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मंगलवार, अप्रैल 28

ठहरा मन उपवन प्रशांत है

ठहरा मन उपवन प्रशांत है 


छायी भीतर नीरव छाया 

 कब बिगाड़ पाती कुछ माया, 

ठहरा मन उपवन प्रशांत है 

छाया में विमल एकांत है !


उहापोह न शेष रही चाह 

मिली हरियाले वन में राह, 

छल-छल छलकें सोते जल के

बरस मेघ नीर नेह ढलके ! 


 भीतर छायी नीरव  छाया 

 कुछ बिगाड़ पाती कब माया,

मौन मुखर हो उस छाया में 

कहीं सुर वीणा, मृदंग बजे !


 नाद अनोखा अनुपम प्रकाश 

मिल जाये, है जिसकी तलाश, 

थम श्वास मंत्र कोई गाये 

कुदरत का हर रंग लुभाये !



 


 

गुरुवार, फ़रवरी 5

शाहों का शाह था

शाहों का शाह था 


अपनी ही छाया से अक्सर डर जाता 

उससे बढ़ भीरु कोई नजर नहीं आता 

 

सपनों पर भरोसा करे आँख मूँद कर

सत्य से हमेशा दूर-दूर भाग जाता 

 

जाने किस आस में दौड़ता ही जा रहा

पाँव तले कौन दबा देख नहीं पाता  


बंधन हजारों बाँधे रिस रहे घाव से

झूठी मुस्कान पहन खूब खिलखिलाता 


कौन बढ़े, नाम करे, किसका गुणगान हो?

झाँके जब ह्रदय में कोई नहीं पाता  


छाया का झूठ कभी नजर आये भी जब 

मगरूरी की आड़ में उसको छुपाता 

 

शाहों का शाह था जाने क्यों भूल गया

कतरा भर ख़ुशियों हित जिन्दगी लुटाता 

 




शनिवार, मार्च 29

पल-पल बरसे वह चाहत है

पल-पल बरसे वह चाहत है


हर फूल यहाँ जो खिलता है 

हर गीत उसी की नेमत है, 

यदि रोके ना कोई रस्ता 

पल-पल बरसे वह चाहत है !


रंगों के पीछे छिपा हुआ 

शब्दों का स्रोत वही तो है, 

भावों की भाषा पढ़ सकता 

नीरवता मौन वही तो है !


महिमावान नहीं वह केवल 

माधुर्य से ओतप्रोत है, 

करुणावान नहीं दिल उसका 

अतिशय स्नेह से युक्त भी है !


छाया बन संग-संग डोले 

धरा वही आकाश भी बना, 

राज छुपाना जितना चाहे 

 रहा कहाँ कोई राज छिपा !


मंगलवार, अगस्त 20

सुधि

सुधि   


छाया बना प्रतिक्षण डोले 

स्मरण तुम्हारा बंधन खोले, 

जब से जीवन का स्पर्श हुआ 

कण-कण हँसकर जैसे बोले !


मेरे कदमों की ये छापें 

कितनी मिलतीं उन कदमों से, 

मेरे शब्दों का ज़िद्दीपन 

कितना मिलता तेरी ज़िद से !


मन के हरियाली आँगन में 

पंछी तो है तेरे वन का, 

मन के उजियाले दर्पण में 

अंकन तो है तेरे मन का !


मन मेरा है सोचें तेरी 

दृग मेरे में सूरत तेरी, 

दिल मेरा है साँसें तेरी 

अधरों ऊपर बातें तेरी !


तेरी आँखों का सूनापन 

मेरे सपनों की सच्चाई, 

मन के मतवाले सागर  में 

किश्ती डोले तेरी सुधि की !


बुधवार, अप्रैल 24

नयन स्वयं को देखते न

नयन स्वयं को देखते न 


हम हमीं को ढूँढते हैं 

पूछते फिरते कहाँ हो ?

हम हमीं को ढूँढते हैं 

पूछता ‘मैं’ ‘तुम’ कहाँ हो ?


खेल कैसा है रचाया 

अश्रु हर क्योंकर बहाया, 

नयन स्वयं को देखते न 

रहे उनमें जग समाया !


अस्त होता कहाँ दिनकर 

डोलती है भू निरंतर, 

देह-मन को करे जगमग 

आत्मा सदा दीप बन कर !


प्रश्नवाचक जो बना है

पूछता जो प्रश्न सारे

भावना से दूर होगा 

दर्द जो अब भरे आहें !


जो नचाती, घेरती भी  

एक छाया ही मनस की, 

दूर ले जा निकट लाती 

लालसा जीवन-मरण की !


‘तू’ छिपा मुझी  के भीतर 

‘मैं’ मिले ‘तू’ झलक जाये 

एक पल में हो सवेरा 

भ्रम मिटाकर रात जाये !


मंगलवार, अप्रैल 4

मन - छाया


मन - छाया


छायाओं से लड़कर कोई 

जीत सका है भला आजतक 

सारी कश्मकश 

छायाएँ ही तो हैं 

उनके परिणामों से बंधे 

हम जन्म-जन्म गँवा देते हैं 

ज़रूरत है प्रकाश में खड़े होने की 

तब न कोई कारण है न परिणाम 

न कोई चाहत न अरमान 

मन को ख़ाली करना ही 

ज्योति की शरण में आना है 

सारा उहापोह जो न जाने 

कब से एकत्र किया है भीतर 

इसके-उसके,  

अपनों-बेगानों, 

दुनिया-जहान और 

खुद की कमज़ोरियों के प्रति 

सभी छायाएँ हैं मात्र 

जिन्हें सच मान बैठा है मन 

सच करुणा व प्रेम का वह स्रोत है 

जो प्रकाश से झरता है 

सहज आनंद का स्वामी 

जहाँ निर्द्वंद्व बसता है 

जो शिव का वास है 

वही तो देवी का कैलाश है !


शनिवार, जनवरी 21

वही मार्ग में संबल बनती


वही मार्ग में संबल बनती


मुख मोड़ा जब-जब प्रकाश से 

हर दुःख इक छाया सा मिलता,

परछाई इक सँग हो लेती 

तज खुद को जब जग को देखा !


बाधा जो सम्मुख आती है 

उसकी भी छाया बनती है,

कभी विषाद, विकार कभी बन  

माया बन जो गहराती है !


ज्योति का इक स्रोत है भीतर 

हम उससे मुख मोड़े रहते, 

पीठ किये इस झिलमिल करते

जग में विचरण करते रहते !


छायाएँ जब मिल आपस में 

नित्य नवीन  रूप धरती हैं, 

कुछ अभिनव कुछ भीत बढ़ातीं 

सदा साथ मन बन रहती हैं !


थम जाए यदि पल भर कोई 

मुड़ कर देखे स्वयं  स्रोत को, 

मन खो जाता तत्क्षण  जैसे 

चकित हुआ सा देखे खुद को !


सदा एक रस सदा साथ है 

ज्योति विमल  जो दिपदिप करती, 

जाने या ना जाने कोई 

वही मार्ग में संबल बनती !


शुक्रवार, अप्रैल 23

दीप आरती का जब जगमग

दीप आरती का जब जगमग

छायाओं के पीछे भागे 

जब सच से ही मुख मोड़ लिया, 

जीवन का जो सहज स्रोत था  

शुभ नाता उससे तोड़ लिया !


अर्ध्य चढ़ाते थे रवि को जब  

जुड़ जाते थे परम स्रोत से, 

तुलसी, कदली को कर सिंचित 

वृंदावन भीतर उगते थे !


कर परिक्रमा शिव मंदिर की 

खुद को भी तो पाया होगा,

दीप आरती का जब जगमग 

आत्म ज्योति को ध्याया होगा !


किन्तु बनाया साधन उनको

जो स्वयं में हैं अनुपम साध्य, 

नित्यकर्म का सौदा करके 

कहते भजा तुझको आराध्य !


यह तो जीवन का उत्सव  था 

ना यह  कला मांगने की थी ,

शुभ सुमिरन से मान मिलेगा 

ऐसी लघु बुद्धि तो नहीं थी !


जग छाया है कहाँ मिलेगी 

जबकि मन उजियार से प्रकटा, 

अंधकार के पाहन ने ही 

मार्ग सहज उजास का रोका !


 

शुक्रवार, दिसंबर 27

शाहों का शाह था

शाहों का शाह था 

अपनी ही छाया से अक्सर डर जाता है
भीरु उससे बढ़ कोई नजर नहीं आता है

स्वप्न पर विश्वास करे जो आँख मूंद कर
सत्य से सदा दूर-दूर भाग जाता है

जाने किस आस में दौड़ता ही जा रहा
पाँव तले क्या दबा देख नहीं पाता है

बंधन हजार बांधे रिस रहे घाव से
झूठी मुस्कान पहन खूब खिलखिलाता है

कौन बढ़े नाम करे किसका गुणगान हो
झांके यदि मानस में कोई नहीं पाता है

छाया का झूठ जब कभी नजर आये भी
मद की आड़ में उसको छुपाता है

शाहों का शाह था जाने क्यों भूल गया
कण भर ख़ुशी हित जिन्दगी लुटाता है


शुक्रवार, जुलाई 6

अपनी ही छाया डसती है


अपनी ही छाया डसती है

ज्यों अपनी ही छाया
ढक लेती है सम्मुख मार्ग को
जब चल पड़ते हैं हम
प्रकाश से विमुख होकर !

वैसे ही विचार
भाव से विमुख हुआ यदि  
स्वयं के आग्रहों से होता है ग्रसित
कोई नहीं है अन्य
 कोई भी नहीं
जो हो मित्र होने को उत्सुक
तो शत्रु होने की कौन कहे...?
सब कैद हैं अपनी ही छायाओं में...

हर पल जब
स्वछन्द होता है विचार
बुनियाद रख रहा होता है
एक नए संघर्ष की
जो लड़ा जायेगा भविष्य में
 जिसका भागी होना होगा स्वयं को
और देह को भी भुगतना होगा दंड
जब जब आक्रामक होगा
चाहेगा मान
खोदता ही जायेगा गढ्ढे
जिसमें गिरने ही वाला है भविष्य में
भाव की ओर मुख किया विचार
प्रकाशित होता है
कोई छाया उसके सम्मुख नहीं पड़ती
खो जाता है अनंत की आभा में...