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शुक्रवार, मई 20

ढाई आखर वाला प्रेम


ढाई आखर वाला प्रेम

‘ढाई आखर वाले’ उस प्रेम को पाने के लिये
इस प्रेम की गली से तो गुजरना ही होगा,
पर एक बार उस प्रेम को चखने के बाद
इस प्रेम का स्वाद भी बदल जायेगा
अभी तो मैल जमी है जिह्वा पर
माया के बुखार वाली
तभी बेस्वाद है जिंदगी
कभी भर जाता है मन कड़वाहट से
कभी कसैले लगने लगते हैं रिश्ते
कभी आंसुओं से भीग जाता है दामन
उस प्रेम को चखते ही..
बदल जाता है सब कुछ जैसे 
सब ओर वही प्रकाश भर जाता है
सबकी आँखों में भी झलकता है वही
उमड़ता है सहज स्नेह
छूट जाती हैं अपेक्षाएं
खो जाती हैं सारी मांगे
उस प्रेम की बाढ़ में
तिरोहित हो जाती है संकीर्णता
बहा ले जाता है सारा का सारा विषाद
एक ही साथ..
जन्म भर के लिये
वसंत छा जाता है भीतर !


अनिता निहालानी
२० मई २०११





गुरुवार, जनवरी 6

तुम्हारे कारण

तुम्हारे कारण

यह जीवन यदि सुंदर स्वप्न सलोना है, तो सिर्फ तुम्हारे कारण !
इस मन का हर ख्वाब यूँ ही सच होना है, तो सिर्फ तुम्हारे कारण !

बरसों बीते सँग सँग चलते, नया नया सा लगता हर दिन
कैसे कटता सफर अकेले, रहते कैसे हम तुम बिन
भरा हुआ भावों से इस दिल का हर कोना है, तो सिर्फ तुम्हारे कारण !

सहज प्रेम तुमने बरसाया, पूरा का पूरा अपनाया
भुला दिया सारी भूलों को, प्रतिपल नव विश्वास दिलाया  
नहीं कभी यह बंधन अब ढीला होना है, तो सिर्फ तुम्हारे कारण !

नयनों से कह दीं बातें, जब अधर कभी सकुचाए
दिल ने दिल का हाल सुना, जब श्रवण नहीं सुन पाए
इस उर को मुस्काना हर पल कभी नहीं रोना है, तो सिर्फ तुम्हारे कारण !

नहीं कुरेदा कमियों को, बस आदर्शों की ओर बढ़ाया
छूट गयी सारी अकुलाहट, सँग सँग हमने कदम उठाया
दो से एक बनें अब हर बार यही होना है, तो सिर्फ तुम्हारे कारण !

साथ तुम्हारा अनुपम तोहफा, कुदरत ने जो बख्शा
नहीं उऋन हो पायेगें, न होने की अभिलाषा
पाया जो भी शुभ हमने नहीं उसे खोना है, तो सिर्फ तुम्हारे कारण !

दीप दीप से जलता ऐसे, प्रेम से प्रेम उपजता
प्रेम तुम्हारा ही अंतर में, मेरा बन कर सजता
इसी प्रेम को हर क्षण तुम पर अब अर्पित होना है, तो सिर्फ तुम्हारे कारण !

आँखों की चमक, अधरों की हँसी, प्रेम का ही प्रतिबिम्बन
मनः ऊर्जा, कर्म की शक्ति, इसी प्रेम के कारण
हम दोनों के मध्य यही कोई और नहीं होना है, तो सिर्फ तुम्हारे कारण !

अनिता निहालानी
६ जनवरी २०११


मंगलवार, दिसंबर 28

ऐसा तो नहीं है

ऐसा तो नहीं है


ऐसा तो नहीं है,
कि भाव नहीं हैं
या कि शब्द नहीं हैं
बस कभी कभी वह लय की डोरी
नहीं मिलती
जिसमें पिरो डालें इन भावों और शब्दों को
रच डालें नया गीत !

ऐसा तो नहीं है
कि प्रेम नहीं है
या कि अश्रु नहीं हैं
बस कभी कभी वह अंतर की मूरत
खो जाती
जिस पर उड़ेल दें इन प्रेम भरे अश्रुओं को
मुक्त हो जाएँ देकर प्रीत !

ऐसा तो नहीं है
कि लगन नहीं लगी है
या कि विरह नहीं सताता
बस कभी कभी भीतर की तपन
शांत हो जाती
जिससे पिघल कर बहता नहीं मन
शुद्ध हो मनाएं जीत !

अनिता निहालानी
२८ दिसंबर २०१०

शुक्रवार, नवंबर 19

प्रेम

प्रेम

प्रेम ! एक पहाड़ी नदी
जो उदगम पर उफनती, शोर मचाती
उच्च प्रपात बन छलांग लगाती
खो जाती कभी गहन कन्दराओं में !

वैसे ही सिमट जाता
प्रेम ! मन की गुफाओं में
कभी विशाल धारा सम शांत
बहता, फिर हो जाता संकरा
पर सदा बना रहता
सदानीरा सा !

अमरबेल सा बसा रहता
दिल की गहराइयों में
कभी गुप्त, प्रकट कभी
प्रेम स्वयं में अपूर्ण है,
परम से मिलने तक !
जैसे नदी सागर मिलन से पूर्व !

अनिता निहालानी
१९ नवम्बर २०१०