पंच तत्व पावन हैं
अश्रु की बाढ़ आयी
आज गगन रोता है,
खेत, गाँव, नदी, विजन
सभी को डुबोता है !
क्या भू की पीड़ा ही
वाष्पित हो नहीं उठी,
कण-कण बीमार हुआ
जलवायु विषाक्त बनी !
विष घुला पानियों में
हवा हुई धुँआ-धुँआ,
मनुज की लालसा ने
आसमानों को छुआ !
पशुओं का आश्रय भी
लील गया लोभ दैत्य,
बाँध तोड़ बिखर गयी
वसुधा की पीड़ा यह !
स्वच्छ बने आँचल अब
पुनःनव सृष्टि रचाए,
मानव फिर एक बार
अमरता पथ दिखाए !
पंच तत्व पावन हैं
सादर सुसम्मान हो,
अपने ही हाथों ना
स्वयं का अवमान हो !
