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मंगलवार, अक्टूबर 21

शुभ दीपावली

शुभ दीपावली 


दीप जले आशा के 

अंतर अभिलाषा के, 

जगमग यह जगत हुआ 

भेद मिटे भाषा के !


ख़ुशियों की लड़ियों में 

रंगीं फुलझड़ियों में, 

दिल ही ज्यों फूट रहा 

दीयों की कड़ियों में !


मीठी मुस्कानों का 

मीठा सा स्वाद है, 

आँगन में रंगोली 

उर में बसी याद है !


मर्यादा पुरुषोत्तम 

लक्ष्मी-गणराया की, 

दीवाली मंगलमय 

सर्वदा हो आपकी !


रविवार, अक्टूबर 12

क्योंकि तुम ख़ुशी के परमाणुओं से बने हो

क्योंकि तुम ख़ुशी के परमाणुओं से बने हो 


जिसमें प्रेम के परमाणु भी हैं 

या वे बदल जाते हैं प्रेम में 

कई आयामी हैं वे 

जैसे प्रकाश की एक श्वेत किरण 

सात रंगों में टूट जाती है 

प्रिज्म से गुजरने पर 

आत्मज्योति में भी सात गुण छिपे हैं 

कभी प्रेम का लाल रंग 

मुखर हो उठता है चिदाकाश में 

जब भावनाओं के श्वेत निर्मल मेघ 

उमड़ते घुमड़ते हैं 

कभी शांति का नीलवर्ण 

शक्ति का केसरिया भी है यहाँ 

और ज्ञान का पीतवर्ण भी 

शुद्धता का बैंगनी रंग कितना मोहक है 

सुख की हरि फसल भी लहलहाती है 

अंतर  आकाश सुशोभित है 

इन सात रंगों से 

जहाँ से सात सुरों की गूंज भी आती है ! 


बुधवार, मई 13

परम पूज्य गुरूजी के लिए जन्मदिन पर

परम पूज्य गुरूजी के लिए 
जन्मदिन पर श्रद्धा सुमन 

ज्ञान का दीपक जलाते 
प्रेम की सरिता बहाते,
दिवस हो या रात्रि पावन
अमरता का गीत गाते !

भय मिटाते हो दिलों से 
राह उज्ज्वल भी दिखाते, 
मौन की अनुगूँज से तुम 
विश्व का प्राँगण गुंजाते !

ज्यों जलों से भरा बादल
कृपा बनकर बरस जाते,
या घना विटप हो कोई 
छाँव में अपनी बिठाते !

सारा जहाँ घर तुम्हारा 
सभी को अपना बनाते, 
प्रीत डोरी से बंधे हैं 
दिलों को जीना सिखाते !

आत्मा का ज्ञान देकर 
युद्ध में लड़ना सिखाते,
ख़ुशी देने में छिपी है 
पाठ सेवा का पढ़ाते !

चाह जो मन में जगी हो 
हो समर्पित यह बताते, 
सहज ही सन्तुष्ट हो मन 
ध्यान का जादू सिखाते !

मरुथलों से दिल बने हैं 
कुसुम्भ भक्ति का खिलाते, 
कर्म की महिमा बताकर 
कर्मयोगी भी बनाते !

आज हर दिल की दुआ है 
बरसों जन्म दिन मनाएं,
पुष्प श्रद्धा के खिलाकर 
गीत ‘मैं तेरा’ ही गाएं !

सोमवार, अक्टूबर 8

निज सुनहरी भाग्य रेखा




निज सुनहरी भाग्य रेखा


स्वप्न देखा,
उसी पल में खींच डाली
निज सुनहरी भाग्य रेखा !

एक अनुपम स्वप्न सुंदर
जागते चक्षु से मनहर
कांपते थे प्राण भीतर !

ख़ुशी के पीछे छिपी थी
एक शायद भीति रेखा
स्वप्न देखा !

हम करें साकार सपने
दाम उसका अक्स अपने 
वैश्य है कितना अनोखा !

हाथ में कूँची थमा वह
क्षीर सागर में बसा जा !
है अदेखा !


शनिवार, फ़रवरी 24

राग अनंत हृदय ने गाया


राग अनंत हृदय ने गाया



मन राही घर लौट गया है
 पा संदेसा इक अनजाना,
नयन टिके हैं श्वास थमी सी
एक पाहुना आने वाला !

रुकी दौड़ तलाश हुई पूर्ण
आनन देख लिया है किसका,
निकला अपना.. पहचाना सा
जाने कैसे बिछड़ गया था !

कदर न जानी जान पराया
व्यर्थ दर्द के दामन थामे,
एक ख़ुशी भीतर पलती थी
जाने क्यों मुख मोड़ा उससे !

रसभीनी ज्यों पगी मधुक में
इक मनुहार छुपी थी मन में,
जिसकी खातिर आँखें बरसीं
वह झंकार बसी कण-कण में !

द्वार खुले अब दिल के ऐसे
भरा समन्दर, गगन समाया,
सिमट गयीं सारी सीमाएं
राग अनंत हृदय ने गाया !

नयन न खुलते जग फीका सा
मदिर-मदिर रस कोई घोले,
मौन की गूँज सुनी है जबसे 
चुप रहें अधर भेद न खोलें ! 

बुधवार, सितंबर 28

तू है तो मैं हूँ

तू है तो मैं हूँ

‘मैं’ हूँ तो ‘तुझे’ होना ही पड़ेगा
‘तू’ से ही ‘मैं’ का वंश चलेगा
तुझे बिठाया हमने सातवें आसमान पर
अनगिनत गुणों के रंग दिए भर
तू जानीजान है कहते रहे यह भी
छिप-छिप कर करते रहे जुर्म भी
एक हाथ में आरती का थाल
और मन में भरे कितना मलाल
ख़ुशी के नाम पर दुःख बटोरते रहे
कभी किस्मत कभी दुनिया को कोसते रहे
अब जब कि यह राज खुला है
न कोई गम न कोई गिला है
तू ही हर सूं नजर आता है
दिल झूम के यह गाता है
तू जो है तो मैं हूँ !  

मंगलवार, सितंबर 23

हँसना यहाँ गुनाह है


हँसना यहाँ गुनाह है



लगा दो पहरे खुशियों पर
क्यों मनुआ बेपरवाह है
हँसना यहाँ गुनाह है !

खुश रहना क्योंकर सीखा है
यह तो गमों की बस्ती है,
आँसूं ही भाते हैं जग को
नहीं हँसी की हस्ती है !

पर काट दो उम्मीदों के
क्यों उड़ने की चाह है
हँसना यहाँ गुनाह है !

पलकों पर क्यों पुष्प सजाये
अविरत पीड़ा बहने दो,  
मुखर हुए क्यों नयन बोलते
चुप ही इनको रहने दो !

पुनः बांध लो जंजीरों को
लम्बी अति यह राह है
 हँसना यहाँ गुनाह है !






गुरुवार, अप्रैल 24

गुलाब और वह

गुलाब और वह


पूछा गुलाब से
 उसकी ख़ुशी का राज
काँटों में भी मुस्कुराने का
देख अनोखा अंदाज
रंगो-खुशबू की कर रहा था
अनायास ही बरसात
धूप-हवा पानी में
झूमता दिन रात !

बोला, उससे पहले
हँस दिया खिलखिला कर  
हुई दिशाएं लाल
उसकी मोहक अदा पर
चाहा सदा ही गुलाब होना
होकर कभी न पछताया
नहीं कुछ अन्यथा होने का
भाव भी मन में आया
सत्य हूँ सत्य को स्वीकारता
जैसा हूँ उसे ही अपना होना मानता !

चौंका वह बात सुन गुलाब की
कुछ और हो जाने की
जो भीतर जलती थी आग
हो आई बड़ी ही शिद्धत से याद
अचानक उतर गया कोई बोझ भारी मन से
भर गया कण-कण किसी अनजानी पुलक से
एक गहरी मुस्कान भीतर से सतह पर आई
जन्मों से छिपी थी जो तृप्ति छलक आई !




शुक्रवार, दिसंबर 27

शाहों का शाह था

शाहों का शाह था 

अपनी ही छाया से अक्सर डर जाता है
भीरु उससे बढ़ कोई नजर नहीं आता है

स्वप्न पर विश्वास करे जो आँख मूंद कर
सत्य से सदा दूर-दूर भाग जाता है

जाने किस आस में दौड़ता ही जा रहा
पाँव तले क्या दबा देख नहीं पाता है

बंधन हजार बांधे रिस रहे घाव से
झूठी मुस्कान पहन खूब खिलखिलाता है

कौन बढ़े नाम करे किसका गुणगान हो
झांके यदि मानस में कोई नहीं पाता है

छाया का झूठ जब कभी नजर आये भी
मद की आड़ में उसको छुपाता है

शाहों का शाह था जाने क्यों भूल गया
कण भर ख़ुशी हित जिन्दगी लुटाता है