शरद की एक शाम
भीगी-भीगी दूब ओस से
हरीतिमा जिसकी मनभाती,
शेफाली की मोहक सुवास
झींगुर गान संग तिर आती !
शरद काल का नीरव नभ है
रिक्त मेघ से, दर्पण जैसा,
दमक रहा संध्या का तारा
चन्द्र बना सौंदर्य गगन का !
हल्की हल्की ठंडक प्यारी
सन्नाटे को सघन बनाती,
पेड़ों, पौधों की छायाएं
उपवन रहस्यमयी बनातीं !
नन्हें नन्हें कुछ कीट दूब में
श्वेत पतंगे ज्योति खोजते,
नवरात्रि पूजा के मंत्र स्वर
छन के आते मंदिर पट से !
एक और आवाज गूंजती
नीरवता को भंग कर रही,
बिजली चली गयी लगती है
जेनरेटर की धुन बज रही !
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