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बुधवार, सितंबर 2

पंच तत्व पावन हैं

पंच तत्व पावन हैं 

 

अश्रु की बाढ़ आयी 

आज गगन रोता है, 

खेत, गाँव, नदी, विजन  

सभी को डुबोता है !

 

क्या भू की पीड़ा ही 

वाष्पित हो नहीं उठी, 

कण-कण बीमार हुआ 

जलवायु विषाक्त बनी !

 

विष घुला पानियों में 

हवा हुई धुँआ-धुँआ,

मनुज की लालसा ने 

आसमानों को छुआ !

 

पशुओं का आश्रय भी 

लील गया लोभ दैत्य,  

बाँध तोड़ बिखर गयी 

वसुधा की पीड़ा यह  !

 

स्वच्छ बने आँचल अब  

पुनःनव सृष्टि रचाए,

मानव फिर एक बार 

अमरता पथ दिखाए  !

 

पंच तत्व पावन हैं 

सादर सुसम्मान हो, 

अपने ही हाथों ना  

स्वयं का अवमान हो !