‘कुछ’ न होने में ही सुख है
‘कुछ’ होने की जिद
में अकड़ा
फिर-फिर दुःख को कर
में पकड़ा,
इक उलझन में हरदम
जकड़ा
क्यों न हो दिल टुकड़ा-टुकड़ा !
कुछ होकर भी देख
लिया है
कुछ भी जैसे नहीं
किया है,
तृषित अधर सागर पिया
है
दिल का दामन नहीं सिया है !
‘कुछ’ ना होने में
ही सुख है
मिट जाता जन्मों का
दुःख है,
मुड़ा जिधर समीर का
रुख है
सब उसका जो अंतर्मुख
है !
सब कुछ ही हो जाना
होगा
भेद हरेक मिटाना
होगा,
लब पर यही तराना
होगा
दिल तो वहीं लगाना
होगा !