ठहरा मन उपवन प्रशांत है
छायी भीतर नीरव छाया
कब बिगाड़ पाती कुछ माया,
ठहरा मन उपवन प्रशांत है
छाया में विमल एकांत है !
उहापोह न शेष रही चाह
मिली हरियाले वन में राह,
छल-छल छलकें सोते जल के
बरस मेघ नीर नेह ढलके !
भीतर छायी नीरव छाया
कुछ बिगाड़ पाती कब माया,
मौन मुखर हो उस छाया में
कहीं सुर वीणा, मृदंग बजे !
नाद अनोखा अनुपम प्रकाश
मिल जाये, है जिसकी तलाश,
थम श्वास मंत्र कोई गाये
कुदरत का हर रंग लुभाये !
सराहनीय।
जवाब देंहटाएंआपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" बुधवार 29 अप्रैल 2026 को साझा की गयी है......... पाँच लिंकों का आनन्द पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!
जवाब देंहटाएंअथ स्वागतम शुभ स्वागतम