प्रेम रहेगा कैसे मन में
जब ना कोई घर में रहता
तब चुपके से कान्हा आता,
नवनीत चुरा मटका तोड़े
गोपी का हर दुख मिट जाता !
द्वार खुला ही छोड़ गई थी
निशदिन उसकी राह देखती,
उसका होना ही बाधा था
कैसे वह यह बात बूझती !
वह रहती या रहता कान्हा
दोनों नहीं समाते घर में,
नील गगन सा जो विशाल है
प्रेम रहेगा कैसे मन में !
अलग कहाँ थी वह कान्हा से
जैसे दिल के भीतर झाँका,
वही प्रीत-संगीत, नृत्य था
ग्वाल-बाल बना वही बाँका !

वाह,! सही कहा,
जवाब देंहटाएंउसका होना ही बाधा था
कैसे वह यह बात बूझती !
बहुत सुंदर🙏🙏
स्वागत व आभार आपका!
हटाएंइस टिप्पणी को एक ब्लॉग व्यवस्थापक द्वारा हटा दिया गया है.
जवाब देंहटाएंसच में आपकी ये कविता पढ़कर एकदम अलग ही सुकून मिला। आपने कान्हा और प्रेम को जिस तरह जोड़ा, वो बहुत सहज और गहरा लगा। मुझे सबसे ज्यादा वो लाइन छू गई जहाँ आपने कहा कि दोनों एक साथ घर में नहीं समाते, क्योंकि वही बात अंदर तक उतरती है। आपने भक्ति को बोझ नहीं बनाया बल्कि उसे प्यार और अनुभव की तरह रखा, और यही इसे खास बनाता है।
जवाब देंहटाएंकविता के मर्म को समझते हुए सुंदर प्रतिक्रिया हेतु आभार!
हटाएंआपकी लिखी रचना "पांच लिंकों के आनन्द में गुरुवार 26 मार्च, 2026 को लिंक की जाएगी .... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ... धन्यवाद!
जवाब देंहटाएंबहुत बहुत आभार दिग्विजय जी!
हटाएंसुंदर
जवाब देंहटाएंस्वागत व आभार!
हटाएंवाह !!!!
जवाब देंहटाएंअत्यंत मनभावन सृजन ।
उसका होना ही बाधा था
कैसे वह यह बात बूझती
चिंतनपरक...
स्वागत व आभार सुधा जी !
हटाएंबहुत अच्छी और सुंदर रचना
जवाब देंहटाएंबधाई
स्वागत व आभार!
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