जीने की कला
क्या मिला है? क्या नहीं
इसको न देखें
क्या घटा है मन के भीतर ?
क्या बने हैं, इसे परखें !
धन मिला, पर बुझ गया मन
यश मिला, पर ढल गया तन
घर बनाया एक सुंदर
किंतु छायी ग़र थकन !
पूर्ण होकर भी,
अधूरे ही रहेंगे
वे सपन !
वे सपन, जो ऊर्जा से भर गये थे
सृजन की क्षमता जगा कर
राह का भी बोध जो, दे कर गये थे
संग कोई है हमारे
सुनें उसको !
काम न आयेंगे गैजेट्स
उस घड़ी जब
साथ न होगा कोई
और हम अकेले ही
खड़े हों राह पर !
बाँटने से ही मिलेगा
तोष भीतर
न कि ढेरों जोड़ने से
क्या बही करुणा किसी के दर्द पर
क्या मिला सुख साथ होने पर किसी के
आज़मायें न कभी भी मित्रता
सारे जग से ही निभायें प्रीत कर !!
