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मंगलवार, जनवरी 10

सर्दियों की धूप


सर्दियों की धूप 

धूप कहाँ है 
चलो उसे ढूँढ़ते हैं
भिनसार में आती है सोने वाले कमरे की खिड़की  से 
और दीवार पर एक चमकता हुआ रौशनी का टीका भर लगाती है 
जब पिछले बरामदे से है झाँकता है बाल सूर्य 
कुछ देर बाद धरा घूम जाती है जब 
पूजा के कमरे की खिड़की से छन छन कर आती है
नीला कारपेट चमकने लगता है धूप में
वह चाहती है पल भर धूप में बैठना 
पर सुबह का वक्त होता है भाग-दौड़ का 
दोपहर को धूप कुछ देर ही आती है पीछे वाली खिड़की से 
फर्श पर बन जाता है आायताकार
उसमें बैठना हो तो बैठे कोई सिकोड़ कर बदन 
शाम होने से पहले ही सूरज बढ़ गया होता है आगे 
घर की किसी खिड़की दरवाजे तक उसकी पहुँच नहीं
तब बाहर निकल आती है वह 
जहाँ पूरे लॉन में बिछी है धूप नर्म चादर की तरह 
चाहो तो सो जाओ  
या ओढ़ लो  नर्म दुलाई की तरह !