प्रेम
कुछ भी नहीं जानते हम
जब यह जान लेते हैं,
जो भी हो चुका
वह पूर्व निर्धारित था
जो होने वाला है
वह है अभी हमारे हाथ में
यह मान लेते हैं !
यदि दृढ़ हो जिज्ञासा
और त्याग जीवन में आये
तब जीवन हर
कदम पर सिखाता !
एक धारा की तरह बहे
तभी निर्मल और स्वच्छ रहे
कर्म करते हुए
करते जाना है फल अर्पण
और…. संभव ही कहाँ?
प्रेम के बिना समर्पण !

सच है |
जवाब देंहटाएंनि: स्वार्थ समर्पण और निष्काम कर्म की नींव सिर्फ़ और सिर्फ़ प्रेम है। आहा क्या सुंदर सारगर्भित रचना है। बेहतरीन अभिव्यक्ति।
जवाब देंहटाएंसादर।
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नमस्ते,
आपकी लिखी रचना मंगलवार ८ सितम्बर २०२६ के लिए साझा की गयी है
पांच लिंकों का आनंद पर...
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