सोमवार, सितंबर 28
मौसम का उल्लास समेटे
बुधवार, जुलाई 3
वृद्धता
वृद्धता
वृद्ध का सम्मान करता है जो
भाग्यशाली है वह समाज
क्योंकि अनुभवी है वृद्ध
उसने जिये हैं अच्छे और बुरे दोनों काल
उम्र के साथ पायी है परिपक्वता
उसने जाना है एक न एक दिन
हर सौंदर्य पड़ जाता है फीका
चूक जाता है बल देह का
जाना लिया है कि
हर इच्छा अंततः निराश ही करती
सुख का आश्वासन दे दे भले
पर जिसका वादा किया था
वह सुख नहीं देती
उसने जान लिया है
हर रिश्ता दुख में ले जाता है
वह साक्षी बन गया है
अपने ही स्वर्ग और नरक का
जो जिये थे उसने
अब वह उस जगह है जहां
कोई भी बात प्रभावित नहीं करती
एक तृप्ति छा गई है
मन-मस्तिष्क में
वह जानता है
मौसम बदलेगा
अंत, अंत नहीं एक नयी शुरुआत है
एक सुखद नींद है
जिसका जागरण
नये तन में होगा
क्योंकि शाश्वत है अस्तित्त्व
वृद्धता सुंदर है और शांत भी
आनंद और संतोष की ख़ुशबू से भरी
वह मित्र है
इसे भी उत्सव बनाना है
जीवन की हर अवस्था को
ज्ञान के रंगों से सजाना है !
सोमवार, मार्च 6
होली अंतर की उमंग है
होली अंतर की उमंग है
है प्रतीक वसंत जीवन का
यौवन का इंगित वसंत है,
होली मिश्रण है दोनों का
हँसते जिसमें दिग-दिगंत है !
रस, माधुर्य, सरसता कोमल
आशा, स्फूर्ति और मादकता,
होली अंतर की उमंग है
अमर प्रेम की परम गहनता !
जिंदादिल उत्साह दिखाते
साहस भीतर भर-भर पाते,
होली के स्वागत में ख़ुशियाँ
पाते उर में और लुटाते !
सुंदर, सुखमय सजे कल्पना
रंगों की आपस में ठनती,
मस्तक लाल, कपोल गुलाबी
मोर पंख सी चुनरी बनती !
कण-कण वसुधा का मुस्काए
फूलों से मन खिल-खिल जाते ,
लुटा रहा सुवास मौसम जो
चकित हुए नासापुट पाते !
हरा-भरा पुलकित उर अंतर
कण-कण में झलके वह सुंदर,
मधुरिम, मृदुलिम निर्झर सा मन
कल-कल करे निनाद निरंतर !
मादक पीयुष सी ऋतु होली
अमराई में कोकिल बोली,
जोश भरा उन्मुक्त हृदय ले
निकली मत्त मुकुल की टोली !
गुरुवार, फ़रवरी 2
मौसम का वर्तुल
शुक्रवार, नवंबर 18
यूँ ही कुछ ख़्याल
यूँ ही कुछ ख़्याल
दिल की गहराइयों में छिपा है जो राज
वह शब्दों में आता नहीं
जो ऊपर-ऊपर है
वह सब जानते ही हैं
उसे कविता में कहा जाता नहीं
तो कोई क्या कहे
इससे तो अच्छा है चुप रहे
लेकिन दिल है, हाथ है
कलम भी है हाथ में, इसलिए
चुप भी तो रहा जाता नहीं
मौसम के क़सीदे बहुत गा लिए
अब मौसम भी पहले सा रहा भी नहीं
बरसात में गर्मी और सर्दियों में
बरसात का आलम है
सारे मौसम घेलमपेल हो गए हैं
कब बाढ़ आ जाएगी कब सूखा पड़ेगा
कुछ भी तो तय रहता नहीं
शरद की रात चाँद निकला ही नहीं
खीर बनाने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता न तब
दिवाली की रात झमाझम बरसात हो रही थी
दीपक जलाते भी तो कैसे
जहाँ तालाब थे आज बंजर ज़मीन है
जहाँ खेत थे वहाँ इमारतों का जंगल है
दुनिया बदल रही है
धरती गर्म हो रही और
पीने के पानी का बढ़ा संकट है
कविता खो गयी है आज
वाहनों के बढ़ते शोर में
ट्रैफ़िक जाम में फँसा व्यक्ति
समय पर विवाह मंडप पहुँच जाए
इतना ही बहुत है
उससे और कोई उम्मीद रखना नाइंसाफ़ी होगी
वह प्रेम भरे गीत गाए और रिझाए किसी को
इन हालातों में यह नाकामयाबी होगी
अब तो समय से दोनों पहुँच जाएँ मंडप में
और निभा लें कुछ बरस तो साथ एक-दूजे का
और यही सही समय है इस कलम के रुकने का !
रविवार, नवंबर 13
जो जीवन हँसता था जग में
जो जीवन हँसता था जग में
कल डोल रहा था खुशियों में
अब गम की चादर ओढ़ी है,
हर सुख के पीछे दुःख आता
यह खूब बनायी जोड़ी है !
जब बादल से नभ ढक जाए
चन्दा सूरज भी घबराए,
फिर खिले चांदनी धूप उगे
तारामंडल भी मुस्काये !
जब जन्मा ढोल बजे घर में
फिर मातम इक दिन छाएगा,
जो जीवन हँसता था जग में
खामोश कहीं खो जायेगा !
जो दौड़ा फिरता था गतिमय
अब बेबस शैया पर लेटा,
यहाँ मौसम नित बदलते हैं
परिवर्तन ही सच जीवन का !
बस वही न बदले कभी यहाँ
देखा करता है जो जग को,
शून्य, पूर्ण, मौन, आनन्दमय
मन के भी पार एकरस वो !
शनिवार, फ़रवरी 12
तुम हो
तुम हो
तुम हो, तभी तो
फूल खिलते हैं
मौसम बहारों के
लौट आते
तितलियाँ मंडराती हैं और
कूजती है कोकिल अमराई में
सुना ना तुमने !
तुम हो, तभी तो
दूर कोई सितारा
टूट कर चमक दिखाता है
पपीहा राग सुनाता
प्रपात खिलखिलाता है
एक नज़र भर देखा
बादल बरस गया झूम कर
एक आवाज़ भर दी थी
सागर में लहरें उठीं
लिया चाँदनी को मुट्ठी में भर
तुम हो, तभी तो
जीवन में नया अर्थ खिलता है
तुम्हारे संग साथ से
यह जग
हर रोज़ नया होकर मिलता है !
शनिवार, अप्रैल 25
एक है दूजे के लिए
बुधवार, अक्टूबर 25
मौसम
सोमवार, जुलाई 28
जहाँ मौसम बदलते नहीं
ऐसा भी एक स्वदेश है


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