प्रेम
प्रेम ! एक पहाड़ी नदी
जो उदगम पर उफनती, शोर मचाती
उच्च प्रपात बन छलांग लगाती
खो जाती कभी गहन कन्दराओं में !
वैसे ही सिमट जाता
प्रेम ! मन की गुफाओं में
कभी विशाल धारा सम शांत
बहता, फिर हो जाता संकरा
पर सदा बना रहता
सदानीरा सा !
अमरबेल सा बसा रहता
दिल की गहराइयों में
कभी गुप्त, प्रकट कभी
प्रेम स्वयं में अपूर्ण है,
परम से मिलने तक !
जैसे नदी सागर मिलन से पूर्व !
अनिता निहालानी
१९ नवम्बर २०१०