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शनिवार, फ़रवरी 24

राग अनंत हृदय ने गाया


राग अनंत हृदय ने गाया



मन राही घर लौट गया है
 पा संदेसा इक अनजाना,
नयन टिके हैं श्वास थमी सी
एक पाहुना आने वाला !

रुकी दौड़ तलाश हुई पूर्ण
आनन देख लिया है किसका,
निकला अपना.. पहचाना सा
जाने कैसे बिछड़ गया था !

कदर न जानी जान पराया
व्यर्थ दर्द के दामन थामे,
एक ख़ुशी भीतर पलती थी
जाने क्यों मुख मोड़ा उससे !

रसभीनी ज्यों पगी मधुक में
इक मनुहार छुपी थी मन में,
जिसकी खातिर आँखें बरसीं
वह झंकार बसी कण-कण में !

द्वार खुले अब दिल के ऐसे
भरा समन्दर, गगन समाया,
सिमट गयीं सारी सीमाएं
राग अनंत हृदय ने गाया !

नयन न खुलते जग फीका सा
मदिर-मदिर रस कोई घोले,
मौन की गूँज सुनी है जबसे 
चुप रहें अधर भेद न खोलें !