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मंगलवार, दिसंबर 20

स्वप्नों सी वे झर जाती हैं

स्वप्नों सी वे झर जाती  हैं 

खुशियों को पा लेने का भ्रम 
नहीं मिटाता जीवन से गम, 
स्वप्नों सी वे झर जाती  हैं 
या जैसे फूलों से शबनम !

एक दौड़ में शामिल है जो 
श्रम ही जिसने जाना जीवन,
क्लान्त कभी तो डरता होगा 
थक कर  सो जाता जो मन !

बाहर शिखरों पर पहुँचा है 
नहीं ठिकाना भीतर पाया,
बंधा रहा सीमाओं में ही  
आजादी का जश्न मनाया !