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रविवार, अगस्त 2

रौशनी बन झर रहा तू

रौशनी बन झर रहा तू


चैन दिल का, सुकूं मेरा 
प्रीत का सागर रहा है,
जहाँ रुकते कदम, झुकते 
नयन, तेरा दर रहा है !

कहाँ जाना क्या पाना 
तू ही मंजिल बन मिला है, 
तेरे दम से छूट गम से 
मन पंकज यह खिला है !

दीप जलते हैं हजारों 
रौशनी बन झर रहा तू, 
बह रहा बन एक दरिया 
प्यास खुद की भर रहा तू !

नित लुटाता मोतियों सा 
इक खजाना जिंदगी का, 
खोल देता ख़ुशी-गम में 
राज अपनी बन्दगी का !