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शनिवार, सितंबर 9

इच्छाएँ

इच्छाएँ 


इच्छाएँ पत्तों की तरह उगती हैं 

मन के पेड़ पर 

कुछ झड़ जाती हैं आरम्भ में ही 

कुछ बनी रहती हैं देर तक 

कभी समाप्त नहीं होतीं 

यह एक सदानीरा नदी सी 

कल-कल करतीं शोर मचातीं 

जिसमें तरंगें उठती गिरती हैं निरंतर 

पत्तों को मूल का ज्ञान नहीं हो पाता

जिनसे वे पोषित हैं 

न तरंगों को हिमशिखरों का 

अंततः मूल भी पोषित होता है धरा से 

और हिमशिखर जल से 

पंच भूतों के पार क्या गया है कोई 

भूत भावन है जो शिव सोई 

शिवोहम् मंज़िल है 

हम रास्तों पर ही अटक रहे हैं 

प्रकाश सम्मुख है 

हम अंधेरों में ही भटक रहे हैं ! 


बुधवार, दिसंबर 28

शब्द तरंग


शब्द तरंग 

तरंग मात्र ही हैं शब्द 
आते हैं और चले जाते हैं 
हम ही हैं जो पकड़ लेते हैं उन्हें बीज की तरह 
और जमा देते हैं मन की धरती पर...
दर्द के फूल उगाने को
यदि बह जाये हर शब्द तरंग की तरह 
तो मन निशब्द में पा ही लेगा 
अव्यक्त को 
लहरियों में नृत्य को 
और हर भंवर में उस अनोखे लोक को 
जहाँ से चले आते हैं शब्द...

शुक्रवार, जुलाई 22

कबीरा खड़ा बाजार में


कबीरा खड़ा बाजार में

तन्हा नहीं है कोई जग में
 जात खुदा की सदा सँग है
मौला-मस्त बना फिरता है
 जिस पर उसका चढ़ा रंग है !

तोड़े गम से नाता अपना
 दिल में छायी बस उमंग है
पहन फकीरी बाना देखो
 बिन ही पिए चढ़ी तरंग है !

सारा जग है उसका अपना
 देख जमाना उसे दंग है
सदा बहाता प्रेम की धारा
 दिल है जैसे नीर गंग है !

सुलह कराना आदत उसकी
 जब भी जिसमें छिड़ी जंग है
दौलत सभी लुटाता फिरता
 जब दुनिया का हाल तंग है


शुकराना हर श्वास में करता
 जीने का यह नया ढंग है
जंगल-बस्ती घूमे जोगी, 
बनजारा या वह मलंग है !