राग अनंत हृदय ने गाया
मन राही घर लौट
गया है
पा संदेसा इक अनजाना,
नयन टिके हैं
श्वास थमी सी
एक पाहुना आने
वाला !
रुकी दौड़ तलाश
हुई पूर्ण
आनन देख लिया है किसका,
निकला अपना..
पहचाना सा
जाने कैसे बिछड़
गया था !
कदर न जानी जान
पराया
व्यर्थ दर्द के
दामन थामे,
एक ख़ुशी भीतर
पलती थी
जाने क्यों मुख
मोड़ा उससे !
रसभीनी ज्यों पगी
मधुक में
इक मनुहार छुपी
थी मन में,
जिसकी खातिर
आँखें बरसीं
वह झंकार बसी
कण-कण में !
द्वार खुले अब
दिल के ऐसे
भरा समन्दर,
गगन समाया,
सिमट गयीं सारी
सीमाएं
राग अनंत हृदय ने
गाया !
नयन न खुलते जग
फीका सा
मदिर-मदिर रस कोई
घोले,
मौन की गूँज सुनी
है जबसे
चुप रहें अधर भेद
न खोलें !