमने
अल्प ज्ञान पर हम इतराए !

प्रेम किया तो नापतोल कर
कुछ देकर कुछ वापस लेकर
उथले उथले जल में जाकर
झूठे मोती हम ले आये !

अनिता निहलानी
२२ फरवरी २०११