गुरुवार, फ़रवरी 5

शाहों का शाह था

शाहों का शाह था 


अपनी ही छाया से अक्सर डर जाता 

उससे बढ़ भीरु कोई नजर नहीं आता 

 

सपनों पर भरोसा करे आँख मूँद कर

सत्य से हमेशा दूर-दूर भाग जाता 

 

जाने किस आस में दौड़ता ही जा रहा

पाँव तले कौन दबा देख नहीं पाता  


बंधन हजारों बाँधे रिस रहे घाव से

झूठी मुस्कान पहन खूब खिलखिलाता 


कौन बढ़े, नाम करे, किसका गुणगान हो?

झाँके जब ह्रदय में कोई नहीं पाता  


छाया का झूठ कभी नजर आये भी जब 

मगरूरी की आड़ में उसको छुपाता 

 

शाहों का शाह था जाने क्यों भूल गया

कतरा भर ख़ुशियों हित जिन्दगी लुटाता 

 




5 टिप्‍पणियां:

  1. मन में जब किये का भय जाग जाता है
    नींद,चैन,सुख से दूर बैचेन उर अकुलाता है।
    सादर।
    ----++--
    जी नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना शुक्रवार ६ फरवरी २०२६ के लिए साझा की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं।
    सादर
    धन्यवाद।

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    उत्तर
    1. सही कहा है आपने श्वेता जी, कर्म ही भाग्य का निर्माण करते हैं, बहुत बहुत आभार!

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