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मंगलवार, अगस्त 26

शुभता के प्रतीक गणनायक

शुभता के प्रतीक गणनायक 


गणपति हैं जन-जन के नायक 

हर घर-आँगन में बस जाते, 

नृत्य, गायन, साज-सज्जा के 

जाने कितने ढंग सिखाते !


पाहन, माटी, काष्ठ  की मूर्ति 

स्वर्ण, रजत, पीतल, क्रिस्टल की, 

कलावृंद प्रेरित हो रचते 

भक्त प्रेम से पूजा उसकी !


मूषक, मोदक, रूप सुहाना 

भर देते उमंग ह्रदयों में, 

कहीं स्तोत्र, मंत्रों का गायन 

हवन यज्ञ होता कुंडों में !


शुभता के प्रतीक गणनायक 

मंगलकारी, बाधा हरते,  

वरद हस्त, अभय मुद्रा धरे 

हर दिल में उल्लास  जगाते !



शनिवार, अप्रैल 3

पूजा पूजा के लिए

पूजा पूजा के लिए 


जब साधन भी हो पूजा साध्य भी  

वही फल है जीवन वृक्ष का 

जब आपा  कहीं पीछे छूट जाए 

तब जीवन पथ पर ‘कोई’

नया उजाला बिखेर जाता है !

जब अंतर तृप्त होकर छलक जाए

हर उस घड़ी में वह अनाम ही 

हमसे अभिसिक्त हुआ जाता है !

यदि अश्रु करुणा, प्रेम या कृतज्ञता के 

छलके कभी नयनों से  

चढ़ जाते वे स्वतः शिव मन्दिर में 

पूजा जब सहज घटती है 

तभी साधना सफल होती है 

जब उसी की पूजा कर 

 रिझा कर उसे ही पाया जाता है 

तब जीवन से कुछ नहीं पाना 

जीवन का ही उत्सव मनाया जाता है 

अपना होना ही जब 

उसके होने का प्रमाण बन जाये  

तब जीवन हर घड़ी एक वरदान बन जाता है !

 

गुरुवार, नवंबर 12

लो फिर आयी विमल दीवाली

 लो फिर आयी विमल दीवाली 

जगमग दीप जले पंक्ति में 

बन्दनवार लगे हर द्वारे 

सजी दिवाली महके जन पथ 

तोरण सजे गली चौबारे 

उठी सुगन्ध गुजिया, मोदक की 

वस्त्र नए देहों पर सरसर

लगी झालरें जली बत्तियां 

थाल सजे पूजा के मनहर 

सजे विनयाक, धान्य लक्ष्मी 

राग जगाती सुख बरसाती 

लो फिर आयी विमल दीवाली 

स्वच्छ हुए सबके घर आंगन 

भर उमंग से चहके सब मन 

कोमल भाव भरे अंतर में 

निकले बाल, युवा, सजधज कर 

नहीं अभाव सताता कोई 

देने का संकल्प जगा है 

दूर हुआ अँधियारा सारा 

रससिक्त हर भाव पगा है 

सुख की लहर उठी सागर में 

पावन पवन देवता बहते

दिग-दिगन्त में करुणा बसती

सूर्यदेव भी सुखमय लगते 

ऋतु मोहक माह शरद कार्तिक 

हरा रोग आरोग्य सफल है 

भारत भू का पर्व अनोखा 

ज्योतिपर्व यह अति मंगल है !


गुरुवार, जुलाई 30

कुछ पल


कुछ पल

ऐसे भी होते है कुछ पावन पल
जब खो जाती है प्रार्थना  
क्योंकि दो नहीं हैं वहाँ
नहीं घटती पूजा... उस निशब्द में  
रह जाता है एक सन्नाटा
और उसमें गूंजती कोई अनाम सी धुन..
निर्निमेष नयन.. और पिघलता हुआ सा अस्त्तित्व
काव्य नहीं झरता..
 कहने को कुछ शेष नहीं है
रह जाता है मौन और उसमें बजता कोई निनाद..
दिपदिप करता उजाला बंद नेत्रों के पीछे
दुनिया होकर भी नहीं है उन अर्थों में
शेष है एक पुलक, कौंध एक
एक अहसास से ज्यादा कुछ नहीं..
बस यही घड़ियाँ होती हैं जीने के लिए..


शुक्रवार, जनवरी 9

एक अनोखा बचपन

एक अनोखा बचपन

नन्हा पुनः आकाश को एकटक देखता पाया गया, माँ ने जब सारा घर छान लिया तो उसे ध्यान आया कि कहीं पिछली बार की तरह वह बगीचे में घास पर लेट कर आकाश की नीलिमा में तो नहीं खो गया I आहट पाते ही वह चौंक कर उठ बैठा, काले लम्बे व घने केशों से सजा उसका साँवला चेहरा व बड़ी-बड़ी आंखें सभी को मंत्र मुग्ध कर लेती थीं I
“बेटा, तू आकाश में क्या खोजता फिरता है?
“माँ, मैं आकाश के पार जाना चाहता हूँ, जाने क्या है उसके पार, तुम जानती हो क्या?”
माँ खिलखिला कर हँस पड़ी. “वहाँ कुछ भी नहीं है बेटा, यह नीला रंग भी तो आभास मात्र है I”
“नहीं, वहाँ कुछ है, जरूर कुछ है, एक दिन मैं उसको ढूँढ निकालूँगा I”
ठीक है, अभी तो तुझे स्कूल के लिये तैयार होना है I
स्कूल पहुंचा तो मित्रों ने घेर लिया, आज भी उसे दो छात्रों के बीच मध्यस्थता करानी थी I उसका निर्णय सब आँख मूंद कर मानते थे I अध्यापक भी उसकी निर्दोष आंखों और तीव्र बुद्धि से प्रभावित थे I एक वर्ष में दो कक्षाएं पास करता हुआ वह आठ साल की उम्र में छठी का विद्यार्थी था I बड़ी कक्षाओं के विद्यार्थी भी उससे बातें करते अक्सर देखे जा सकते थे I जब कोई उससे पूछता वह बड़ा होकर क्या करेगा तो सदा एक ही जवाब वह मुस्कुराते हुए देता था, मैं दूर देशों तक लोगों से मिलने जाऊँगा, वे मेरी प्रतीक्षा कर रहे हैं I पूछने वाला चकित हो जाता तो वह हँस पड़ता, बच्चे के मुँह से निकली बात को महत्वहीन समझ कर लोग भुला देते I
छोटी बहन उसकी सबसे बड़ी प्रशंसिका थी, जब तक वह घर में रहता आगे-पीछे घूमती रहती, फिर भी कभी-कभार उनमें झगड़ा हो जाता तो वह चुपचाप अपने काम में लग जाता जैसे कुछ हुआ ही न हो I बहन थोड़ी देर मुँह फुलाए रखती फिर खुद ही धीरे से आकर बात करने लगती क्योंकि वह तो तब तक झगड़े की बात भूल ही चुका होता था I दोनों मिल कर खेलों की नई-नई योजनाएँ बनाने लगते I वह जब ध्यान मग्न होता तो बहन उसका चेहरा देखती रह जाती, उसे छोटी उम्र से ही अहसास हो गया था कि उसका भाई अन्य सब बच्चों से अलग है I जब बच्चे बिना किसी जरूरत के फूल-पत्ती व टहनियाँ तोड़ते हुए निकल जाते वह पूजा के लिये फूल तोड़ने में भी झिझकता था, एक चींटी तक को मारना भी उसे मंजूर नहीं था, स्कूल में पैर की ठोकर से फुटबाल उछालते समय जब अन्य छात्रों को खुशी से भरे देखता तो उसका कोमल हृदय कांप जाता, वह अपने पैरों की ओर देख कर सोचता इनसे किसी को ठोकर मारना तो दूर हल्की सी चोट भी नहीं लगाई जा सकती I जब दूसरे बच्चे मैदान में धमा-चौकड़ी मचाते वह नयन मूंदे जाने क्या सोचा करता नहीं तो निकट के मंदिर के पुजारी की गतिविधियों को ध्यान से देखा करता I कभी-कभी मुहल्ले के बच्चे खेल खत्म कर उसके निकट आ बैठते और वह उन्हें काल्पनिक मूर्ति की पूजा करना सिखाता, ध्यान करना सिखाता I कई श्लोक उसे कंठस्थ थे अपनी मधुर आवाज में जब गाता सब मौन हो सुनने लगते I
पिता एक सरकारी दफ्तर में अधिकारी थे, उनका सामान बैठक में बड़ी मेज पर एक छोटी अटैची में रखा रहता था, कुछ फाईलें, जरूरी कागजात, पेन, चश्मा तथा चाबियाँ यही सब था उस सामान में I उसने देखा कि पिता जब दफ्तर के लिये तैयार होते हैं तो सारा घर उनके आगे पीछे घूमता है, माँ खाना बनाते-बनाते उनके कपड़े आदि रख जाती, नौकर जूते पॉलिश कर ले आता I पिता गम्भीर मुद्रा में सब पर हुकुम चलाते I एक दिन सोने से पहले उसने अटैची से सारा सामान निकाल कर अपने खिलौने उसमें रख दिए, पिता ने अगले दिन रोज की तरह अटैची उठाई व दफ्तर चले गए I वहाँ अपने सामान की जगह खिलौने देख पहले तो सकपका गए पर साथियों को हँसते देख खुद भी हँसने लगे I घर आने तक सोचते रहे कि उनके बेटे ने ऐसा क्यों किया, शायद वह उन्हें समझाना चाहता था कि जिन फाइलों को लेकर वह इतने गम्भीर हो जाते हैं, वे खिलौनों से बढकर कुछ नहीं I काम को अति महत्व देने से जीवन हाथ से छूट जाता है I घर आकर बालक को बुलाया तो वह चुपचाप आकर खड़ा हो गया, इशारे से उन्होंने पूछा, मेरा सामान कहाँ है? वह हाथ पकड़ कर अपने कमरे में ले गया, जहाँ सलीके से सारी फाइलें व अन्य चीजें रखीं थीं I पुत्र की मासूमियत देख वह मुस्कुरा दिए I जीवन का एक सूत्र आज इस नन्हे बालक ने उन्हें पकड़ा दिया था I
उसे दादी से बहुत लगाव था पर उनकी कुछ बातोँ का विरोध करने से वह नहीं चूकता था, चाहे इसके लिये उनके कोप का भाजन भी बनना पड़े I ग्वाले को घर में प्रवेश करने की आज्ञा नहीं थी क्योंकि वह एक हरिजन था I वह जानबूझ कर उसके साथ खेलता कभी उसके घर भी चला जाता I बाद में इसके लिये दादी की डाँट सहनी पड़ती I घर में काम करने वाली छोटी बालिका के साथ भी उसकी सहानुभूति थी, दिन भर उसको काम करते देख उसका मन करुणा से भर जाता I भगवदगीता के श्लोक उसे केवल याद ही नहीं थे वह जीवन में उनका पालन भी कर रहा था I दादी रोज संध्या बेला में एक आसन बिछा कर पूजा की थाली लिये भगवान की प्रतीक्षा करती थी, जाने किस रूप में वह आ जाएँ, इसलिए हर अतिथि को आदर सहित खिलाती व उपहार देती, उसे इस खेल में बहुत मजा आता I परमात्मा के प्रति उसका सहज प्रेम उसके जीवन की हर बात से जाहिर हो रहा था I
उस दिन वह जल्दी-जल्दी स्कूल से लौटा, सुबह उसकी पूजा व ध्यान अधूरा रह गया था क्योंकि घर में कुछ काम था I पर उसने कमरे में जाते ही देख लिया पूजा का स्थान खाली था, माँ ने फिर सब सामान हटा दिया था, माँ भोजन लाई तो उसने मुँह फेर लिया, थोड़ी देर बाद वह सारा सामान ताजे फूलों के साथ रख कर जाने लगी तो उसने कनखियों से उसकी नम आँखों को देखा और वह दौड़ कर उसके गले से लिपट गया I उसे याद आया पिछले हफ्ते ही उसने माँ को नाराज किया था जब स्कूल टूर से लौटने पर उसका खाली बैग देख कर माँ ने पूछा था “तेरे कपड़े कहाँ हैं, ओढ़ने व बिछाने की चादरें व शाल कहाँ हैं?”
कुछ और पूछने का मौका न देते हुए वह मुस्कुरा कर बोला, “मेरे मित्रों को तुम्हारी पसंद बहुत भाती है, मेरा सब कुछ तुम्हीं तो लाती हों माँ I”
पर माँ रोज-रोज की इस लुटाऊ वृत्ति से तंग आ चुकी थी सो खूब डाँट सुनायी I लेकिन दोनों जानते थे कि इस डाँट का असर ज्यादा दिन तक रहने वाला नहीं है I माँ को भय था कि इतना वैराग्य कहीं उसे घर से दूर न ले जाये I ध्यान में डूबे अपने पुत्र को देख कभी उसके शैशवकाल कि वह घटना याद आ जाती जब छत में लगी छड़ से लोहे की भारी जंजीरों सहित उसका लकड़ी का पालना नीचे आ गिरा था वह तो बेहोश ही हो गई थी पर नन्हा शिशु मुस्का रहा था I थोड़ा सा बड़ा होने पर जब वह भाषा का ज्ञान सीख गया उसकी कही हर बात मानता था, वही बालक अब सारा समय मंदिरों, मसजिदों, व चर्चों के चक्कर लगाता रहता था I
माँ पुत्र के इस व्यवहार से चिंतित हो जाती तो वह उसे आश्वस्त करता, माँ के कहने पर उसने पढ़ाई जारी रखी तथा भविष्य में नौकरी के लिये इंटरव्यू देने के लिये भी मान गया, पर उसके जीवन का उद्देश्य स्पष्ट था, वह सरे विश्व के लोगों के जीवन को खुशियों से भर देना चाहता था I

सोमवार, अक्टूबर 20

पर्वों का मेला दीवाली

पर्वों का मेला दीवाली



याद दिलाने सिया-राम की
भरने उर में रस उजास का,
जगमग करता घर चौराहे
आया उत्सव फिर प्रकाश का !

दीपों की ये दीर्घ कतारें
गगन उतर आया ज्यों भू पर,
तमस मिटाने अंतरतम् का
आया है दीपों का उत्सव !

कोना-कोना अपने घर का
स्वच्छ करें, चमचम चमकाते ,
रंगोली, तोरण, ध्वज, लड़ियाँ
भर उर में उल्लास सजाते  !

अंधकार में लख प्रकाश को
लक्ष्मी भूलोक पर आतीं,
देख उजाला जगमग राहें
यहीं अटक कर वह रह जातीं !  

धनतेरस दो दिन पहले है
पर्वों का मेला दीवाली,
एक आस्था युगों-युगों से
बन इक धारा बहती आती !

नरकासुर का अंत हुआ था  
नरसिंह रूप धरा विष्णु ने,
धनवंतरि भी जन्मे इस दिन
लक्ष्मी प्रकटी थीं सागर से !

एक दीप तुलसी के चौरे
याद उसी की कर रख आते,
मीलों तक वैभव हो शोभित,
द्वारे द्वारे दीप जलाते !

यम पूजा छोटी दीवाली
खील, बताशे, खाँड, मिठाई,
गुंजित होता नभ शुभ स्वर से
पूजित हों गणपति, लक्ष्मी !

काली थी जो रात अमावस
पूनम से भी ज्यादा रोशन,
याद कृष्ण की हमें दिलाये
अगले दिन पूजित गोवर्धन !

भाईदूज चला आता फिर
स्नेह बढ़ाता सहोदरों में
अंधकार की हुई पराजय
छा जाती उमंग हर दिल में !  





शुक्रवार, सितंबर 26

देवी का आगमन सुंदर

देवी का आगमन सुंदर



आश्विन शुक्ला नवरात्रि का
उत्सव अद्भुत कालरात्रि का
देवी दुर्गा महामाया का
राज राजेश्वरी, जगदम्बा का I

कल्याणी, निर्गुणा, भवानी
अखिल विश्व आश्रयीदात्री
वसुंधरा, भूदेवी, जननी
धी, श्री, काँति, क्षमा, स्मृति I

श्रद्धा, मेधा, धृति तुम्हीं हो
माता गौरी, दुःख निवारिणी
जया, विजया, धात्री, लज्जा
कीर्ति, स्पृहा, दया कारिणी I

चिन्मयी देवी पराम्बा तुम
उमा, पार्वती, सती, भवानी
ब्रह्मचारिणी, ब्रह्मस्वरूपिणी
सावित्री, शाकम्बरी देवी I

काली माँ, कपालिने अम्बा
स्वाहा तुम स्वधा कहलाती
विश्वेश्वरी, आनन्ददायिनी
शांतिस्वरूपा, आद्याशक्ति I

त्रिगुणमयी, करुणामयी, कमला
चण्डिका, शाम्भवी, सुभद्रा
हे भुवनेश्वरी, माता गिरिजा
मंगल दात्री, हे जगदम्बा!  

सिंह वाहिनी, माँ कात्यायनी
चंद्रघंटा, कुष्मांडा देवी
अष्टभुजा, स्वर्णमयी माँ
त्रिनेत्री तुम सिद्धि दात्री I

इच्छा, कर्म, ज्ञान की शक्ति
अन्नपूर्णा, इड़ा, विशालाक्षी
कोटिसूर्य सम काँति धारिणी
क्षेमंकरी, माँ शैलवासिनी  I

गूंजे घंटनाद व निनाद
नाश किये मुंड और चंड
कुंडलिनी स्वरूपा माता
महिषासुरमर्दिनी प्रचंड  I

शक्ति बिना हैं शिव अधूरे
सृष्टि के कार्य नहीं पूरे
ज्योतिर्मयी, जगतव्यापिनी
सजे मार्ग, मंदिर कंगूरे I

देवी का आगमन सुंदर
उतना ही  भव्य प्रतिगमन
जगह जगह पंडाल सजे हैं
करते बाल, युवा सब नर्तन I

  

      





रविवार, अप्रैल 27

काशी दर्शन

काशी दर्शन

काशी नगरी सबसे न्यारी, महादेव को है अति प्यारी
वरुणा-असी के मध्य बसी है, काशी में बसते त्रिपुरारी


गली-गली में मन्दिर अनुपम, पग-पग पर पूजा होती है
घाट-घाट पर तीर्थयात्री, कल्मष नित गंगा धोती है


काशी अति पुरातन नगरी, राजाओं की गाथा कहती
संतों का भी प्रिय स्थल है, भक्ति की धारा यहाँ बहती


कंकर-कंकर में काशी के, शंकर के दर्शन होते हैं
दुर्गा, काली, अन्नपूर्णा, माँ के अनगिन रूप यहाँ हैं


गंगा माँ की कृपा बरसती, ऐसा शुभ संयोग कहाँ है
 दूध-दही, मलाई का घर, भाषा मधुर लोग प्रेमी हैं


छप्पन भोग जहाँ लगते हों, कमी कहाँ अनुभव हो सकती
रात-रात भर चले कीर्तन, गुंजित घाट न काशी सोती


मणिकर्णिका, हरिश्चन्द्र भी, दो घाटों पर जलें चिताएं
जीवित तो पाते हैं आश्रय, मृतक भी सद्गति को पायें

दिन हो या घनघोर रात्रि, अविरत दाहकर्म चलता है,
जीवन जहाँ बना है उत्सव, मृत्यु का मेला लगता है


गंगा की चंचल लहरों में, पूर्ण चन्द्र के बिम्ब उभरते
 दीपदान के बहते दोने, चढ़ लहरों पर जगमग करते


छोटी-बड़ी नौकाएं शत-शत, मंथर गति से बहें नदी में
निशदिन डुबकी लेते जिसमें, यात्री तृप्त हुए अंतर में

सन्ध्या काल में सजे आरती, गीत, भजन, मन्त्रों का गायन
धूप, दीप, चन्दन, अगरु की, सुगंध लिए बहती है पवन


काशी महिमा कौन गा सके, अति गूढ़ है यहाँ की गाथा

अचरज से भर इसे निहारें, या झुक जाये प्रेम से माथा