स्वप्नों सी वे झर जाती हैं
नहीं मिटाता जीवन से गम,
स्वप्नों सी वे झर जाती हैं
या जैसे फूलों से शबनम !
एक दौड़ में शामिल है जो
श्रम ही जिसने जाना जीवन,
क्लान्त कभी तो डरता होगा
थक कर सो जाता जो मन !
बाहर शिखरों पर पहुँचा है
नहीं ठिकाना भीतर पाया,
बंधा रहा सीमाओं में ही
आजादी का जश्न मनाया !
