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मंगलवार, जुलाई 7

उसने अपनी याद जरा सी

उसने अपनी याद जरा सी 


जब नयनों में नींद नहीं थी 

उसका ही तो ख़्वाब बसा था, 

सुमधुर स्मृतियों के पत्तों से 

मन का आँगन पूर्ण भरा था !


अधरों पर मुस्कान सजीली 

ह्रदय की गहराई में तोष,

आश्वासन थपकी देता था 

लोरी गा रहा था संतोष !


फिर जाने कब निद्रा देवी 

पलकों पर आकर बैठी थी,   

उसने अपनी याद जरा सी 

शायद पीछे खिसका दी थी !


तन सोया ऊर्जा जगती थी 

कंपन सिहरन रह-रह होता, 

एक अखंड ज्योति जलती जब  

क्योंकर दर्श न उसका होता !


उसके पथ पर जो चलता है 

नित उपहार मिला करते हैं,

नींद, जागरण, स्वप्न सभी के 

जाकर पार मिला करते हैं !


रविवार, मार्च 29

जाने कब फिर मिलना हो

जाने कब फिर मिलना हो

 

कुछ तुम कह दो, कुछ हम सुन लें

कलियों का कब तक खिलना हो

जाने कब फिर मिलना हो !

 

चंद श्वास लेकर आये थे

कुछ ही शेष रही हैं जिनमें,

कहीं अधूरा न रह जाये

किस्सा, हम तुम मिले थे जिसमें !

 

तुम झाँकों मेरे नयनों में

फुरसत ऐसी कल ना हो,  

जाने कब फिर मिलना हो !

 

कितने संगी चले जा चुके

अभिनय करते थके थे शायद,

मंच कभी खाली न हुआ यह

स्मृतियाँ भी खो जाती अक्सर !

 

पलकों को न बंद करो तुम

जाने किस पल चलना हो

 जाने कब फिर मिलना हो !

 

जितना साथ मिला सुंदर था

इक-दूजे में झलक भी पायी,

स्वप्नों में वह छिपी न रहती

जग कहता है जिसे खुदाई !

 

हाथ थाम लो पल भर को तुम

अधरों का कब सिलना हो

जाने  कब फिर मिलना हो !

 

 

गुरुवार, फ़रवरी 19

अमृत घट बरबस बहते हैं

अमृत घट बरबस बहते हैं

कौन कहे जाता है भीतर

चुकती नहीं ऊर्जा जिसकी,

कौन गढ़े जाता है नूतन

प्यास नहीं बुझती उसकी !

 

एक कुमारी कन्या जैसे

है अभीप्सा शिव वरने की,

तृप्त नहीं होता है घट यह

बनी लालसा है भरने की !

 

एक अनंत स्रोत है जिससे

नित नवीन भाव जगते हैं,

पल भर कोई थम जाता जब

अमृत घट बरबस बहते हैं !

 

शब्द उसी के भाव उसी के

जाने क्या रचना वह चाहे,

कलम हाथ में कोरा कागज

सहज गीत इक रचता जाये !

 

बंद नयन में खिला वही है

सुरभि बन के मिला वही है,

गुनगुन रुनझुन कहाँ से आती

 मृदुल कमल सा, शिला वही है !


बुधवार, अप्रैल 24

नयन स्वयं को देखते न

नयन स्वयं को देखते न 


हम हमीं को ढूँढते हैं 

पूछते फिरते कहाँ हो ?

हम हमीं को ढूँढते हैं 

पूछता ‘मैं’ ‘तुम’ कहाँ हो ?


खेल कैसा है रचाया 

अश्रु हर क्योंकर बहाया, 

नयन स्वयं को देखते न 

रहे उनमें जग समाया !


अस्त होता कहाँ दिनकर 

डोलती है भू निरंतर, 

देह-मन को करे जगमग 

आत्मा सदा दीप बन कर !


प्रश्नवाचक जो बना है

पूछता जो प्रश्न सारे

भावना से दूर होगा 

दर्द जो अब भरे आहें !


जो नचाती, घेरती भी  

एक छाया ही मनस की, 

दूर ले जा निकट लाती 

लालसा जीवन-मरण की !


‘तू’ छिपा मुझी  के भीतर 

‘मैं’ मिले ‘तू’ झलक जाये 

एक पल में हो सवेरा 

भ्रम मिटाकर रात जाये !


बुधवार, सितंबर 7

कविता

कविता 

कविता प्रसाद है 

उसी तरह जैसे आनंद, शांति और प्रेम !

जो एक ही स्रोत से आते हैं 

जब एकटक प्रतीक्षा में रत हों नयन 

तो अदृश्य में होने लगती है हलन-चलन 

और फलीभूत होती है प्रतीक्षा 

जीवन सरल हो 

व्यर्थ के तामझाम से मुक्त 

उस नदी की तरह नहीं 

जो तट तोड़कर बह गयी है अनियंत्रित 

चारों ओर 

ना ही बेतरतीब बहती हवा की मानिंद 

जो उड़ाती चलती है हरेक शै को

 जो उसके दायरे में आ जाती है 

जब लक्ष्य खो जाता है 

तब रास्ते भी ओझल हो जाते हैं 

जोड़े रहती है हर मंज़िल 

अपने साथ मार्गों को 

जो राही को ही नज़र आते हैं 

 बंट जाता है जब मन 

तितर-बितर हो गये मेघों की तरह  

  कुंद हो जाती है धार मेधा की 

लेंस से निकली किरणों की तरह 

एकीभूत हुई चेतना  स्रोत है सृजन का

गोमुख से ही झरा करती है गंगा 

जहाँ नहीं कोई आडम्बर नहीं कोई चाह 

नहीं प्रदर्शन अपनी विशालता का 

वह हिमालय का प्रसाद है 

जो नितांत नीरवता में बरस जाता है !


सोमवार, मार्च 21

एक हँसी भीतर जागी थी

एक हँसी भीतर जागी थी 

 

नयन टिके हैं सूने पथ पर 

किसकी राह तके जाता मन,

खोल द्वार दरवाजे बैठा

किसकी आस किये जाता मन !

 

एक पाहुना आया था कल

एक हँसी भीतर जागी थी,

हुई लुप्त फिर घट सूना है

फिर से इक मन्नत माँगी थी !

 

हर आहट पर चिहुँक ताकता 

किसकी बाट जोहता हर पल,

किसकी याद सँजोये बैठा

किसकी चाह किये जाता मन !

 

मिला बहुत पर नहीं वह मिला

बन बसंत जो साथ सदा हो,

स्वप्न नहीं बहलाते, ढूढें  

शीतल सुरमय  मधुर राग हो  !

 

किसको यह आवाज लगाये

किसकी नजरों को तरसे मन, 

फीका जग का हर रस लगता 

किसकी प्यास भरे जाता मन !


रविवार, फ़रवरी 2

सुख की फसल भीतर खिले

उन सभी बच्चों के नाम जिनका आज जन्मदिन है और जो घर से दूर हैं

सुख की फसल भीतर खिले


 है गगन सीमा तुम्हारी उसके पहले मत थमो, बिखरी हुईं मन रश्मियां इक पुंज अग्नि का बनो ! जब नयन खोले थे यहाँ अज्ञात थी सारी व्यथा, कुछ खा लिया फिर सो गए इतनी ही थी जीवन कथा ! फिर भेद मेधा के खुले सारा जगत पढ़ने को था, थी हर कदम पर सीख कुछ हर दिवस बढ़ने को था ! अनन्त है सभी कुछ यहाँ अभाव केवल भ्रम ही है, सीमित इसे हमने किया मंजिल कदम-कदम ही है! खुद का भरोसा नित करो मन में न भय कोई पले, है स्वप्न में जन्नत अगर सुख की फसल भीतर खिले ! दूर घर से देश से भी जन्मदिन पर लो दुआएं, नव वर्ष बीते सुख भरा मिल सभी यह गीत गाएं !


शनिवार, नवंबर 30

छिपा अरूप रूप के पीछे

छिपा अरूप रूप के पीछे


इश्क में जो भी डूबा यारा
बहती भीतर अमृत धारा,
जब-जब उस से लगन लगाई
जल जाती हर झूठी कारा !


जब कण-कण में वही बसा है
नयनों से फिर कौन पुकारे,
स्मित उसका पट छूकर आयी
भाव पंख से जिसे सँवारे !


हल्का-हल्का सा स्पंदन है
किस अनदेखे का नर्तन है,
पलक झपकते निमिष मात्र में
महाकाल का शुभ वंदन है !


छिपा अरूप रूप के पीछे
उसे निहारा किन नयनों से,
सुख की गागर सदा लुटाये
व्यक्त हुआ ना वह बयनों से  !


रूप, रंग, रस स्वाद अनूठा
कौन सुनाये अपनी गाथा,
कोई नहीं अलावा उसके
खुला रहस्य उसने बांचा !

शनिवार, नवंबर 23

जिंदगी


जिंदगी 


जिस घड़ी आ जाये होश जिंदगी से रूबरू हों
एक पल में ठहर कर फिर  झांक लें खुद के नयन में
बह रही जो खिलखिलाती गुनगुनाती धार नदिया
चंद बूंदें ही उड़ेलें उस जहाँ की झलक पालें

क्या यहाँ करना क्या पाना यह सिखावन चल रही है 
बस जरा हम जाग देखें और अपने कान धर लें
नहीं चाहे सदा देती नेमतें अपनी लुटाती
चेत कर इतना तो हो कि फ़टे दामन ही सिला लें

पूर्णता की चाह जागे मनस से हर राह मिलती
ला दिया जिसने सवेरा रात जिससे रोज खिलती
उस भली सी इक ललक को धूप, पानी, खाद दे दें
जो कभी बुझती नहीं है वह नशीली आग भर लें

गुरुवार, सितंबर 27

उर से ऐसे ही बहे छंद



उर से ऐसे ही बहे छंद


मुक्त गगन है मुक्त पवन है
मुक्त फिजायें गीत सुनातीं,
मुक्त रहे मन चाह यही तो
कदम-कदम पर है उलझाती !

सदा मुक्त जो कैद देह में 
चाहों की जंजीरें बाँधी,
नयन खुले से लगते भर हैं
कहाँ नींद से नजरें जागी !

भावों की हाला पी पीकर
होश गँवाए ठोकर खायी,
व्यर्थ किया पोषण उस 'मैं' का
बुनियाद जिसकी नहीं पायी !

हो निर्भार उड़ा अम्बर में
उस प्रियतम की थाह ना मिली,
छोड़ दिया तिरने को खग सा
विश्रांति हित डाल ना खिली !

तिरने में ही उसे पा लिया
उड़ेंं बादल ज्यों हो निर्बंध,
बरस गये करने जी हल्का
उर से ऐसे ही बहे छंद !

शनिवार, फ़रवरी 24

राग अनंत हृदय ने गाया


राग अनंत हृदय ने गाया



मन राही घर लौट गया है
 पा संदेसा इक अनजाना,
नयन टिके हैं श्वास थमी सी
एक पाहुना आने वाला !

रुकी दौड़ तलाश हुई पूर्ण
आनन देख लिया है किसका,
निकला अपना.. पहचाना सा
जाने कैसे बिछड़ गया था !

कदर न जानी जान पराया
व्यर्थ दर्द के दामन थामे,
एक ख़ुशी भीतर पलती थी
जाने क्यों मुख मोड़ा उससे !

रसभीनी ज्यों पगी मधुक में
इक मनुहार छुपी थी मन में,
जिसकी खातिर आँखें बरसीं
वह झंकार बसी कण-कण में !

द्वार खुले अब दिल के ऐसे
भरा समन्दर, गगन समाया,
सिमट गयीं सारी सीमाएं
राग अनंत हृदय ने गाया !

नयन न खुलते जग फीका सा
मदिर-मदिर रस कोई घोले,
मौन की गूँज सुनी है जबसे 
चुप रहें अधर भेद न खोलें !