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गुरुवार, अगस्त 20

सत-रज-तम का खेल है सारा

सत-रज-तम का खेल है सारा 


कौन हमारा, कौन पराया 

इसका पता लगाया जाये, 

तन-मन दिखे, अगोचर आत्मा  

किसका ध्यान लगाया जाये?


तन यह माटी, मन पानी सा 

दोनों आते-जाते रहते, 

आत्म ज्योति से टिके हुए हैं 

जिससे हम अनजाने रहते !


मन के पीछे चलता है तन 

तन की सेवा में रहता मन, 

सेवक बाहर, मालिक भीतर 

कैसे पूर्ण लगेगा जीवन ! 


पहले उससे प्रीत बढ़ा लो 

जो मन के उस पार का वासी, 

खिल जाएँगे उपवन मन में 

छँट जाएगी घोर उदासी !


सत-रज-तम का खेल है सारा 

तन-तम, मन-रज खेल रहे हैं, 

सत आत्मा की बात न करते 

व्यर्थ ही दुविधा झेल रहे हैं ! 


दोनों का अवसान है सत में 

मध्यम मार्ग शाश्वत निरंजन, 

सत के भी जो पार गया है 

बन जाता है वही चिरंतन !


शुक्रवार, जुलाई 10

शिवालय

शिवालय 


कोई कहता है 

शिव के भीतर प्रेम है 

जैसे कि शिव और प्रेम हों

 दो अलग-अलग वस्तुएँ 

असल में प्रेम ही शिव है  

जब भीतर जागता है प्रेम 

मन ख़ाली हो जाता है 

सारे भेद मिट जाते हैं 

श्वासें गढ़ती भीतर 

वह मंदिर

 जिसमें शिव विराजमान होते
पूरक देह में स्थान बनाती  

रेचक मन की थिरता को दृढ़ करती 

पूरक है आत्मा का जीवन

रेचक संसार का 

दोनों के मध्य 

शिव का वास है 

जो उसमें जागेंगे 

वे जानेंगे !

 

गुरुवार, मई 14

सागर सी आत्मा

सागर सी आत्मा 


दिन-रात 

सागर में लहरें उठती हैं 

फेन, बुदबुदे, तरंगें 

सभी तो जल हैं !

आत्मसिन्धु में वृत्तियाँ 

भाव, विचार, कल्पनाएँ 

सभी तो ऊर्जा हैं !!


सागर अपनी गरिमा में रहता है 

जल भी तत्वतः वैसा का वैसा, 

आत्मा स्वयं में प्रतिष्ठित 

ऊर्जा अपरिवर्तित ।


लहरें बाहर से नहीं आयी 

सागर का ही विवर्त हैं !

आत्मा निरंजन है 

मन मात्र विवर्त है !!


सोमवार, अप्रैल 13

बैसाखी की आत्मा

बैसाखी की आत्मा 


फसल पक गई जब खेतों में 

बगिया में रस घट भर आये, 

मधुर पताशों की लज्जत  का 

सुमिरन अंतर में हो आये !


खालिस शिष्य बनाये इस दिन 

पंथ खालसा तभी कहाया, 

अपने धर्म की रक्षा हेतु 

हाथों में कृपाण उठवाया !


  मिटा दिये थे भेदभाव सब

अनंतपुर ने दी थी साखी, 

  तलवार बनी, ढाल भीरु की

  बन  प्रेरक आयी गुरु वाणी !

 

 लेकर पाँच विकार के पार

अन्याय का विरोध सिखाता, 

बैसाखी का गीत-संगीत

गुरु गोविंद की सुध दिलाता ! 

 

गुरुवार, अप्रैल 9

भव सागर का कूल किनारा

भव सागर का कूल किनारा


 परम एक था ! निपट अकेला 

उपजा जिससे जगत पसारा, 

 ढूँढ रहा हर कोई जिसमें 

भव सागर का कूल किनारा ! 


 दिखता नहीं दूसरा कोई

कितना खोजा युगों-युगों से। 

 बना जीव वही, वही आत्मा 

खुद को ढूँढे है सदियों से !


कैसा आना, कैसा जाना, 

 बसा हुआ है जो कण-कण में, 

कैसे हुआ अनेक एक से 

बिना किसी भी उपादान के !


 बोध आत्मा का करें किस विधि

कहाँ उस आनंद को पाएँ, 

  उपजी है जिस स्रोत से सृष्टि

कैसे लौट वहाँ घर जायें !

 

रविवार, नवंबर 2

पाया नहीं पार कुछ

पाया नहीं पार कुछ 

खूब मथा, बिलोया खूब
निकला न सार कुछ 

दूध नहीं पानी था !! 

खूब धुना, काता खूब
निकला न धागा कुछ 

कपास नहीं काठ था !!

खूब ढूँढा खोजा खूब
निकला न माल कुछ 

चाँदी नहीं सीप था !!

खूब डरा उछला खूब
 ना था आधार कुछ 

साँप नहीं रस्सा था !!

खूब चला दौड़ा खूब
गया पर कहीं नहीं 

आत्मा नहीं अहम् था !!

खूब पढ़ा सुना खूब
पाया नहीं पार कुछ 

बुद्धि नहीं मन था !!

रविवार, जून 22

सपना और संसार

सपना और संसार 

उनकी सांसें आपस में घुल गयी हैं
मन भी हर क्षण जुड़ता है
और अब पकड़ इतनी मजबूत हो गयी है कि
दुनिया की बड़ी से बड़ी तलवार भी इसे काट नहीं सकती
कोई किसी को यूँ ही नहीं सौप देता
अपना आप, अपनी आत्मा
प्यार के अनमोल खजाने को पाकर ही 
अपना सब कुछ खाली कर दिया है
किसी के नाम लिख दिया है मन को
फिर सपने सा क्यों लगता है कभी–कभी संसार
शायद इसलिए कि यहाँ सब कुछ बदलने वाला है

गुरुवार, जून 19

ऊर्जा

ऊर्जा 


ऊर्जा बहुत है, कर्म  कम 

ऊर्जा अहंकार बन जाएगी 

ऊर्जा कम है, कर्म अधिक 

ऊर्जा तनाव बन जाएगी 


ऊर्जा अति है कर्म भी अति 

ऊर्जा संतुष्टि बन जाएगी 

ऊर्जा अनंत है कर्म अति या अल्प

ऊर्जा आनंद बन जाएगी 


अधिक हो धन-दौलत तो 

अभिमानी हो जाता है आदमी 

कम हो धन तो तनाव से भर जाता है 

संपन्नता भी हो और श्रम भी जीवन में 

संतोष से भर जाता है 

किंतु धन बेहिसाब हो फिर भी 

 सदा खुश नहीं रह पाता 

इसलिए ऊर्जा क़ीमती है धन से 

ऊर्जा अर्थात आत्मा 

आत्मा अर्थात परमात्मा 

परमात्मा अर्थात सत्य, प्रेम और शांति ! 


बुधवार, जनवरी 15

राम में विश्राम या विश्राम में राम

राम में विश्राम या विश्राम में राम


भीग जाता है अंतर 

जब उस एक के साथ एक हो जाता है 

समाप्त हो जाती है 

कुछ होने, पाने, बनने की दौड़ 

जब हर साध उठने से पहले ही 

हो जाती है पूर्ण 

कुछ होने में अहंकार है 

कुछ न होने में आत्मा 

कुछ पाने में भय है खो जाने का 

छोड़ने में आनंद 

कुछ बनने में श्रम है 

 जो हैं उसमें विश्राम 

और विश्राम में है राम 

तब राम ही मार्ग दिखाते हैं 

पथ जीवन का सुझाते हैं 

ध्यान में मिलते 

जीवन में संग उन्हें पाते हैं 

संत जन इसी लिए एक-दूजे को 

‘राम राम जी’ कहकर बुलाते हैं ! 


शुक्रवार, जनवरी 3

आत्म सूर्य

आत्म  सूर्य 


तप में लीन है सूर्य 

किसी तापस सा 

अथवा 

एक यज्ञ चल रहा है अनवरत 

सूर्य की सतह पर !


ऊर्जाएँ बन रही हैं  

बदल रही हैं 

सारे ग्रह, धरा और चन्द्र 

जो कभी उसके अंश थे 

अब एक परिवार की तरह 

उसके अनुयायी हैं !


शीतल हैं 

चाँद की किरणें 

धरा को पोषित करतीं 

 जगा जाते हैं सूर्य के हाथ

भूमि की संतानों को !

    उसी ज्योति का प्रसाद 

पंछियों का कलरव    

और जल का कलकल भी 

सारे तत्व उसी की देन हैं !


आत्मा सूर्य है 

मन चंद्रमा, धरती देह 

आत्मा पोषित करती है 

देह को अदृश्य हाथों से 

मन का द्वन्द्व 

वहीं से आया है !

 तप करके 

 ही कर सकती है 

आत्मा उस विश्व का निर्माण 

जो न्यायपूर्ण हो !


सोमवार, अक्टूबर 7

असली नवरात्रि

असली नवरात्रि 


कामना जगी तो

 धुआँ-धुआँ कर देती है भीतर 

अग्नि आत्मा की बुझ जाती है 

बुझती नहीं तो छुप जाती है !


हर चाह मन के दर्पण पर 

चिपक जाती है 

धूल की परत बन कर 

झलक आत्मा की खो जाती है 

खोती नहीं तो ढक जाती है !


आत्मा का सूरज जहाँ चमकता है 

वहाँ पारदर्शी होता है मन 

अग्नि प्रज्ज्वलित होती है 

पूरे वैभव में 

इच्छा की सुलगती लकड़ियाँ 

कोई धुआँ नहीं देती 

सारे बीज सुख गये होते हैं संस्कारों के 

जो तड़-तड़ कर जलते हैं !


देदीपम्यान होता है भीतर का आकाश 

और यही लक्ष्य है हर मानव का 

फिर भी ख़ुद को भरमाते हैं 

लड़ते और लड़वाते हैं 

माँ को सौंप दें सारी आकांक्षाएँ 

असली नवरात्रि तभी तो मनेगी 

दिल की बगिया 

फिर-फिर खिलेगी !  


शनिवार, अगस्त 31

जागरण

जागरण 


रात ढलने को है 

झूम रहा हर सिंगार हौले-हौले 

बस कुछ ही पल में 

हर पुष्प डाली से झर जाएगा 

श्वेत कोमलता से 

धरा का आँचल भर जाएगा 

कुनमुनाने लगे हैं पंछी बसेरों में 

दूर से आ रही कूक 

सूने पथ पर कदम बढ़ा रहे  

मुँह अंधेरे उठ जाने वाले 

उषा मोहक है 

उसकी हर शै याद दिलाती  

उस जागरण की 

जब चिदाकाश पर उगने को है

आत्मा का सूरज 

कुछ डोलने लगा है भीतर 

और झर गई हैं अंतर्भावनाएँ 

उसके चरणों में 

 गूँजने लगा है कोई गीत

 सहला जाता है अनाम स्पर्श

विरह की अग्नि में तपे उर को 

 भोर की प्रतीक्षा में 

यह अहसास होने लगा है 

एक दिन ऐसी ही होगी 

अंतर भोर !



बुधवार, जुलाई 19

आत्मा का फूल


आत्मा का फूल 

जहां प्रमाद है वहाँ अहंकार है 

जहां अहंकार है वहाँ प्यार नहीं 

जहां प्यार नहीं वहाँ राग-द्वेष है 

अर्थात वे दो असुर 

जिन्होंने देवों का धरा वेश है 

राग प्रिय से बाँधता है 

द्वेष अप्रिय से बचना चाहता है 

पर हर बंधन दुःखदायी है 

और बचने की कामना ही 

और जोरों से बाँधती आयी है

जिसे पकड़ा है 

वह छूट जाता है 

जिसे छोड़ना चाहा 

वह बना रहता है मन में 

इन असुरों का अंत किए बिना 

प्रेम का राज्य नहीं मिलता 

और प्रेम के बिना 

आत्मा का फूल नहीं खिलता !