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शुक्रवार, जुलाई 31

मन के पार

मन के पार 


मन के पार जाना ही होगा 

यदि शुद्ध प्रेम का स्वाद लेना है 

मन दो पर टिका है 

यहाँ घृणा चली आती प्रेम के साथ

शांति के पीछे अशांति 

संत के पीछे असंत 

और हर अपराधी के पीछे 

एक निर्दोष भाव भी !


मन एकांगी नहीं है 

यहाँ द्वैत है 

या कहें द्वैत ही मन है

बह ही नहीं सकती 

दो तटों के बिना नदी मन की ! 


उसके पार केवल एक 

एक अनंत का विस्तार 

जहाँ चीजें बँटी नहीं 

 विशुद्ध प्रेम

और शांति भी भरपूर 

वहाँ दो की छाया भी नहीं 

वहाँ परम स्वीकार है !


मन टुकड़ों में बाँटता है 

टुकड़ा-टुकड़ा प्रेम 

नहीं दिया जाता ईश को 

यहाँ तो पूरा का पूरा ही 

देना होता है स्वयं को ! 

 

शनिवार, जुलाई 18

मन का शावक थिर हो जाता

मन का शावक थिर हो जाता


भर श्रद्धा-विश्वास ह्रदय में 

भीतर कदम बढ़ाना होगा, 

पूर्ण समर्पण उस अनाम में 

प्रेम विशुद्ध जगाना होगा !


वह भी भीतर राह देखता 

बाधाएँ कभी पथ न रोकें, 

जीवन का कोई भी अनुभव 

अंतर की यह प्यास न सोखे ! 


श्वासें ही रस्ता दिखलायें 

जब भी कोई भीतर जाता, 

भीतर की गुंजन को सुनकर 

मन का शावक थिर हो जाता !


हर भ्रम एक द्वार बन जाता 

हर दुविधा आगे ले जाती, 

दुख भी यहाँ सहायक होते 

सुख चाहत ऊर्जा दे जाती !

 

शुक्रवार, जुलाई 10

शिवालय

शिवालय 


कोई कहता है 

शिव के भीतर प्रेम है 

जैसे कि शिव और प्रेम हों

 दो अलग-अलग वस्तुएँ 

असल में प्रेम ही शिव है  

जब भीतर जागता है प्रेम 

मन ख़ाली हो जाता है 

सारे भेद मिट जाते हैं 

श्वासें गढ़ती भीतर 

वह मंदिर

 जिसमें शिव विराजमान होते
पूरक देह में स्थान बनाती  

रेचक मन की थिरता को दृढ़ करती 

पूरक है आत्मा का जीवन

रेचक संसार का 

दोनों के मध्य 

शिव का वास है 

जो उसमें जागेंगे 

वे जानेंगे !

 

शनिवार, जून 6

चिंगारी प्रेम की

 चिंगारी प्रेम की 

प्रेम कविताएँ और कहानियाँ 

पढ़ी जाती हैं, रची जाती हैं, सुनायी जाती हैं 

क्योंकि प्रेम की जो नन्हीं सी चिंगारी 

छिपी है हरेक मन में 

उसे हवा देकर पल भर को सुलगाती हैं 

या कोई मन छिपाये हो भीतर

 प्यार की सुवास 

वह बिखर जाती है

 किसी अनजान पल में 

जब वह सचेत नहीं है 

रक्षा नहीं कर रहा है 

पहरे पर नहीं खड़ी है बुद्धि 

प्रेम कहो, सुनो या पढ़ो 

यदि रच नहीं सकते 

निज जीवन में भी प्रेम का बसंत छायेगा 

इन्हीं नयनों से इंतज़ार किया था 

सपनों से भरा था मन का आँगन 

वह पुन: नज़र आएगा 

प्रेम पावन है 

क्योंकि प्रेम दान है 

पूजा है अर्पण है ! 

 

गुरुवार, मई 21

असली घर है रिक्त आकाश

असली घर है रिक्त आकाश



घर की चिंता करते करते 

समय और शक्तियाँ लगायी, 

साथ नहीं जाने वाला है 

धोखा देगा, पड़े सुनायी !


दीवारों से नहीं बना है 

असली घर है रिक्त आकाश, 

वातावरण विशुद्ध बना लें 

अंतर से उमड़ पड़े प्रकाश !


वायु शुद्ध हो, प्राण शुद्ध हों 

भाव विमल मुस्कान सजीली, 

घर के भीतर रहने वाला 

हर इक छेड़े तान सुरीली !


प्रेम बहे कोई द्वन्द्व न हो 

जीवन इक वरदान बनेगा, 

पलकों में शुभ स्वप्न सजेंगे 

सम्मुख वही अनाम रहेगा !

 

शनिवार, मई 9

पूर्णता

पूर्णता 


कोई चाहता है 

कि हम आगे बढ़ें 

इसलिए वह रास्ते में 

पत्थर रख देता है

कोई चाहता है

 कि हम ऊँचा उठें  

इसलिए वह पैरों में 

बेड़ियाँ डाल देता है 

कोई चाहता है 

कि हम मुक्त हो जायें 

इसलिए वह भीतर प्रेम जगा देता है 

कोई चाहता है 

हम पूर्ण विकसित हों 

इसलिए वह पाहन, बेड़ियाँ, प्रेम 

सब के साथ पूर्णता की चाह भी 

भर देता है !! 


 

बुधवार, मार्च 25

प्रेम रहेगा कैसे मन में

प्रेम रहेगा कैसे मन में


जब ना कोई घर में रहता 

 तब चुपके से कान्हा आता, 

नवनीत चुरा मटका तोड़े 

गोपी का हर दुख मिट जाता !


द्वार खुला ही छोड़ गई थी 

निशदिन उसकी राह देखती, 

उसका होना ही बाधा था 

कैसे वह यह बात बूझती !


वह रहती या रहता कान्हा 

दोनों नहीं समाते घर में, 

नील गगन सा जो विशाल है 

प्रेम रहेगा कैसे मन में !


अलग कहाँ थी वह कान्हा से 

जैसे दिल के भीतर झाँका, 

वही प्रीत-संगीत, नृत्य था 

ग्वाल-बाल बना वही बाँका !




 

सोमवार, मार्च 16

जहाँ खुला आकाश मात्र था

जहाँ खुला आकाश मात्र था 


भ्रम के कितने सर्प पल रहे 

मानव को ख़ुद ही डसते हैं, 

 लगती होड़ सुपर होने की 

अहंकारी मुल्क भिड़ते हैं !


जहाँ खुला आकाश मात्र था 

मानव ने दीवारें गढ़ लीं, 

सीमाओं में बाँधा मन को 

जहाँ प्रेम था, हिंसा पढ़ ली ! 


पक्की, मोटी, दृढ़ दीवारें 

मान्यताओं, पूर्वाग्रहों की, 

कोई इन्हें तोड़ने निकले 

झर जाएँगी भुर भुर करतीं !


जो जैसा है, वैसा ही है 

होड़ छोड़ ख़ुद में टिक जाये, 

 तोड़ रहा जो सूत्र प्रेम का 

जोड़, मोड़ से वापस आये ! 


मंगलवार, फ़रवरी 17

कौन है वह !

कौन है वह ! 



कुछ भी तो नहीं पता हमें 

न कभी हो सकता है 

क्यों और किसने बनायी यह दुनिया ?

बस मन उस जादूगर के 

प्रेम में खो सकता है !

पी सकता है रस के वह सागर 

डुबो सकता है मन की गागर 

और निहार सकता है सृष्टि का सौंदर्य 

बाहर के साथ-साथ भीतर ! 


मौन के सागर में गूँजती है 

एक धुन 

शांति को मुखर बनाती 

रेशमी प्रकाश की एक चादर 

भीतर दूर तक बिछ जाती 

प्रेम शब्दों का आकार लेकर 

पन्ने पर उतरता है 

भला कोई कैसे 

शिव की मुस्कान को 

लिख सकता है !


रविवार, अक्टूबर 12

क्योंकि तुम ख़ुशी के परमाणुओं से बने हो

क्योंकि तुम ख़ुशी के परमाणुओं से बने हो 


जिसमें प्रेम के परमाणु भी हैं 

या वे बदल जाते हैं प्रेम में 

कई आयामी हैं वे 

जैसे प्रकाश की एक श्वेत किरण 

सात रंगों में टूट जाती है 

प्रिज्म से गुजरने पर 

आत्मज्योति में भी सात गुण छिपे हैं 

कभी प्रेम का लाल रंग 

मुखर हो उठता है चिदाकाश में 

जब भावनाओं के श्वेत निर्मल मेघ 

उमड़ते घुमड़ते हैं 

कभी शांति का नीलवर्ण 

शक्ति का केसरिया भी है यहाँ 

और ज्ञान का पीतवर्ण भी 

शुद्धता का बैंगनी रंग कितना मोहक है 

सुख की हरि फसल भी लहलहाती है 

अंतर  आकाश सुशोभित है 

इन सात रंगों से 

जहाँ से सात सुरों की गूंज भी आती है ! 


शुक्रवार, अक्टूबर 3

तू ही भरे रंग माया के

तू ही भरे रंग माया के


भाव सभी अर्पित करते हैं 

प्रेम और करुणा जो तुझसे, 

पल-पल इस जग में झरते हैं 

कष्ट हमारा हर हरते हैं !


मधुर तृप्ति का भाव जगा जो 

अतृप्ति का भी घाव लगा जो, 

चैन और बेचैनी उर की 

तेरे चरणों पर रखते हैं !


शांति औ' आनंद की मूरत 

देवी ! तू अज्ञान को हरे, 

तू ही भरे रंग माया के

हर वर माथे पर धरते हैं !


जगे परम स्वीकार ह्रदय में 

विश्रांति मिल जाये चरण में, 

मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार में 

ध्यान सदा तेरा करते हैं ! 


देवी ! तेरे रूप हज़ारों 

कथा अनेकों, नाम हज़ारों, 

किस-किस को जाने यह लघु मन 

तुझमें ही जीते मरते हैं !



शुक्रवार, सितंबर 19

दुख या प्रेम

दुख या प्रेम 


दुख का अंत कैसे होता है ?

क्या ऐसा कभी हुआ भी है ?

या हो सकता है ?


हाँ, यह संभव है

प्रेम में !

पर इसके लिए

रहना होगा शुद्ध वर्तमान में

जहाँ कोई विचार नहीं 

स्मृति नहीं 

चाह नहीं 

प्रतिरोध नहीं 

भीतर कोई गति नहीं 

वहीं तो प्रेम ‘है’ !


दुख अभाव से उपजता है 

अभाव केवल एक विचार है 

क्योंकि उसका ‘होना’ सदा है 

उसमें कुछ जोड़ा नहीं जा सकता 

उसमें से कुछ घटाया नहीं जा सकता 

होना और न होना दोनों में 

कोई मेल नहीं !

उनके मध्य नया कुछ भी नहीं 

या तो सब अतीत है

या बस शुद्ध ‘अब’ 

‘होना’ पूर्ण है 

प्रेम के लिए ‘होना’ ज़रूरी है और 

होने के लिए विचार से स्वतंत्रता 

अंततः स्वतंत्रता ही प्रेम है !


बुधवार, जुलाई 16

ढाई आखर सभी पढ़ रहे

ढाई आखर सभी पढ़ रहे



 प्रेम अमी की एक बूँद ही

जीवन को रसमय कर देती, 

 दृष्टि एक आत्मीयता की 

अंतस को सुख से भर देती ! 


प्रेम जीतता आया तबसे 

जगती नजर नहीं आती थी, 

एक तत्व ही था निजता में 

किन्तु शून्यता ना भाती थी !


 स्वयं शिव से ही प्रकटी शक्ति  

प्रीति बही थी दोनों ओर,

वह दिन और आज का दिन है 

बाँधे कण-कण प्रेम की डोर !


हुए एक से दो थे जो तब 

 एक पुन: वे  होना चाहते,  

दूरी नहीं सुहाती पल भर 

प्रिय से कौन न मिलन माँगते ! 


खग, थलचर या कीट, पुष्प हों 

प्रेम से कोई उर न खाली, 

मानव के अंतर ने जाने 

कितनी प्रेम सुधा पी डाली ! 


करूणा प्रेम स्नेह वात्सल्य 

ढाई आखर सभी पढ़ रहे  

अहंकार की क्या हस्ती फिर, 

प्रेमिल दरिया जहाँ बह रहे !