जाने किसने निज वैभव से
सुख सागर में ले हिचकोले
मनवा धीरे-धीरे डोले,
कहाँ से पायी मस्ती मद की
राज न लेकिन कोई खोले !
नहीं जानता शायद खुद भी
रस की गगरी कौन पिलाये,
रहे ठगा सा, भर कर आंचल
नेह की बरखा में नहलाये !
नजर नहीं मिली अभी जिससे
उसके ही संदेसे आते,
हर लेते हर उलझन उर की
मधुर रागिनी बन गुंजाते !
मन जो बिखरा-बिखरा सा था
उसे समेट पिरोई माला,
जाने किसने निज वैभव से
प्रीत के घूँट पिलाकर पाला
!
