kishunk ka fool लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
kishunk ka fool लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

गुरुवार, जनवरी 27

मैं किशुंक का फूल नहीं हूँ

मैं किशुंक का फूल नहीं हूँ

बहुत वर्षों पहले मेरे फुफेरे भाई ने, जो अब इस दुनिया में नहीं है, यह कविता मुझे भेजी थी, उसने स्वयं लिखी थी या उसने कहीं से नकल की थी मैं जान नहीं पायी. मेरी डायरी में यह अनेक वर्षों से पड़ी हुई थी, आज मैं उसी भाई की स्मृति में आप सबके सम्मुख इसे प्रस्तुत कर रही हूँ यदि किसी को इसके रचनाकार का नाम ज्ञात हो तो कृपया अवश्य बतायें.

कांटे तो रखता हूँ, लेकिन छाया रहित शूल नहीं हूँ
मैं किशुंक का फूल नहीं हूँ !

प्रेम घृणा दोनों से मैंने
अपलक निर्भय आँख मिलायी
पर मेरी निष्कपट धृष्टता
भीरु जगत को रास न आयी,
कायरता के छल से करना
नहीं कभी समझौता सीखा
इसीलिए अमृत-पूजा का
फल भी मिला गरल सा तीखा !

लघु-लघु लहरें काट गिरा दें, ऐसा पोला कूल नहीं हूँ
मैं किशुंक का फूल नहीं हूँ !

विश्वासी मन ने चाहा
विश्वास सदा ही भोलाभाला
किन्तु घात करने वालों को
केवल प्रतिघातों से टाला
निश्छल उर के चरणों पर तो
रख दी मन की ममता सारी
पर ठोकर वाला पग चूमूं
ऐसा नहीं विनम्र पुजारी

दम्भ नहीं कुछ होने का, पर निरी शून्य की भूल नहीं हूँ
मैं किशुंक का फूल नहीं हूँ