शनिवार, सितंबर 12

लोक चेतना में बसते हैं

गणपति उत्सव 


श्रीगणेश कारण हैं सबके 

मिट्टी, गोबर से भी रच लो, 

दूर्वा का तिनका कर अर्पण  

छोटा सा मोदक ही धर दो !


बहुत सरल, शुभता के दाता 

कर्ण विशाल व आँखें गहरी,

ज्ञानी, बली  नृत्य भी जानें 

सब कलाओं के हैं पारखी !


एक मुक्त आकाश की भाँति 

गणपति प्रेम का बाना ओढ़े, 

सुखकर्ता, दुखहर्ता, पालक

 बन कर आते अतिथि अनोखे !

  

लोक चेतना में बसते हैं 

एक अनूठा हर्ष जगाते, 

भेद भावना तज कर सारे 

छोटे-बड़े सभी मिल गाते ! 


मोदक भाते गणनायक को 

है आमोद-प्रमोद प्रिय जिनको, 

घर, दुकान कहीं भी बसा दो 

विशालकाय, शुभ तुंडकाय को !


गजमस्तक मुख सबसे सुंदर 

लंबोदर औ" मूषक वाहन, 

अद्भुत अति सिखावन उनकी 

साधें हर हाल में संतुलन !


खुलकर, हँसकर, गाकर जीओ 

पाठ सिखाते सहज प्रेम का,  

हर नेत्र में अश्रु होते जब 

समय आ गया हो विदा का ! 


सर्जन और विसर्जन दोनों 

जीवन में सदा संग विचरते, 

गणपति उत्सव यही सिखाता 

मिट-मिट कर हम पुनः जन्मते !

 

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