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शनिवार, सितंबर 19

वही वही

आकाश 


एक वही अनंत आकाश 

 झरता है जिसमें से परम प्रकाश 

वही आश्रय है हमारा 

उपजे उसी से 

उसी में समा जाएँगे 

कुछ पल डोलेंगे यहाँ 

इंद्रधनुष की तरह 

देखते-देखते विलीन हो जाएँगे !


सागर 


एक वही गहरा सागर 

उसमें उठी एक लहर हैं हम 

कुछ घड़ी सिर पटकेगी फिर 

लौट जाएगी 

उसी की गहराई में 

सो जाएगी !


चेतना 


एक वही परम चेतना  

उधार लेकर थोड़ी सी 

बन गये हैं हम ‘मन’

थोड़ी देर सोचेगा, समझेगा 

सीखेगा, सिखायेगा 

फिर उसी में खो जाएगा !



शनिवार, सितंबर 12

लोक चेतना में बसते हैं

गणपति उत्सव 


श्रीगणेश कारण हैं सबके 

मिट्टी, गोबर से भी रच लो, 

दूर्वा का तिनका कर अर्पण  

छोटा सा मोदक ही धर दो !


बहुत सरल, शुभता के दाता 

कर्ण विशाल व आँखें गहरी,

ज्ञानी, बली  नृत्य भी जानें 

सब कलाओं के हैं पारखी !


एक मुक्त आकाश की भाँति 

गणपति प्रेम का बाना ओढ़े, 

सुखकर्ता, दुखहर्ता, पालक

 बन कर आते अतिथि अनोखे !

  

लोक चेतना में बसते हैं 

एक अनूठा हर्ष जगाते, 

भेद भावना तज कर सारे 

छोटे-बड़े सभी मिल गाते ! 


मोदक भाते गणनायक को 

है आमोद-प्रमोद प्रिय जिनको, 

घर, दुकान कहीं भी बसा दो 

विशालकाय, शुभ तुंडकाय को !


गजमस्तक मुख सबसे सुंदर 

लंबोदर औ" मूषक वाहन, 

अद्भुत अति सिखावन उनकी 

साधें हर हाल में संतुलन !


खुलकर, हँसकर, गाकर जीओ 

पाठ सिखाते सहज प्रेम का,  

हर नेत्र में अश्रु होते जब 

समय आ गया हो विदा का ! 


सर्जन और विसर्जन दोनों 

जीवन में सदा संग विचरते, 

गणपति उत्सव यही सिखाता 

मिट-मिट कर हम पुनः जन्मते !

 

गुरुवार, मई 21

असली घर है रिक्त आकाश

असली घर है रिक्त आकाश



घर की चिंता करते करते 

समय और शक्तियाँ लगायी, 

साथ नहीं जाने वाला है 

धोखा देगा, पड़े सुनायी !


दीवारों से नहीं बना है 

असली घर है रिक्त आकाश, 

वातावरण विशुद्ध बना लें 

अंतर से उमड़ पड़े प्रकाश !


वायु शुद्ध हो, प्राण शुद्ध हों 

भाव विमल मुस्कान सजीली, 

घर के भीतर रहने वाला 

हर इक छेड़े तान सुरीली !


प्रेम बहे कोई द्वन्द्व न हो 

जीवन इक वरदान बनेगा, 

पलकों में शुभ स्वप्न सजेंगे 

सम्मुख वही अनाम रहेगा !

 

सोमवार, मार्च 16

जहाँ खुला आकाश मात्र था

जहाँ खुला आकाश मात्र था 


भ्रम के कितने सर्प पल रहे 

मानव को ख़ुद ही डसते हैं, 

 लगती होड़ सुपर होने की 

अहंकारी मुल्क भिड़ते हैं !


जहाँ खुला आकाश मात्र था 

मानव ने दीवारें गढ़ लीं, 

सीमाओं में बाँधा मन को 

जहाँ प्रेम था, हिंसा पढ़ ली ! 


पक्की, मोटी, दृढ़ दीवारें 

मान्यताओं, पूर्वाग्रहों की, 

कोई इन्हें तोड़ने निकले 

झर जाएँगी भुर भुर करतीं !


जो जैसा है, वैसा ही है 

होड़ छोड़ ख़ुद में टिक जाये, 

 तोड़ रहा जो सूत्र प्रेम का 

जोड़, मोड़ से वापस आये ! 


बुधवार, जनवरी 28

समुद्री यात्रा

समुद्री यात्रा


समुन्दर की असंख्य लहरों पर 

डोलती, झूमता हुआ मस्त खटोले सी 

बढ़ता जाता है जहाज 

आकाश और समुंदर जहाँ मिलते हैं 

क्षितिज पर धूमिल हो गया है भेद 

आकाश छू रहा है लहरों को 

या लहरें उठती चली गई हैं उस तक 

सर्पिली लहरें फेन बनाती हुई नाच रही हैं 

जो बिखर जाता है पल भर में 

जीवन की नश्वरता का बोध कराता हुआ 

 शाश्वत है जल पर लहरें नश्वर 

ज्यों शाश्वत है जीवन, जगत नश्वर 

सामने बिछी है जल की अनंत राशि 

 आह्लादित हैं सैकड़ों दिल जिसे निहार

 संजो रहे हैं मनों में 

यह अनुभव शायद पहली बार !



बुधवार, अगस्त 13

प्रकृति के सान्निध्य में

प्रकृति के सान्निध्य में 

भोर की सैर 


श्रावण पूर्णिमा की सुहानी भोर 

 छाये आकाश पर बादल चहूँ ओर 

प्रकृति प्रेमी एक छोटे से समूह ने 

कब्बन पार्क में एक साथ कदम बढ़ाये 

जो दिल में एक नये अनुभव का 

सपना संजोकर थे आये !


हरियाली से भरे झुरमुट 

और पंछियों के कलरव में 

एक सुंदर कविता से आगाज़ हुआ 

हर दिल में सुकून जागा 

और कुदरत के साथ होने का अहसास हुआ ! 


सम्मुख था आस्ट्रेलियन पाम

जिसे कैप्टन कुक पाइन ट्री भी कहते हैं 

जो झुक जाते हैं भूमध्य रेखा की ओर 

दुनिया में चाहे कहीं भी रहते हैं 

हर किसी ने जब उसके तने को छुआ था

शायद उस पल में  

एक अनजाना सा रिश्ता उससे बन गया था !


फिर बारी आयी आकाश मल्लिका की 

जिसकी भीनी ख़ुशबू से सारा आलम महका था !


वृक्षों में मैं पीपल हूँ, कृष्ण ने कहा था 

इसके नीचे ही बुद्ध को ज्ञान हुआ था 

पीपल में इतिहास और पुराण छिपे हैं 

बरगद के पैर चारों दिशाओं में बढ़े हैं 

घेर लेता यह भूमि को, अपनी जटाओं से 

कभी उग जाता किसी अन्य पेड़ की शाखाओं पे 

मिट जाता शरण देने वाला 

बस जाता मेहमान

बनियों की बैठकें 

हुआ करती रही होंगी इसके नीचे 

तभी नाम पाया है बैनियान !


ब्रह्मा ने किया था विश्राम 

सट शाल्मली के तने से, 

सेमल की कोमल रूई का 

जन्मदाता है ये !


जलीय भूमि के पौधों की दुनिया अलग थी 

हरियाली चप्पे-चप्पे पर 

जल को ढके थी !


चीटियों के घोसलें शाख़ों पर लगे देखे 

जब रोमांच से भरे उनके किस्से सुने 

 अनोखे राज जाने तब कुदरत के !


अरबों वर्ष पुरानी चट्टानें भी वहाँ हैं 

डायनासोर के विलुप्त होने की जो गवाह हैं 

श्वेत मकड़ियाँ श्वेत तने पर 

नज़र नहीं आती हैं 

शायद इस तरह शिकार होने से

 ख़ुद को बचाती हैं 

वृक्षों और कीटों का संसार निराला है 

जिसने जरा झाँका इसके भीतर 

मन में हुआ ज्ञान का उजाला है ! 


बुधवार, नवंबर 27

ॐ

ॐ


जो आकाश है 

वही सूरज बन गया है 

जो सूरज है 

वही धरा बना 

जो धरा है वही चाँद 

और सभी निरंतर होना चाहते हैं 

वह, जो थे 

जाना चाहते हैं वहाँ 

जहाँ से आये थे !


आदमी में 

आकाश है परमात्मा 

सूरज - आत्मा 

चाँद - मन और 

धरा है देह 

मन, देह से और 

देह, आत्मा से जुड़ना चाहती है 

आत्मा की चाह है परमात्मा से जुड़ 

आकाश होना 

यही गति जीवन है 

अंततः सभी आकाश हैं 

विस्तीर्ण, अनंत, शून्य आकाश !


शुक्रवार, मार्च 17

रिक्तता


रिक्तता 

जब ख़ाली हो मन का आकाश 

तो कोई राजहंस तिरता है

उसमें हौले-हौले 

नील निरभ्र आकाश में वह श्वेत बादल सा हंस 

जिसके पंखों की श्वेत आभा  

पथ को रोशन करती है 

जीवन में उजास भरती है 


जब ख़ाली हो मन का आकाश 

तो वंशी की धुन गूँजती है 

मद्धिम-मद्धिम 

खुले अंबर में वह प्यारी सी तान 

आह्लादित करती मन प्राण 

हृदय में विश्वास भरती है 


जब न रहे कोई दूसरा 

तो रस की एक धार बही आती है 

मंद-मंद हवा के झोंकों सी 

देखते-देखते 

सारे जग में छा जाती है ! 


बुधवार, जून 1

पल पल इसको वही निखारे

पल पल इसको वही निखारे

दी उसने ही पीर प्रेम की 

दिलों में भर देता विश्वास, 

उड़ने को दो पंख दिए हैं

दिया अपार  अनंत आकाश !


वही बढ़ाये इन कदमों को 

नित रचता नूतन राहों को, 

लघुता झरी ज्यों बासी फूल 

सदा जगाया शुभ चाहों को !


कूके जो कोकिल कंठों से 

महक रहा सुंदर फूलों में, 

उससे ही यह विश्व सजा है 

सीख छिपी शायद शूलों में !


कोई भूला उसे न जाने 

दुःख अपने ही हाथों बोता, 

केवल निज सत्ता पहचाने 

नित दामन अश्रु से भिगोता !


स्वामी है जो सकल जहाँ का 

उसकी जय में खुद की जय है,

नाम सदा उसका ही लेना

उस संग हर कोई अजय है !


वही गगन, जल, अगन बना है वही हवा, धरती बन धारे, उसने ही यह खेल रचाया पल पल इसको वही निखारे !


हम उसके बनकर जब रहते 

सहज पुलक  में भीगा करते, 

उसकी मस्ती की गागर से  

छक-छक कर मृदु हाला पीते !


सोमवार, सितंबर 27

अस्तित्त्व और चेतना

अस्तित्त्व और चेतना 

ज्यों हंस के श्वेत पंखों में 

बसी है धवलता 

हरे-भरे जंगल में रची-बसी हरीतिमा 

जैसे चाँद से पृथक नहीं ज्योत्स्ना 

और सूरज से उसकी गरिमा 

वैसे ही अस्तित्त्व से पृथक नहीं है चेतना 

अग्नि में ताप और प्रकाश की नाईं

शक्ति शिव में समाई 

ज्यों दृष्टि नयनों में बसती है 

मनन मन में 

आकाश से नीलिमा को कैसे पृथक करेंगे 

हिरन से उसकी चपलता 

वैसे ही जगत में है उसकी सत्ता 

लहरें जल से  हैं बनती 

जल क्या नहीं उसकी कृति !