शिवालय
कोई कहता है
शिव के भीतर प्रेम है
जैसे कि शिव और प्रेम हों
दो अलग-अलग वस्तुएँ
असल में प्रेम ही शिव है
जब भीतर जागता है प्रेम
मन ख़ाली हो जाता है
सारे भेद मिट जाते हैं
श्वासें गढ़ती भीतर
वह मंदिर
जिसमें शिव विराजमान होते
पूरक देह में स्थान बनाती
रेचक मन की थिरता को दृढ़ करती
पूरक है आत्मा का जीवन
रेचक संसार का
दोनों के मध्य
शिव का वास है
जो उसमें जागेंगे
वे जानेंगे !
प्रेम और शिव का जागरण अत्यन्त सुन्दर
जवाब देंहटाएंस्वागत व आभार!
हटाएंसुंदर
जवाब देंहटाएंस्वागत व आभार!
हटाएंजी हाँ अनिता जी। शिव और प्रेम पृथक् नहीं।
जवाब देंहटाएंस्वागत व आभार!
हटाएंशिव सनातन है प्रेम है नाद है अभिव्यक्ति है ... शिव ही सत्य है ...
जवाब देंहटाएंस्वागत व आभार!
हटाएंसुन्दर रचना
जवाब देंहटाएंस्वागत व आभार!
हटाएंरेचक मन की थिरता को दृढ़ करती
जवाब देंहटाएंपूरक है आत्मा का जीवन
वाह! 🙏🏼
स्वागत व आभार!
हटाएंबहुत सुंदर रचना
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