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सोमवार, फ़रवरी 12

‘कुछ’ न होने में ही सुख है





‘कुछ’ न होने में ही सुख है 


‘कुछ’ होने की जिद में अकड़ा
फिर-फिर दुःख को कर में पकड़ा,
इक उलझन में हरदम जकड़ा
 क्यों न हो दिल टुकड़ा-टुकड़ा !

कुछ होकर भी देख लिया है
कुछ भी जैसे नहीं किया है,  
तृषित अधर सागर पिया है
 दिल का दामन नहीं सिया है !

‘कुछ’ ना होने में ही सुख है
मिट जाता जन्मों का दुःख है,
मुड़ा जिधर समीर का रुख है
सब उसका जो अंतर्मुख है !

सब कुछ ही हो जाना होगा
भेद हरेक मिटाना होगा,
लब पर यही तराना होगा
दिल तो वहीं लगाना होगा !

सोमवार, मई 29

आँसू बनकर वही झर गया


आँसू बनकर वही झर गया


दुःख की नगरी में जा पहुँचे,
निकले थे सुख की तलाश में, 
अंधकार से भरे नयन हैं  
खोल दिये जब भी प्रकाश में ! 

फूल जान जिसे कंठ लगाया, 
काँटे बनकर वही बिँध गया,  
अधरों पर जो मिलन गीत था 
आँसू बनकर वही झर गया !

तलविहीन कूआं था कोई 
 किया समर्पित हृदय जिस द्वार,
जहाँ उड़ेला भाव प्रीत का 
पाषाण की निकली दीवार ! 

स्वप्न भरे थे जिस अंतर में,
सूना सा वह बना खंडहर
बात बिगड़ती बनते-बनते, 
दिल में पीड़ा बहे निरंतर ! 


शुक्रवार, जुलाई 26

वह क्षण

वह क्षण

दूधिया प्रकाश सी.. झक सफेद
अधरों से छलकी
नयनों से बरसी
तुम्हारी हँसी जिस क्षण
थम गया है वह क्षण वहीं !

तुम्हें याद है
कुनमुनी आँखों से
खिड़की से झांकते
बाल सूर्य को तक
नूतन प्रकाश में
डूबे उतराए संग-संग क्षण भर
वहीं खड़ा है वह क्षण अब भी !

हजारों बल्बों का प्रकाश
 सिमट आया था
तुम्हारी आँखों में
खिल गये थे हजारों
गुलाब अधरों पर
मुझे याद है
क्योकि जिए थे हजारों जीवन
 उस एक क्षण में

वह कहीं नहीं गया है !