रौशनी बन झर रहा तू
चैन दिल का, सुकूं मेरा
प्रीत का सागर रहा है,
जहाँ रुकते कदम, झुकते
नयन, तेरा दर रहा है !
कहाँ जाना क्या पाना
तू ही मंजिल बन मिला है,
तेरे दम से छूट गम से
मन पंकज यह खिला है !
दीप जलते हैं हजारों
रौशनी बन झर रहा तू,
बह रहा बन एक दरिया
प्यास खुद की भर रहा तू !
नित लुटाता मोतियों सा
इक खजाना जिंदगी का,
खोल देता ख़ुशी-गम में
राज अपनी बन्दगी का !
