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शुक्रवार, जुलाई 7

शरद की एक शाम

शरद की एक शाम


भीगी-भीगी दूब ओस से

हरीतिमा जिसकी मनभाती,

शेफाली की मोहक सुवास

झींगुर गान संग तिर आती !


शरद काल का नीरव नभ है

रिक्त मेघ से, दर्पण जैसा,

दमक रहा संध्या का तारा

चन्द्र बना सौंदर्य गगन का !


हल्की हल्की ठंडक प्यारी

सन्नाटे को सघन बनाती,

पेड़ों, पौधों की छायाएं

उपवन रहस्यमयी बनातीं !


नन्हें नन्हें कुछ कीट दूब में

श्वेत पतंगे ज्योति खोजते,

नवरात्रि पूजा के मंत्र स्वर

छन के आते मंदिर पट से !


एक और आवाज गूंजती

नीरवता को भंग कर रही,

बिजली चली गयी लगती है

जेनरेटर की धुन बज रही !


शनिवार, अप्रैल 8

मिलन

मिलन 

एक कदम बढ़ाओ तो  
वह हज़ार कदमों से चलकर आता है 

आवाज़ लगाने भर की देर है 

भेज देता है देवदूत सा कोई जन 

जिसका सान्निध्य 

शीतल जल और अग्नि एक साथ है 

जो जला डालता है सारे बंधन 

और मिटा देता उनकी राख भी

बहा निर्मल ज्ञान गंगा 

 खिल जाते हैं अंतरउपवन

प्रेम की पूर्णता के रूप में 

 उगता है चाँद

बिखरी है जिसमें

 शरद की ज्योत्सना   

बरसती हैं जल धाराएँ 

 सावन-भादों की 

मानो झर रही हो नभ से शांति और शुभता 

अनंत से मिलन का यही तो परिणाम है 

कि वह हर जगह है 

हिमालय की गुफाओं में ही नहीं 

अंतर गह्वर में भी, क्योंकि 

भीतर ही काशी है भीतर ही कैलाश !


गुरुवार, नवंबर 12

लो फिर आयी विमल दीवाली

 लो फिर आयी विमल दीवाली 

जगमग दीप जले पंक्ति में 

बन्दनवार लगे हर द्वारे 

सजी दिवाली महके जन पथ 

तोरण सजे गली चौबारे 

उठी सुगन्ध गुजिया, मोदक की 

वस्त्र नए देहों पर सरसर

लगी झालरें जली बत्तियां 

थाल सजे पूजा के मनहर 

सजे विनयाक, धान्य लक्ष्मी 

राग जगाती सुख बरसाती 

लो फिर आयी विमल दीवाली 

स्वच्छ हुए सबके घर आंगन 

भर उमंग से चहके सब मन 

कोमल भाव भरे अंतर में 

निकले बाल, युवा, सजधज कर 

नहीं अभाव सताता कोई 

देने का संकल्प जगा है 

दूर हुआ अँधियारा सारा 

रससिक्त हर भाव पगा है 

सुख की लहर उठी सागर में 

पावन पवन देवता बहते

दिग-दिगन्त में करुणा बसती

सूर्यदेव भी सुखमय लगते 

ऋतु मोहक माह शरद कार्तिक 

हरा रोग आरोग्य सफल है 

भारत भू का पर्व अनोखा 

ज्योतिपर्व यह अति मंगल है !


सोमवार, नवंबर 19

पारिजात क्यों झर जाते हैं






फूलों, रंगों, झरनों वाले, क्यों भाते हैं गीत
तू बसता है इनमें स्वयं ही, तू जो सबका मीत !


कुहू कुहू कूजन वूजन
सब तुझसे ही घटती है,
एक लोक है इससे सुंदर
सदा वहीं से आती है !

यह हल्की सी छुवन है तेरी
पत्तों की सरसर भी तुझसे,
शरद काल का नीला अम्बर
कहता तेरी गाथा मुझसे !

हरी कोंपलों पर किरणों की
 चमक रूप नए धरती है,
स्वर्णिम तेरा रूप अनोखा
छवि कैसी पुलक भरती है !

केसरिया, श्वेत तन वाले
पारिजात क्यों झर जाते हैं,
तेरे सुरभि कोष से लेकर
कतरे चंद बिखर जाते हैं !

धूप-छाँव का खेल अनोखा
दिवस-रात्रि का मेला अद्भुत,
तूने सहज रचा है प्रियतम
तू ही बदली तू ही विद्युत !  

गुरुवार, अक्टूबर 14

शरद की एक संध्या

शरद की एक साँझ

भीगी-भीगी दूब ओस से
हरीतिमा जिसकी लुभाती
शेफाली की मोहक सुरभि
झींगुर गान सँग तिर आती I

शरद काल का नीरव नभ है
रिक्त मेघ से, दर्पण जैसा
दमक रहा साँझ का तारा
चन्द्र बना सौंदर्य गगन का I

हल्की हल्की ठंडक प्यारी
सन्नाटे को सघन बनाती
पेड़ों, पौधों की छायाएं
उपवन रहस्यमयी बनातीं I

नन्हें नन्हें कीट दूब में
श्वेत पतंगे ज्योति खोजते
नवरात्रि पूजा मंगल स्वर
छन के आते मंदिर पट से I

एक और आवाज गूंजती
नीरवता को भंग कर रही
बिजली गुम हो गयी लगती है
जेनरेटर की धुन बज रही !

अनिता निहालानी
१३ अक्तूबर २०१०